लेखक
दिनेश का दोपहर में आफिस से फोन आया ,,,सुनो मालती आज हमारे मैनेजर रमेश जी के बेटे की शादी में चलना है,,शहर के सबसे बड़े होटल में शादी है,,कितने रुपये लगा कर शादी कर रहे हैं,,देखो वहाँ बहुत बड़े बड़े लोग आएंगे,,और खाने के लिए भी सुना है बाहर से हलवाई बुलाये हैं,,,और महँगी शराब भी मिलेगी,,तुम अच्छे से तैयार हो जाना और हाँ मेरा नीला वाला कोट प्रेस करवा देना और जूते भी पोलिश करवा देना,,एक ही साँस में बोले जा रहा था दिनेश,, मालती ने बीच मे ही टोकते हुए कहा ठीक है तुम जल्दी आ जाना मैं भी पार्लर जाकर तैयार हो आती हूँ,,,और हाँ गिफ्ट क्या देना है,,,दिनेश बोला गिफ्ट तो अच्छा ही देना होगा बहुत काम हैं इस मैनेजर से,,खुश हो जाएगा,, हमेशा मेरे ऊपर रोब झाड़ता रहता है,,थोड़ा तो बदलेगा और हाँ शाम को ही हमारे चपरासी रामदीन की बेटी की शादी भी है वहाँ जाने का ज़रा सा भी मन तो नही है पर क्या करूं अपना घर का इतना काम करता है,,और मेरा मन भी बड़ा कोमल है, ठीक है थोड़ी देर उधर से निकलते हुए उससे भी मिल चलेंगे और सौ रुपये का लिफ़ाफ़ा भी दे देंगे,,खुश हो जाएगा बेचारा,,,ये गरीब लोग थोड़े में ही खुश हो जाते हैं पागल जो होते हैं दया को प्यार समझने लगते हैं,,,अरे बहुत बात हो गई ,,ठीक है मैं शाम को जल्दी पहुँचता हूँ,,,कहकर दिनेश ने फोन रख दिया ,,मालती भी गाते गाते तैयार होने लगी,,,ये सोचे बिना कि उस गरीब की बेटी को ज्यादा जरूरत है अच्छे उपहार की जो उसकी ज़िन्दगी में बहुत काम आएगा और वो उसे ज़िन्दगी भर दुवाएँ भी देगी।।।
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दूसरी तरफ चपरासी रामदीन की बेटी की शादी भी है.... वहाँ जाना दिनेश के केवल औपचारिकता निभाने से ज्यादा कुछ मायने नहीं है.....। कथानक यहीं अपने अप्रकट भाव के साथ पाठक को झन्कझोरता है.....। अपना संदेश कहता है.... कि बॉस रमेश के यहाँ की शादी में महंगा तोहफा, अच्छी शराब, लजीज खाना सब कुछ तैयारी की.... लेकिन विचार यह नहीं किया कि.... महंगा तोहफा बॉस को प्रसन्न कर पायेगा या नहीं...? लजीज खाना जरूर मिलेगा.... लेकिन सम्मान की दरकार बनी रहेगी....? इसके उलट रामदीन के यहाँ लिफ़ाफ़े का वजन चाहे जो होता.... परंतु इस बात की पूरी गारंटी थी कि.... चपरासी का पूरा परिवार दिनेश की शानदार आवभगत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता....।
हैसियत के मार्फत... हमारे तय मापदंडों को खंडित करती यह कहानी अपनी... बात पूरे सामर्थ्य से कहती है.....। भाषा की सरलता से कथानक प्रभावी बन पाया है..... और अपना प्रवाह बरकरार रखते हुए.... सामाजिक मानसिकता को दर्शाता है....।
भाई गुलशन प्रेम..... हमारे गुल्लु भैया को शानदार कहानी के लिए... जानदार बधाई तो बनती है....।
शैलेश तिवारी, संपादक
#हैसियत
दिनेश का दोपहर में आफिस से फोन आया ,,,सुनो मालती आज हमारे मैनेजर रमेश जी के बेटे की शादी में चलना है,,शहर के सबसे बड़े होटल में शादी है,,कितने रुपये लगा कर शादी कर रहे हैं,,देखो वहाँ बहुत बड़े बड़े लोग आएंगे,,और खाने के लिए भी सुना है बाहर से हलवाई बुलाये हैं,,,और महँगी शराब भी मिलेगी,,तुम अच्छे से तैयार हो जाना और हाँ मेरा नीला वाला कोट प्रेस करवा देना और जूते भी पोलिश करवा देना,,एक ही साँस में बोले जा रहा था दिनेश,, मालती ने बीच मे ही टोकते हुए कहा ठीक है तुम जल्दी आ जाना मैं भी पार्लर जाकर तैयार हो आती हूँ,,,और हाँ गिफ्ट क्या देना है,,,दिनेश बोला गिफ्ट तो अच्छा ही देना होगा बहुत काम हैं इस मैनेजर से,,खुश हो जाएगा,, हमेशा मेरे ऊपर रोब झाड़ता रहता है,,थोड़ा तो बदलेगा और हाँ शाम को ही हमारे चपरासी रामदीन की बेटी की शादी भी है वहाँ जाने का ज़रा सा भी मन तो नही है पर क्या करूं अपना घर का इतना काम करता है,,और मेरा मन भी बड़ा कोमल है, ठीक है थोड़ी देर उधर से निकलते हुए उससे भी मिल चलेंगे और सौ रुपये का लिफ़ाफ़ा भी दे देंगे,,खुश हो जाएगा बेचारा,,,ये गरीब लोग थोड़े में ही खुश हो जाते हैं पागल जो होते हैं दया को प्यार समझने लगते हैं,,,अरे बहुत बात हो गई ,,ठीक है मैं शाम को जल्दी पहुँचता हूँ,,,कहकर दिनेश ने फोन रख दिया ,,मालती भी गाते गाते तैयार होने लगी,,,ये सोचे बिना कि उस गरीब की बेटी को ज्यादा जरूरत है अच्छे उपहार की जो उसकी ज़िन्दगी में बहुत काम आएगा और वो उसे ज़िन्दगी भर दुवाएँ भी देगी।।।
गुलशन प्रेम, कोटा, राजस्थान
-----------परिचय
गुलशन प्रेम... कोटा राजस्थान से हैं और एक ऐसा नाम जिसके अंदर साहित्य एक जुनून की तरह जिंदा है..। पेशे से एम आर हैं तो घुमक्कड़ है लेकिन कहीं भी साहित्य आयोजन हो, गुलशन भाई जरूर शिरकत करते हैं। रिश्तों को जीना भी इनसे सीखा जा सकता है। घर में भी एक म्युजिक लाइब्रेरी सजा रखी है। गुलशन जी का एमपी मीडिया पॉइंट में स्वागत है।-------------------
समीक्षा
हैसियत...... गुलशन प्रेम की कलम से निकला हुआ ऐसा कथानक है.... जो आकार में भले ही छोटा हो... लेकिन अपने अर्थपूर्ण संदेश को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है...। कहानी का नायक दिनेश फ़ोन से अपनी पत्नी मालती से.... जो कुछ भी बातें करता है...। वही बातें कथानक का सार हैं....। जो स्पष्ट करती है हमारी स्वार्थपूर्ण मानसिकता को.... हैसियत के उन खोखले मापदंडों को भी उजागर करती है.... जो खुशी से ज्यादा सुविधा की वकालत करते हैं.... स्वार्थ की पैरवी करते हैं....। बॉस की शादी की तैयारी... दर्शाती है कि... बॉस को खुश करके अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने का सपना नायक दिनेश ने पाल लिया है..... वो सपना उसका होगा या नहीं होगा..... यह भविष्य के गर्भ में है....।दूसरी तरफ चपरासी रामदीन की बेटी की शादी भी है.... वहाँ जाना दिनेश के केवल औपचारिकता निभाने से ज्यादा कुछ मायने नहीं है.....। कथानक यहीं अपने अप्रकट भाव के साथ पाठक को झन्कझोरता है.....। अपना संदेश कहता है.... कि बॉस रमेश के यहाँ की शादी में महंगा तोहफा, अच्छी शराब, लजीज खाना सब कुछ तैयारी की.... लेकिन विचार यह नहीं किया कि.... महंगा तोहफा बॉस को प्रसन्न कर पायेगा या नहीं...? लजीज खाना जरूर मिलेगा.... लेकिन सम्मान की दरकार बनी रहेगी....? इसके उलट रामदीन के यहाँ लिफ़ाफ़े का वजन चाहे जो होता.... परंतु इस बात की पूरी गारंटी थी कि.... चपरासी का पूरा परिवार दिनेश की शानदार आवभगत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता....।
हैसियत के मार्फत... हमारे तय मापदंडों को खंडित करती यह कहानी अपनी... बात पूरे सामर्थ्य से कहती है.....। भाषा की सरलता से कथानक प्रभावी बन पाया है..... और अपना प्रवाह बरकरार रखते हुए.... सामाजिक मानसिकता को दर्शाता है....।
भाई गुलशन प्रेम..... हमारे गुल्लु भैया को शानदार कहानी के लिए... जानदार बधाई तो बनती है....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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