लेखिका
पर उसने ये कहकर उसे चुप करवा दिया कि मैं जैसे तैसे मेहनत करके बच्चों की फीस भर दूंगा पर पढ़ाऊंगा अच्छे स्कूल में ही। मैं तो जिन्दगी में कुछ बन नहीं पाया, अपने बेटों को खूब पढ़ाऊंगा लिखाऊंगा।
संदल एक छोटी सी कंपनी में सुपरवाइजर का काम करता था। बहुत कुछ करना चाहता था वो अपनी जिंदगी में, पर पहले मां बाप भाई बहनों की जिम्मेदारी और अब अनन्या और दो बेटों की। पर उसने कभी हार नहीं मानी न ही अपनी हिम्मत टूटने दी और हर एक परिस्थिति में उसकी साथी और प्रेरणा बनीं उसकी पत्नी जो कि अर्धांगिनी होने के सारे फ़र्ज़ बखूबी निभाती चली आ रही थी उसके साथ। घर को सम्हालने के साथ साथ वो बच्चों को ट्यूशन भी दिया करती थी। दोनों मिल बांट कर घर चला रहे थे।
जैसे तैसे सबकुछ ठीक चल ही रहा था कि अचानक इस कोरोना नामक महामारी ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया। सबकुछ बंद हो गया, हर तरफ़ हाहाकार मच गया। लोग संक्रमित होकर मरने लगे। काम धंधा, व्यापार, रोजगार, सब खत्म हो गया हो। दायरे में सिमट कर रह गये लोग। न जाने कैसी आपदा ने घेर लिया दुनियां को, कोई कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। सब कुछ प्रभावित हो रहा था।
जिनके पास अनाप शनाप पैसा भरा हुआ था उनका तो गुज़ारा हो रहा था अच्छे से। पर जो गरीब और मध्यम वर्गीय लोग थे उनका जीवन रहन सहन परेशानियों में आ गया था। जिनके पास सिर्फ गुज़ारे लायक पैसा हो और कोई जमापूंजी भी न हो, ऐसे में उनकी स्थिति बहुत कष्टप्रद होती जा रही थी। बच्चों की आनलाइन कक्षाएं भी शुरू हो गयी थी। प्रियम और आध्यम के स्कूल से रोज संदेश आ रहे थे फीस भरने के लिए।
संदल और अनन्या चिंतित थे कि तीन तीन हजार दोनों बच्चों की फीस कैसे भरें। इसी सोच में पांच दिन गुज़र गये।
बाबूजी और मां की दवाईयां भी तो लेनी हैं। घर का सामान भी खत्म हो गया है। कैसे क्या करूं, इसी सोच में डूबता उतराता संदल
, खोया परेशान सा सड़क पार कर ही रहा था कि सामने से आती हुई कार की चपेट में आ गया और उसे कुछ होश न रहा। आंख खुली तो वो अस्पताल में पड़ा हुआ था। उसके पांव की हड्डी टूट गयी थी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
, "अब क्या होगा अनु,"
अनन्या ने हौले से उसका हाथ थाम कर कहा, "हम साथ हैं न संदू, सब ठीक हो जाएगा, ये कहकर अनन्या भी गहरी सोच में डूब गयी और उसने पति से छुपाकर अपने आंसू पौंछ लिए। हकीकत सामने थी, फसाना पीछे छूट चुका...।
निधि भार्गव मानवी, गीता कालोनी, ईस्ट दिल्ली
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आपके चार साझा काव्य संकलन और एकल काव्य संग्रह - अनकहे जज़्बात नाम से प्रकाशित हो चुका है। दो पुस्तकें शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। कई टीवी चैनल पर आप काव्य पाठ भी कर चुकी हैं। आपको विभिन्न मंचों से पुरस्कृत और सम्मानित किया जा चुका है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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जिंदगी, तूने इतनी कम दी है जमीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार से सर लगता है....
ऐसा ही कुछ घटता है संदल की जिंदगी में... उसके सपने पूरे करने में.... सहायक बनी है उसकी हमसफर.... अनन्या.....। लेकिन .... वही होता है जो मंजूर ए खुदा होता है....। महामारी के कहर ने.... उनकी गृहस्थी की चादर को और छोटा कर दिया.... अब माँ बाप.... और संतान.... दोनो अपनी अपनी तरफ खींच रहे हैं.... जाऊँ कहाँ बता ए दिल... की तर्ज पर... उधेड़ बुन में उलझा संदल... भूल जाता है कि... वह सड़क पर चल रहा है.... और घटना में घायल होकर... टांग तुडवा लेता है.... आँखों से बहते आँसू.... सपने बिखर जाने की गवाही देते हैं.... लेकिन अनु का मुँह फेर कर.... आँखों की नमी को टपकने से रोकते हुए... सब ठीक हो जाने का विश्वास संदु को दिला देना.....। यहीं आकर जिंदगी के दो राह पर खड़े हो जाने अहसास कथानक करा देता है.....। सरल सीधे शब्दों के वाक्य विन्यास से कहानी की बुनावट की गई है... जो गतिमान भी बनी रहती है.... और निम्न मध्यम वर्ग के दर्द के हिमालय के दर्शन कराती है....। सुंदर शब्द चित्रण..... बधाई निधि जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक
फसाने की हकीकत....
संदल का एक ही तो सपना था कि उसके बच्चे अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई करें। दो साल पहले ही उसने प्रियम और आध्यम का दाखिला पास वाले अंग्रेजी स्कूल में करवा दिया था। दोनों बच्चों में एक साल की छोट बढ़ाई थी। अनन्या ने बोला भी कि, "संदल, इतने मंहगें स्कूल में क्यूं डाल रहे हो, हम कैसे इतना खर्च उठा पाएंगें,"!पर उसने ये कहकर उसे चुप करवा दिया कि मैं जैसे तैसे मेहनत करके बच्चों की फीस भर दूंगा पर पढ़ाऊंगा अच्छे स्कूल में ही। मैं तो जिन्दगी में कुछ बन नहीं पाया, अपने बेटों को खूब पढ़ाऊंगा लिखाऊंगा।
संदल एक छोटी सी कंपनी में सुपरवाइजर का काम करता था। बहुत कुछ करना चाहता था वो अपनी जिंदगी में, पर पहले मां बाप भाई बहनों की जिम्मेदारी और अब अनन्या और दो बेटों की। पर उसने कभी हार नहीं मानी न ही अपनी हिम्मत टूटने दी और हर एक परिस्थिति में उसकी साथी और प्रेरणा बनीं उसकी पत्नी जो कि अर्धांगिनी होने के सारे फ़र्ज़ बखूबी निभाती चली आ रही थी उसके साथ। घर को सम्हालने के साथ साथ वो बच्चों को ट्यूशन भी दिया करती थी। दोनों मिल बांट कर घर चला रहे थे।
जैसे तैसे सबकुछ ठीक चल ही रहा था कि अचानक इस कोरोना नामक महामारी ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया। सबकुछ बंद हो गया, हर तरफ़ हाहाकार मच गया। लोग संक्रमित होकर मरने लगे। काम धंधा, व्यापार, रोजगार, सब खत्म हो गया हो। दायरे में सिमट कर रह गये लोग। न जाने कैसी आपदा ने घेर लिया दुनियां को, कोई कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। सब कुछ प्रभावित हो रहा था।
जिनके पास अनाप शनाप पैसा भरा हुआ था उनका तो गुज़ारा हो रहा था अच्छे से। पर जो गरीब और मध्यम वर्गीय लोग थे उनका जीवन रहन सहन परेशानियों में आ गया था। जिनके पास सिर्फ गुज़ारे लायक पैसा हो और कोई जमापूंजी भी न हो, ऐसे में उनकी स्थिति बहुत कष्टप्रद होती जा रही थी। बच्चों की आनलाइन कक्षाएं भी शुरू हो गयी थी। प्रियम और आध्यम के स्कूल से रोज संदेश आ रहे थे फीस भरने के लिए।
संदल और अनन्या चिंतित थे कि तीन तीन हजार दोनों बच्चों की फीस कैसे भरें। इसी सोच में पांच दिन गुज़र गये।
बाबूजी और मां की दवाईयां भी तो लेनी हैं। घर का सामान भी खत्म हो गया है। कैसे क्या करूं, इसी सोच में डूबता उतराता संदल
, खोया परेशान सा सड़क पार कर ही रहा था कि सामने से आती हुई कार की चपेट में आ गया और उसे कुछ होश न रहा। आंख खुली तो वो अस्पताल में पड़ा हुआ था। उसके पांव की हड्डी टूट गयी थी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
, "अब क्या होगा अनु,"
अनन्या ने हौले से उसका हाथ थाम कर कहा, "हम साथ हैं न संदू, सब ठीक हो जाएगा, ये कहकर अनन्या भी गहरी सोच में डूब गयी और उसने पति से छुपाकर अपने आंसू पौंछ लिए। हकीकत सामने थी, फसाना पीछे छूट चुका...।
निधि भार्गव मानवी, गीता कालोनी, ईस्ट दिल्ली
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परिचय
निधि भार्गव मानवी गीता कालोनी, दिल्ली की निवासी हैं। गृहणी होने के साथ साथ साहित्य के सेवा करती रहती हैं।आपके चार साझा काव्य संकलन और एकल काव्य संग्रह - अनकहे जज़्बात नाम से प्रकाशित हो चुका है। दो पुस्तकें शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही हैं। आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। कई टीवी चैनल पर आप काव्य पाठ भी कर चुकी हैं। आपको विभिन्न मंचों से पुरस्कृत और सम्मानित किया जा चुका है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
फसाना यानि कल्पना... और हकीकत यानि वास्तविकता....। इन दोनों से ही आदमी की बहुत ही नजदीकी है...। आम आदमी हकीकत में दिन और फसाने में रात गुजारता है.....। उसके फसाने ही धीरे धीरे उसके सपने बनते जाते हैं.... और सपने कभी अपने हो नहीं पाते.... ये हकीकत भी सामने आती है....। कथानक में लेखिका की कलम ने उस निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के मुखिया..... संदल के माध्यम से... पूरे वर्ग का दर्द बयाँ किया है.....। यही समाज का वह वर्ग है जिसकी आँखों में सपने... सीने में जज्बा.... मेहनत का संकल्प..... स्थिति बदलने के लिए संघर्ष करता है.... अपने सीमित संसाधनों के साथ.....। फिर शिकायत भी करता है...जिंदगी, तूने इतनी कम दी है जमीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार से सर लगता है....
ऐसा ही कुछ घटता है संदल की जिंदगी में... उसके सपने पूरे करने में.... सहायक बनी है उसकी हमसफर.... अनन्या.....। लेकिन .... वही होता है जो मंजूर ए खुदा होता है....। महामारी के कहर ने.... उनकी गृहस्थी की चादर को और छोटा कर दिया.... अब माँ बाप.... और संतान.... दोनो अपनी अपनी तरफ खींच रहे हैं.... जाऊँ कहाँ बता ए दिल... की तर्ज पर... उधेड़ बुन में उलझा संदल... भूल जाता है कि... वह सड़क पर चल रहा है.... और घटना में घायल होकर... टांग तुडवा लेता है.... आँखों से बहते आँसू.... सपने बिखर जाने की गवाही देते हैं.... लेकिन अनु का मुँह फेर कर.... आँखों की नमी को टपकने से रोकते हुए... सब ठीक हो जाने का विश्वास संदु को दिला देना.....। यहीं आकर जिंदगी के दो राह पर खड़े हो जाने अहसास कथानक करा देता है.....। सरल सीधे शब्दों के वाक्य विन्यास से कहानी की बुनावट की गई है... जो गतिमान भी बनी रहती है.... और निम्न मध्यम वर्ग के दर्द के हिमालय के दर्शन कराती है....। सुंदर शब्द चित्रण..... बधाई निधि जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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