लेखक
"हलवा खाकर दाँत घिसे तो घिसने दो "
न्यूयार्क में घटी एक घटना से चर्चा शुरू करना चाहता हूँ । भारतीय महिला प्रिया, 35 वर्ष (परिवर्तित नाम) पाक कला विशेषज्ञ थी व न्यूयार्क में एक भोजनालय चलाती थी। इनके पति आई आई टी कानपुर से स्नातक थे व किसी बैंक में कार्य करते हुए आगे अध्ययन करने कोलम्बिया विश्व विद्यालय से आगे पढाई करने न्यूयार्क गये थे ।कोरोना काल में भोजनालय बंद हो गया व परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा ।एकल परिवार अवसादग्रस्त हो गया ।प्रिया की हत्या कर दी गयी। जांच में वह गर्भवती पायी गयी । इनके पति की लाश एक नदी में पायी गयी ।पुलिस मामला हत्या व आत्महत्या का बता रही है । यह घटना कई बातों पर पुनर्विचार करने को बाध्य करती है ।
सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए,बचत करने की हमारी संस्कृति रही है । हमारे पुरखों ने उच्च आदर्शों के साथ सादा जीवन जिया है ।मितव्ययी व्यक्ति ही बचत कर सकता है । यहाँ मितव्ययता को कंजूसी समझने की भूल ना करें । कंजूस तो आवश्यकता होने पर भी खर्च नहीं करना चाहता ।
कोरोना काल से पहले हम लोग लगभग "आमदनी अठन्नी, खर्चा रुप्पैया " की तर्ज पर चल रहे थे । यह काल हमें यह सीखने आया है कि " हलवा खाकर दाँत घिसे तो घिसने दो, बचत करते लोग हँसे तो हँसने दो ।"
यह मन्त्र मुझे अपने पूज्यनीय दादा जी ने दिया था ।भावार्थ यह है कि आप हलवा खा रहे हैं और लोग कहें कि इससे तो आपके दाँत घिसे जायेंगे तब आपको उत्तर देना है कि ठीक है, घिसने दो । सब जानते हैं कि हलवा खाकर दाँत नहीं घिसने वाले ।इसी प्रकार अगर आप मितव्ययता पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं तो समाज आपकी हँसी उड़ा सकता है तो कोई बात नहीं क्योकिं अन्तः बचत आपके लिए कल्याणकारी ही होगी ।
भौतिकवादी जीवन शैली ने हमें खर्चीला और खोखला कर दिया है । हम किश्तों का जीवन जीने लगे ।परम्पराओं का पालन करने वाले हँसी का पात्र बन गए ।
मगर प्रकृति सममिति से प्रेम करती है व सबको समान अवसर देती है । यह समय पुनर्विचार कर सादगीपूर्ण जीवन शैली की और लौटने का है ।
भारत सोनी, सीहोर मप्र
"हलवा खाकर दाँत घिसे तो घिसने दो "
न्यूयार्क में घटी एक घटना से चर्चा शुरू करना चाहता हूँ । भारतीय महिला प्रिया, 35 वर्ष (परिवर्तित नाम) पाक कला विशेषज्ञ थी व न्यूयार्क में एक भोजनालय चलाती थी। इनके पति आई आई टी कानपुर से स्नातक थे व किसी बैंक में कार्य करते हुए आगे अध्ययन करने कोलम्बिया विश्व विद्यालय से आगे पढाई करने न्यूयार्क गये थे ।कोरोना काल में भोजनालय बंद हो गया व परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा ।एकल परिवार अवसादग्रस्त हो गया ।प्रिया की हत्या कर दी गयी। जांच में वह गर्भवती पायी गयी । इनके पति की लाश एक नदी में पायी गयी ।पुलिस मामला हत्या व आत्महत्या का बता रही है । यह घटना कई बातों पर पुनर्विचार करने को बाध्य करती है ।
सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए,बचत करने की हमारी संस्कृति रही है । हमारे पुरखों ने उच्च आदर्शों के साथ सादा जीवन जिया है ।मितव्ययी व्यक्ति ही बचत कर सकता है । यहाँ मितव्ययता को कंजूसी समझने की भूल ना करें । कंजूस तो आवश्यकता होने पर भी खर्च नहीं करना चाहता ।
कोरोना काल से पहले हम लोग लगभग "आमदनी अठन्नी, खर्चा रुप्पैया " की तर्ज पर चल रहे थे । यह काल हमें यह सीखने आया है कि " हलवा खाकर दाँत घिसे तो घिसने दो, बचत करते लोग हँसे तो हँसने दो ।"
यह मन्त्र मुझे अपने पूज्यनीय दादा जी ने दिया था ।भावार्थ यह है कि आप हलवा खा रहे हैं और लोग कहें कि इससे तो आपके दाँत घिसे जायेंगे तब आपको उत्तर देना है कि ठीक है, घिसने दो । सब जानते हैं कि हलवा खाकर दाँत नहीं घिसने वाले ।इसी प्रकार अगर आप मितव्ययता पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं तो समाज आपकी हँसी उड़ा सकता है तो कोई बात नहीं क्योकिं अन्तः बचत आपके लिए कल्याणकारी ही होगी ।
भौतिकवादी जीवन शैली ने हमें खर्चीला और खोखला कर दिया है । हम किश्तों का जीवन जीने लगे ।परम्पराओं का पालन करने वाले हँसी का पात्र बन गए ।
मगर प्रकृति सममिति से प्रेम करती है व सबको समान अवसर देती है । यह समय पुनर्विचार कर सादगीपूर्ण जीवन शैली की और लौटने का है ।
भारत सोनी, सीहोर मप्र


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