लेखिका 


मन की सुंदरता

शोभना बचपन से ही नटखट स्वभाव की थी। किन्तु वह अपने स्वभाव को सभी के सामने जाहिर नही करती थी।
वह बच्चों के सँग बच्ची और बड़ों के सङ्ग बड़ी बन जाती थी और कभी बेवज़ह ही शांत होकर एक कोना पकड़कर बैठ जाती थी।
वह बहुत जल्दी क्रोधित भी हो जाती थी। मगर उसमे एक ख़ास बात भी थी कि उसे गलत बात बिल्कुल पसँद नही थी। वह हर माहौल में ढल तो जाती थी, लेकिन उसे व उसके स्वभाव को समझने वाला कोई नही था।
शोभना बहुत ही जज्बाती और संवेदनशील लड़की थी। वह दूसरे के दुख को अपना समझकर कभी   स्वयं ही हैरान परेशान हो जाती थी।
शोभना बी०ए० प्रथम वर्ष की छात्रा थी जो कि पढ़ने में बहुत ही होशियार थी। इसलिए कॉलेज के सभी लड़के उस पर जान छिड़कते थे परंतु शोभना किसी को तनिक भी अपने करीब  फटकने नही देती थी।
उसकी सभी सहेलियां उससे इसलिये चिढ़ती भी थी। इसमें क्या है जो मुझमें नही  है। धीर- धीरे समय गुजर रहा था कि शोभना का जीवन ही अगले दिशा में बदल गई।

शोभना रोजाना की भाँति उस दिन भी कॉलेज जा रही थी, जिस दिन उसका जन्मदिन था।
घर के सभी लोग उसे उस दिन मना कर रहे थे कि शोभू आज कॉलेज मत जा, आज हम सबलोग तेरे बर्थडे पर कुछ स्पेशल करेंगे। फिर भी वह नही मानी। क्योंकि उसे अपने दोस्तों को पार्टी देनी थी, इसलिए।

शोभना खुशी खुशी कॉलेज जा रही थी वह अपने जन्मदिन को बहुत ही अधिक मान देती थी। वह उस दिन पूजा पाठ करके अपने सुखद भविष्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। वह उस दिन पीले रँग की फ़्रॉक सूट और पीले रंग की एक हाथ मे चूड़ी व दूसरे हाथ मे घड़ी पहनी हुई थी। और माथे पर एक छोटी सी काली बिंदी लगाई थी जिसे वह रोज लगाती है।
वह उस दिन मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा भाँति दिख रही थी।शोभना की इसी सादगी भरी सुंदरता पर कॉलेज के सभी लड़के उस पर फ़िदा थे और उसमें से एक ने तो एकदम से जीना ही दुश्वार कर रखा था। शोभना का, जो इस कॉलेज के प्रिंसिपल का बेटा था। जिससे सभी डरते थे।वह हमेशा ड्रग्स के नशे में धुत्त रहा करता था। वह सबको डराता धमकाता पर लड़कियों पर कभी नज़र उठाकर नही देखता था।मगर शोभना को देख कर वह पागलों जैसा हरक़त करने लगा था।
शोभना उससे परेशान होकर सभी लड़के लड़कियों के सामने एक दिन उसके बदतमीजी पर उसके गाल पर खींचकर अपनी पांचों उंगलियों की छाप छोड़ दी,जिससे
वह मवाली व नशेड़ी लड़का बौखला पड़ा था।वह उसी दिन से बदला लेने के  लिए बेताब हो गया । उस दिन उसको अवसर मिल ही गया। जिस दिन उसका  जन्म दिन था ।  मंद - मंद मुस्कान बिखरी हुई थी। चाँद स्वरूप मुखड़े पर ,जो उसे न सुहाई और  शोभना द्वारा प्रेम प्रस्ताव न स्वीकारने पर व प्रतिशोध की आग में जला हुआ आवेश में आकर रास्ते में उसके चेहरे पर तेजाब का भरा बोतल फेंककर ठहाका मारते हुए बोला- "तुझे अपने सुंदरता पर बहुत नाज़ था न! तो लो अब दिखाओ नाज़।"

इतना बोलकर वह वहाँ से रफूचक्कर हो गया।जनता तमाशा देख रही थी।कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नही आया। जब वह बेसुध होकर सड़कपर कराह रही थी। तब वहाँ मीडिया भी कैमरा लेकर आ खड़ी हो गई। मीडिया वालों के लिए एक नई सनसनीखेज ख़बर मिल गई थी । कुछ दिनों के लिए।
          शोभना की हालत बिगड़ती जा रही थी । तभी भीड़ को चीरकर एक युवक सामने आया। वही शोभना को उठाकर अस्पताल ले गया जो पेशेवर डॉ० ही था , जिसका तबादला हुआ था। इस नये शहर में।  एक हफ़्ते में ही अपने आने वाले मरीज़ो के दिल मे असीम प्यार का बीज बो दिया था जिससे मरीज़ दवा से कहीं ज्यादा इनके व्यवहार से खुश होकर जल्दी ठीक हो जाता था।
वह डॉक्टर नही एक देवता के समान सबको दिखने लगा था।


    शोभना को आये यहाँ एक महीना हो गया था, और स्वास्थ्य भी बेहतर हो रहा था।वह डॉक्टर विक्रम से काफी अच्छे से घुल मिल गई थी उसे विक्रम की जिंदादिली बहुत अच्छी लगती थी।वे हर हाल में खुश नजर आते थे।और इधर विक्रम भी शोभना का समय -समय पर दवा पुछने आ जाते थे।इसी बीच दोनो की दोस्ती हो गई । शोभना को बातों -बातों में शायरी बोलने की आदत ने अपनी ओर आकर्षित कर रही थी विक्रम को।  जब शोभना कुछ बोलती तो दर्द भरी शायरी जरूर बोलती और विक्रम उसके होंठों को  और उसके आँखों को ध्यान से देखता, जिससे शोभना भी वाकिफ़ थी।मग़र वह अपनी जली हुई सूरत के कारण डॉ० विक्रम से नज़रें नही मिला पाती थी। एक दिन बातों ही बातों में डॉ०विक्रम अपनी बात शोभना के सामने रख ही दिए। परन्तु शोभना इंकार कर बैठी और सिसकती हुई बोली- "विक्रम जी आप मुझ जैसी लड़की को क्यों इतना चाहते हो। मेरी जो सुन्दरता थी वह अभिशाप बन गई। मेरे लिए । मैं अब कहीं की नहीं हूँ।" 
फिर कुछ ही क्षण में सम्भल कर बोली- "हम सिर्फ़ दोस्त बनकर आजीवन रहेंगें। वादा कीजिये।"

     "ठीक है जो आपको सही लगे। लेकिन मेरे ख्याल से सुंदरता चेहरे से नहीं, इंसान के मन से होता है। आप दिल से बहुत सुंदर हो।"
विक्रम की बातें सुनकर शोभना विक्रम का कसकर हाथ पकड़कर बोली- "मुझे कभी उम्मीद ही नही था कि आपके जैसा कोई इतना मन से तन से सुंदर साथी मुझे मिलेगा। मेरा जीवन फिर से सँवर गया।"
शोभना के आँखों मे एक पल के लिए खुशी की लहर उमड़ पड़ी।

अरे! शोभना तुम मेरे जीवन की रौशनी हो। अब तुमसे ही मेरा बंजर घर फिर से हरा- भरा होगा।घर की शोभा बढ़ेगी। तुम अपने पवित्र व सुंदर मन से मेरे नहीं... अपने घर को सुसज्जित करोगी।
बस एक दिन दो दिन में तुम्हारे डिस्चार्ज होने के बाद मैं अपने पापा को लेकर तुम्हारे घर आऊँगा। 
जीवन भर के लिए। तुम्हारा हाथ और साथ दोनों माँगने के लिए। और साथ ही साथ उस मवाली को भी सलाखों के पीछे करके तुम्हे न्याय भी दिलाने की भरसक प्रयास करूँगा।"

शोभना का वो चँचल पन कहीं विलुप्त हो चुका था। रेत के भाँति सब बिखर गया था।
उसके लिए, उसका चेहरा ही एक  पहचान थी। वह भी जल कर ख़ाक हो गया।
शोभना बूत समान ख़ामोश होकर आँखों में प्रेम के समंदर को थाम कर विक्रम को एक टक देखे जा रही थी। और भविष्य के दिन के लम्हों को सँजोने के लिए कुछ सँकोच-सी सोच लिए अग्रसरित होने को उतावली भी हो रही थी।

अंजली श्रीवास्तव,  फिरोजाबाद उप्र

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समीक्षा

मन की सुंदरता.... एक कहानी है लेकिन ये अपने अंदर सामाजिक विषमताओं को समेटे हुए है... कथ्य सीधा है लेकिन... जो भाव हैं वह गंगा की कल कल करती धाराओं की तरह... पाठक के अंतर्मन को उद्वेलित करते हैं... एक लहर दूसरी लहर पर सवार होती है...। कथानक की बुनावट भले ही एक प्रचलित....  घटना पर आधारित है... परंतु कहती कुछ अधिक ही है....। बिंदु दर बिंदु जब इसके गूढार्थ को समझते हैं.... तब परिभाषित होती है समाज के विभिन्न वर्गों  के मन से गायब सुंदरता....। जो नैतिक रूप से होना चाहिए.... लेकिन नजर नही आती....। यही विडंबना लेखिका की कलम.... कथानक के आगे बढ़ते क्रम में उद्घाटित होती जाती है...। 
किसी भी लड़की की प्रतिभा का.... उसके व्यवहार का... उसके जीवन के आदर्शों का... उसके अंर्तमन की भावनाओं... आदि का वह सम्मान नहीं होता.... जिसकी वह अधिकारिणी है.... इसके उलट उसके रूप के.. सौंदर्य के प्रति विपरीत लिंग में आकर्षण होना.... इस इक्कीसवीं सदी में.. भी त्रासदी का जनक बन जाना है.....। दूसरा प्रिंसिपल पिता का दिशाहीन पुत्र का... स्वेच्छाचारी आचरण उस को अपराध के रास्ते पर अग्रसर कर देता है... आश्चर्य है उसको रोकने का प्रयास नहीं होता.... वरन वह अपराधी सत्ता (पिता की कुर्सी) का संरक्षण पा जाता है... मनमानी करता है.... और महाविद्यालय परिसर के नियमों को ताक में रख कर अहंकारी हो जाता है.... परिणाम में शोभना के चेहरे का सौंदर्य उसके घमंड की अग्नि के तेज़ाब में झुलस जाता है.....। उस समय तमाशबीन बनी भीड़.... का मौन क्या आज के समाज की सच्चाई को बयां करने के लिए काफी नही है...। अपराधी का घटना को अंजाम देकर चले जाना.... पीड़िता के उपचार का प्रयास नहीं किया जाना.... समाज के आंतरिक सौंदर्य के अभाव को दर्शाने के लिए काफी है.....। मीडिया कर्मी भी मानवीय संवेदनाओं को भूलकर अपना कैमरा चलाने में व्यस्त है.... ये कैसा विकास हुआ... ये कैसी जागरुकता आई....? कथानक यह बात बहुत ही आसानी से लेकिन पूरे दम खम से कहता है.....। डॉ विक्रम का देवता बनकर आना ही शोभना के उपचार का मार्ग प्रशस्त करता है...। फिर इलाज के चलते ही.... मन की सुंदरता से आकर्षित होकर.... विक्रम के मन में प्रेम बीज का अंकुरित होना... शोभना के इंकार का इकरार में बदल जाना..... बहुत कुछ अनुकरणीय छोड़ जाता है....। 
कहानी की भाषा को साधारण शब्दों से श्रंगारित कर.... उसे असाधारण सौंदर्य प्रदान कर देना.... लेखिका की कलम का अप्रतिम चमत्कार है......। और चमत्कार को नमस्कार करना.... हम सभी की कमजोरी है....। अंजलि जी आपको.... और आपकी लेखनी दोनों को नमन..... हाँ बधाई भी बढ़िया कथानक के लिए......। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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