विश्व पर्यावरण दिवस-विशेष

                            लेखक 

इस बार "प्रकृति" मनाएगी... 


हम कल्पना करें सृष्टि के निर्माता ने इस ग्रह को कितना  सुन्दर,सुरम्य और सजीला बनाया होगा और  धरोहर स्वरूप इसे मानव समाज के हाथों सौंपा,लेकिन हम मनुष्यों ने प्रकृति को सँवारने की बजाए सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के साथ खिलवाड़ और दोहन ही किया है। इसी का नतीजा है कि प्रकृति आज हमसे इतनी रुष्ट है और प्रकृति का रौद्र रूप देखने को मानव समाज विवश है। अभी भी मौका है हम अपनी आदतें बदल लें और प्रकृति की चेतावनी भी शायद यही है?

 आज एक छोटे से अदृश्य वायरस के कारण मनुष्य मनुष्य को छूने से मर रहा है ऐसा पहले कभी नहीं हुआ यह प्रकृति और कुदरत की ही मार है,इसका तोड़ हमने सोशल डिस्टनसिंग से किसी हद तक निकाल लिया है। हमें सोचना होगा यह वायरस जिसने आज मनुष्य को मनुष्य से दूर कर घर में ताला बंद कर दिया है यदि यही वायरस हवा में घुल गया  होता और हमारी सांसों तक पहुँच जाता तो हमारा सफाया होने से कोई नहीं रोक सकता था। 

   पर्यावरण व प्रकृति के नाम पर हमें सोचना होगा प्रकृति ने हमें शुद्ध हवा दी हमने वाहनों और कारखानों के धुँए से दूषित कर दिया,प्रकृति ने हमें शुद्ध जल दिया हमने अपशिष्ट पदार्थों और रासायनिक केमिकलों के उपयोग  से दूषित कर दिया,प्रकृति ने हमें चारों ओर हरियाली दी हमने वनों की कटाई कर पृथ्वी को बंजर बना दिया, प्रकृति ने हमें बहती नदियाँ दी हमने सूखा दी ,प्रकृति ने हमें ऊँची-ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँ दी हमने काटकर घुमावदार सड़कें बना दी,प्रकृति ने हमें घने जंगल दिए हमने लकड़ियाँ काटकर कारखाने और चूल्हे जला दिये, प्रकृति ने हमें पेट भरने के लिए भूमि दी हमने रासायनिक छिड़काव कर मिट्टी की उर्वरक शक्ति नष्ट कर दी यही कारण है कि आज प्रकृति व कुदरत की चौतरफा मार मानव समाज झेल रहा है,तभी तो पृथ्वी पर कोरोना  का कहर, आसमान में बेमौसम बारिश और टिड्डी दल, पाताल से भूकंप के झटके, समुद्रों से उठता भयंकर तूफान का भय  मनुष्य को इशारा कर रहा है कि वक्त रहते  सुधर जाओ?  कुदरत का डंडा मानव समाज पर चौतरफा वार कर रहा है जिस के प्रकोप से बचना नामुमकिन है।

   तालाबंदी के इस 3 माह में कुदरत ने हमें बता दिया है कि सिर्फ एक चीज कायम रहेगी वह है- प्रकृति। यही कारण है कि हमारे बनाए बड़े-बड़े हवाई जहाज,बुलेट ट्रेने, कारखानें, एयरपोर्ट,बंदरगाह,बड़े-बड़े मॉल, स्कूल- कॉलेज आज सब वीरान पड़े हैं, मनुष्य घर में ताला बंद है।इसके विपरीत आसमान काँच की तरह स्वच्छ नीला हो गया है,पृथ्वी पर रेंगने वाला मनुष्य घर में बंद है, अरबों रुपए खर्च करके जिन नदियों की सफाई नहीं हुई थी उनका जल आचमन योग्य हो गया है,वातावरण की हवा में जो हमने जहर घोला था वह स्वच्छ हो गया है, यह कुदरत औऱ प्रकृति का ही चमत्कार है।

 1972 से हम 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे है, सोचना होगा वास्तविकता में यदि हम पर्यावरण को अमल में लाते तो क्या आज प्रकृति हम से रुष्ट होती।पर्यावरण को हमने दिवस के तौर पर मनाया यदि मिशन के तौर पर मनाया होता तो तस्वीर बदली नजर आती। अगर हमारे अंदर मानवता और संवेदना बची  है तो इस वर्ष हम पर्यावरण दिवस पर शपथ लें कि अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें, नदियों को दूषित होने से बचाए, वातावरण को अशुद्ध होने से बचाए, जो हमने प्रकृति में असंतुलन पैदा किया है उसे संतुलित करें अन्यथा हमारे साथ ही आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा?

 दीपक अग्रवाल, इंदौर (मध्यप्रदेश )

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