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रिश्तों को जीना है अगर....
बात 1988 की है l पापा के चेहरे पर झुर्रियाँ गहराने लगीं थीं और बालों पर सफेदी सत्ता में थी l साइकिल से ऑफिस जाते हुए उम्र और रुतबा दोनों झींकते थे l
एक रोज, उनके एक दोस्त किसी ठेकेदार के यहाँ ले गएl ठेकेदार के गोदाम में एक मोपेड कई महीने से खड़ी थी l उम्मीद थी कि वह सस्ते में बेच देगा l
मोपेड कीचड और धूल से सनी थी l माँग दो हज़ार रुपयों की हुई l लेकिन मोलभाव करने पर वह अठारह सौ में मोपेड बेचने को तैयार हो गया l पापा ने अगले दिन रूपये देकर मोपेड ले जाने की बात कहीl
"पैसे आते रहेंगे l आप मोपेड अभी ले जाओ l मेरी जगह तो खाली हो, " ठेकेदार ने कहा l
शनिवार की पूरी छुट्टी पापा ने मोपेड को समर्पित कर दी l शाम को ठेकेदार को पैसे देने उसी पर गए l वह खुद अपनी मोपेड को पहचान नहीं पाया l
लगभग दो साल पापा ने वो मोपेड चलाई l जब बेची तो उसके ढाई हज़ार रूपये मिले l
पापा अपनी सभी चीजों को बहुत संभाल के रखते थे l वे कहते थे जो आदमी अपनी चीजों को संभाल कर नहीं रख सकता वो रिश्तों को भी नहीं संभाल सकता l रिश्तों को निभाने से बढ़ कर अगर जीना सीखना है तो निर्जीव को भी उतना मान सम्मान देकर उन्हें सभालना सीख जाओ। रिश्तों को जीना आ जाएगा। तभी हर तरफ खुशी ही खुशी होगी।
आज यूँ ही याद आ गया l
©गौरव शर्मा
---------------------परिचय
गौरव शर्मा गाजियाबाद में रहते हैं। वैसे तो गणित के प्राध्यापक हैं, लेकिन शब्दों को कहानियों और कविताओं में पिरोना इनकी रूचि है | वे कहते है , "मैं अवसाद में कवि हूँ और हर्ष में कहानीकार |"आपने अंग्रेजी के बहुचर्चित तीन उपन्यास लिखें हैं | साथ ही 'Unbudgeted Innocence" बच्चों के लिए लिखा कहानी-संग्रह है | वे अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से सामाजिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक सन्देश देने के लिए प्रयासरत रहते हैं | आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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