लेखक 

जल को जरा नर तुम सहेजो

थे हरे जो खेत कल तक आज बंजर भूमि है वह-
मूल, तृन, जड़, चेतनाएं सब झुलस कर मृत पड़े हैं||

मेघ सावन से गये सब, शीत त्यागे माघ को है-
पेड़ पर्वत त्याग रूठे आस क्यों उर श्लाघ को है||
सूख यमुना और गंगा पूछती है प्रश्न नित दिन-
ढ़ाँढ़सों के इस नगर में हम भला यूँ क्यों खड़े है|
मूल, तृन, जड़, चेतनाएं सब झुलस कर मृत पड़े है|

बावरी, नलकूप, सरिता, सूखते झड़ने सुहाने-
है प्रकृति के उर विकल जब अंत के दिखते मुहाने||
चंद्र पर जल ढ़ूँढ़ते, विक्षिप्त क्यों आतप धरातल-
चित्त क्रंदन कर रहा विक्षोभ सहते नर बड़े है|
मूल, तृन, जड़, चेतनाएं सब झुलस कर मृत पड़े है||

नव धरा उर्वर कहाँ अब, सौम्य रजते श्रीश भाना|
क्षीरसागर में कहाँ अब बच सका जल इष्ट माना||
मृगशिरा नक्षत्र जल को नर सहेजो तो ज़रा तुम-
पूज्य जल को मान लो जिसमें मनुज जीवन जड़े है|
मूल, तृण, जड़, चेतनाएं सब झुलस कर मृत पड़े है||


©-राजन-सिंह

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परिचय

राजन सिंह, दरभंगा बिहार के निवासी हैं। वर्तमान में उत्तर पूर्व दिल्ली में रह रहे हैं।  काव्य के पारंपरिक छंद में  180 प्रकार के छंद में लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा कहानी, लेख, व्यंग व लोकगीत में भी लेखन करते हैं। ..... तत्काल नहीं...... नामक ब्लॉग भी चलाते हैं। आप विभिन्न  साहित्यिक संस्थाओ द्वारा साहित्य की विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय लेखन के सम्मानित हुए हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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