लेखिका 

आत्म हत्या एक लड़ाई अपने आप से .... 


हम से ना जाने कितने ही लोग ऐसे होते है जो अपने अंर्तमन से लड़ नहीं पाते और आत्म हत्या कर लेते है,जिंदगी की परतें उधेड़ती एक सुपरिचित सच्चाई ,जहां परिस्थितयां बड़ी और जिंदगी छोटी हो जाती है,आत्महत्या एक लड़ाई है अपने आप से,यह जीवन से निराशा की चरम अभिव्यक्ति है,अपने अंर्तमन से लड़ते हुये हार जाना ही आत्म हत्या का अंतिम रूप है,आत्मघाती पल उसकी पीड़ा-–---उसके भीतर लड़ने की ताकत से कहीं गहरे है ,द* विचार ----पीड़ा और उससे लड़ने के साधनों के बीच असंतुलन के ही परिणम है,यह लगातार नकारात्मक आत्म विशलेषण घटनाओं और निराशा की श्रृंखला का दुर्भाग्यपूर्ण तीव्र लेकिन सोचा समझा परिणाम है ,जिसका सीधा संबंध पारस्परिक रिश्तों की उपेक्षाओं ,अपेक्षाओं और जीवन में मिली असफलता अवसाद आदि विषयो से है,जीवन के अंत का विचार आमतौर पर जिंदगी की थकी हारी परिस्थतियों में ही आता है-----जहां आप दर्द से मुक्ति के लिये ये कदम उठाना चाहते है------वहां थोड़ी देर के लिये अपने आप से दूरी बना लीजिये और सकारात्मक लोगो से जुड़िये ,जो जीवन के प्रति आशावान है ,अपने संकट से जुझने का अतिरिक्त बोझ अकेले मत उठाइये उसे बांटिए हो सकता है ऐसा करते वक्त आपको अपनी लड़ाई में वह अतिरिक्त साधन मिल जाये जो आपके संतुलन आपकी ऊर्जा ,आपकी इच्छा शक्ति को पुनः निर्माण कर दे,जीवन जो ईश्वर की अनुपम रचना है,उसे बार बार याद करो कि जिंदगी उपहार में मिली नियामत है-----और मिले हुये उपहार खोने या नष्ट करने के लिये नहीं होते ,उन्हें तो सहेजा संजोया जाता है अपनी अतृप्त इच्छाओं को उद्देश्यो से मिलाओं ,मन को दुश्मन ना बनाओ ,संघर्ष करो और विजय पाओ ,उम्मीदें आकाश हो जाती है,अगर आकाश के रंग जिंदगी में मिला लो ,मौजूदा पलों से निकल कर बचपन के उन गलियारों में चले जाओं जहां बरसात का पानी और कागज की नाव थी ---पर फिर भी नाव के तैर कर निकल जाने की अथाह खुशी थी -----फिर क्यूं आज जब किसी ने तोड़ा तुम्हारे विश्वास का आईना--- हर टुकड़ा संभाल कर रखा तुमने ---जब कभी सुने आक्षेप ,हर इल्जाम को सहेजा तुमने ,बीतते वक्त कि नब्ज नहीं छोड़ी तुमने ----चाहे हर खुबसूरत पल सिसकियां लेता रहा काश की तुम जमा कर पाते हर उस क्षण का हिसाब जब मौत ने तुमसे जिंदगी मांगी थी

लम्हों कि नाराजगियो में एक मंत्र तुमने सीखा होता
ये वक्त भी गुजर जायेगा------
जिंदगी फिर तुम्हें जिंदा नजर आने लगती । 

 मंजु श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा, मप्र

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