तन की हवस...
मै आत्म निर्भर हूं...
आत्मा तो प्रभु का अंश है और उसी पर निर्भर है। देश का प्रधानमंत्री हाथ खड़े कर रहा है और कह रहा है कि "तुम तुम्हारी जानों" जैसे बाप बेटे से विवाह उपरांत कहता है।
अब "लोकल" पकड़ा और उसके मायने खोजे_इस पुनीत कार्य को निपटाने मे 72 घंटे वैसे ही लग गए जैसे किसी मरीज को आईसीयू वार्ड मे लगते हैं।
मोदी जी के पल्ले से झड़े दोनों शब्द "आत्मनिर्भरता" और "लोकल" को आखिर पकड़ ही लिया।
समझ गया कि पद पर पहुंचा व्यक्ति कितना निष्ठुर हो जाता है। शब्दों से हाथ ऊंचा करने की स्टाइल महारथ हांसिल कर लेता है। तमन्नाओं को सहलाकर सुलाने वाला व्यक्ति खुदको ठगा सा महसूस वैसे करता है जैसे मध्यरात्रि मे चादर झटकारना।
मुझे लगा कि मैं जीवन के तीसरे पड़ाव तक आखिर क्यों आत्मनिर्भर नहीं हो पाया! मै कुंठित अवस्थाओं को क्यों दामन से "चिपटाकर" जीता रहा, मूर्ख बनकर मतदान केंद्र पहुंच ऊंगली मे स्याही लगवाता रहा।
मोदी की खदान खोदी तो निकली चुहिया__कौन सी !! वही जो बिल्लियों का निवाला है।
मीरा महान थीं बलकी कहदें कि महानता की पराकष्टा थीं उनकी भक्ति अभूतपूर्व थी या कहें भूतो न भविष्यति वह आध्यात्म की पीड़ा थीं। तभी तो उन्होंने लिखा "सूली ऊपर सेज पिया की" और समस्या बतायी- "किस विधि मिलना होय" आज के राजनीतिक माहौल को सूंघकर मीरा जी के दर्द का स्मरण होजाना अटपटा सा लगता है। मगर नामुमकिन नहीं। "सूली ऊपर दिल्ली की कुर्सी, किस विधि मिलना होय।"
कुर्सी बची रहे उसे बचाने मुझे "आत्मनिर्भर" होना जरुरी है। जैसे तुम्हें अपना चूल्हा-चौका....खुद कमाओ,खुद बनाओ और खुद खाओ---सरकार के भरोसे मत रहना।
बिल्ली चूहे को मारने या शेर हिरण पर आक्रमण करने से पहले कितना एकाग्र, कितना ध्यानमग्न हो जाता है। बगुला अगर मछली के लिए एक टांग पर खड़ा होकर ध्यान नहीं करता तो "बगुला भगत" की कहावत कैसे प्रचलित होती। यदि बगुला मछली की भक्ति मे तल्लीन हो सकता है तो नेता कुर्सी की भक्ति मे क्यों नहीं !! सबसे ऊंची टांग,सबसे ऊंची चोंच और सबसे बढ़ा सीना (56 इंच) हमारे प्रधानमंत्री के पास है।
"आत्मनिर्भरता" के पीछे आजादी के वर्ष 1947 पर भी ध्यान फरमाया होता__यह उसी समय से विभिन्न सरकारों द्वारा पब्लिक को दिया उपहार है। जिसे आप इस महामारी के वक्त जनता को फिर गिफ्ट कर रहे हैं। 15 अगस्त 1947 से लेकर लाकडाउन- 4 तक कुछ बदला क्या !! वही घिसेपिटे भाषण,वही जुमले,वही शब्द "आत्मनिर्भरता" लाकडाउन के चौथे का शीर्षक। आत्मनिर्भर_आत्मनिर्भर सुनकर आत्मा ही शरीर से निकल गई। लाशों के अंबार की प्रतिक्षा क्यों है। न पाकिस्तान ,चीन को मूंहतोड़ जवाब दे पा रहे हो और न ही कोरोना को__बेबस पब्लिक का ध्यान आकर्षित कर रहे हो "लोकल" पर....सीधा सीधा सा बोलने मे क्या दिक्कत है कि हम चाइना और उसके ब्रांड कोरोना से निपटें__
एक बहिष्कार और दूसरा आविष्कार ही इसका उपाए है। लाकडाउन 31 मई तक बढ़ा दिया गया। प्रदेश सरकार देखेगी कि तीनों जोनों को हमे कैसे निपटाना है ?
लेकिन सर्वदा यह सत्य है कि हर व्यक्ति आजादी के बाद से ही "लोकल" था तुमने ही तो उसे विदेशी माल परोसा, दोषी कौन ? कहां गई अर्थ व्यवस्था !! अब जीने की स्टाइल सिखाई जा रही है।
याद आ रहे हैं स्व. गोपालदास नीरज जो कहते हैं कि
मै आत्म निर्भर हूं...
राजेश शर्मा
"किंग आफ इंडिया" नरेंदर मोदी का जबसे संबोधन सुना तभी से "डीप" मे पहुंच गया। खुद को टटोला, कि यह आत्मनिर्भरता आखिर होती क्या है।आत्मा तो प्रभु का अंश है और उसी पर निर्भर है। देश का प्रधानमंत्री हाथ खड़े कर रहा है और कह रहा है कि "तुम तुम्हारी जानों" जैसे बाप बेटे से विवाह उपरांत कहता है।
अब "लोकल" पकड़ा और उसके मायने खोजे_इस पुनीत कार्य को निपटाने मे 72 घंटे वैसे ही लग गए जैसे किसी मरीज को आईसीयू वार्ड मे लगते हैं।
मोदी जी के पल्ले से झड़े दोनों शब्द "आत्मनिर्भरता" और "लोकल" को आखिर पकड़ ही लिया।
समझ गया कि पद पर पहुंचा व्यक्ति कितना निष्ठुर हो जाता है। शब्दों से हाथ ऊंचा करने की स्टाइल महारथ हांसिल कर लेता है। तमन्नाओं को सहलाकर सुलाने वाला व्यक्ति खुदको ठगा सा महसूस वैसे करता है जैसे मध्यरात्रि मे चादर झटकारना।
मुझे लगा कि मैं जीवन के तीसरे पड़ाव तक आखिर क्यों आत्मनिर्भर नहीं हो पाया! मै कुंठित अवस्थाओं को क्यों दामन से "चिपटाकर" जीता रहा, मूर्ख बनकर मतदान केंद्र पहुंच ऊंगली मे स्याही लगवाता रहा।
मोदी की खदान खोदी तो निकली चुहिया__कौन सी !! वही जो बिल्लियों का निवाला है।
मीरा महान थीं बलकी कहदें कि महानता की पराकष्टा थीं उनकी भक्ति अभूतपूर्व थी या कहें भूतो न भविष्यति वह आध्यात्म की पीड़ा थीं। तभी तो उन्होंने लिखा "सूली ऊपर सेज पिया की" और समस्या बतायी- "किस विधि मिलना होय" आज के राजनीतिक माहौल को सूंघकर मीरा जी के दर्द का स्मरण होजाना अटपटा सा लगता है। मगर नामुमकिन नहीं। "सूली ऊपर दिल्ली की कुर्सी, किस विधि मिलना होय।"
कुर्सी बची रहे उसे बचाने मुझे "आत्मनिर्भर" होना जरुरी है। जैसे तुम्हें अपना चूल्हा-चौका....खुद कमाओ,खुद बनाओ और खुद खाओ---सरकार के भरोसे मत रहना।
बिल्ली चूहे को मारने या शेर हिरण पर आक्रमण करने से पहले कितना एकाग्र, कितना ध्यानमग्न हो जाता है। बगुला अगर मछली के लिए एक टांग पर खड़ा होकर ध्यान नहीं करता तो "बगुला भगत" की कहावत कैसे प्रचलित होती। यदि बगुला मछली की भक्ति मे तल्लीन हो सकता है तो नेता कुर्सी की भक्ति मे क्यों नहीं !! सबसे ऊंची टांग,सबसे ऊंची चोंच और सबसे बढ़ा सीना (56 इंच) हमारे प्रधानमंत्री के पास है।
"आत्मनिर्भरता" के पीछे आजादी के वर्ष 1947 पर भी ध्यान फरमाया होता__यह उसी समय से विभिन्न सरकारों द्वारा पब्लिक को दिया उपहार है। जिसे आप इस महामारी के वक्त जनता को फिर गिफ्ट कर रहे हैं। 15 अगस्त 1947 से लेकर लाकडाउन- 4 तक कुछ बदला क्या !! वही घिसेपिटे भाषण,वही जुमले,वही शब्द "आत्मनिर्भरता" लाकडाउन के चौथे का शीर्षक। आत्मनिर्भर_आत्मनिर्भर सुनकर आत्मा ही शरीर से निकल गई। लाशों के अंबार की प्रतिक्षा क्यों है। न पाकिस्तान ,चीन को मूंहतोड़ जवाब दे पा रहे हो और न ही कोरोना को__बेबस पब्लिक का ध्यान आकर्षित कर रहे हो "लोकल" पर....सीधा सीधा सा बोलने मे क्या दिक्कत है कि हम चाइना और उसके ब्रांड कोरोना से निपटें__
एक बहिष्कार और दूसरा आविष्कार ही इसका उपाए है। लाकडाउन 31 मई तक बढ़ा दिया गया। प्रदेश सरकार देखेगी कि तीनों जोनों को हमे कैसे निपटाना है ?
लेकिन सर्वदा यह सत्य है कि हर व्यक्ति आजादी के बाद से ही "लोकल" था तुमने ही तो उसे विदेशी माल परोसा, दोषी कौन ? कहां गई अर्थ व्यवस्था !! अब जीने की स्टाइल सिखाई जा रही है।
याद आ रहे हैं स्व. गोपालदास नीरज जो कहते हैं कि


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