लेखिका 


अच्छाई_के_साइड_इफैक्टस

अक्सर बहुत से मित्र मेरे बारे में अपने कमेंटस में कहते हैं"आप बहुत अच्छी हो।" पता नहीं वो मेरे बारे में कितना जानते हैं। पर बहुत गहराई से सोचती हूँ, तो यह विचार आता है मन में कि आप किसी को क्यों और कब तक अच्छे लगते हैं। आपका मधुर स्वभाव, दूसरों के सुख दुख को समझना, किसी की सहायता करना, दूसरों से प्यार से मुस्कुरा कर बात करना, यही सब बातें आपको अच्छा साबित करने के लिए काफी हैं या और भी कोई पैमाना है अच्छाई का। क्या वाकई दूसरों की नजरों में अच्छा होना इतना आसान है?

नहीं, बिल्कुल नहीं।अच्छा होना मतलब अपने व्यक्तित्व की सम्पूर्ण रूप से विवेचना कर उसमें व्याप्त सभी कमजोरियों को भी अवलोकन करना मांगता है। और इनमें आपकी कुछ स्वाभाविक कमजोरियां भी शामिल हैं, जिन्हें लोग आपकी अच्छाई बताकर सारी उम्र आपकी इस कमजोरी का फायदा उठाते रहते हैं। इनमें प्रमुख बात है कि बिना किसी की बात का विरोध किए खामोशी से उसकी बात सुनते जाना, चाहे आप उससे सहमत हो या न हो। बस अपनी अच्छाई को सम्भालने की खातिर उसके अच्छे बुरे शब्दों और कई बार तो व्यवहार को भी सहन करते रहना पड़ता है।

एक और पहलू है अच्छे होने का जिसका खमियाजा आपको ताउम्र भरना पड़ता है। वो है बिना अपने कम्फर्ट की परवाह किए दूसरों की मदद करते चले जाना। किसी के लिए बाजार जाना, कुछ बनाकर देना, हर काम में सहायता के लिए खुद ब खुद तैयार रहना, बिना इस बात की परवाह किए कि आपकी सेहत और समय आपका साथ दे रहे या नहीं। बस इतना मन मस्तिष्क में रहता है कि इसके बदले में प्रशंसा के दो शब्द सुनने को मिल जाते हैं आपको कि आप बहुत अच्छे हो।

यहाँ तक सब ठीक चलता रहता है। परेशानी तो तब होती जब लोग आपकी इसी अच्छाई को कमजोरी समझ नाजायज फायदा उठाने लगते हैं। कोई भी, कहीं भी, कभी भी आपको खरी खोटी सुना देता है और आपका आत्मसम्मान आपको कचोटने लगता है कि आखिर कब तक, कब तक सहन करना होगा यह सब और आपको क्या मिल रहा आपकी इस अच्छाई के बदले में? और दूसरों की बिना किसी स्वार्थ की गई मदद के बदले में भी आप खुद को छला हुआ महसूस करने लगते।

परिस्थतियां तब बिगड़ जाती हैं जब आप को एहसास होता है कि आपको तो सारी उम्र इस्तेमाल किया जाता रहा है आपकी अच्छाइयों के बदले में। बस तब आप भी अपने व्यवहार में बदलाव लाने के लिए उत्सुक होते हैं। हो सकता है सामने वाले का दुर्व्यवहार सहने से आप तब इंकार कर दें और किसी द्वारा सौंपे गए काम को असुविधा देखते हुए इंकार कर दें।

सोचकर देखिए, इन हालात में दूसरों का व्यवहार कैसे मिनटों में आपके प्रति बदल जाता उ। सबकी नजरों में गाय बने रहने वाले आप कब उन्हीं की आँखों में किरकिरी बन जाते हैं, पता भी नहीं चलता। अच्छे से बुरा बनने के बीच बिल्कुल एक महीन रेखा है जिसे मैंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा है। तो अब जब कोई भी मेरी तारीफ करता है कि "आप बहुत अच्छी हो" , तो कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। आप सबकी भावनाओं की बहुत कद्र करती हूँ, पर सच कहूँ, तो अच्छे बनने से बहुत डर लगता है। 

सीमा भाटिया

----------------------
परिचय 

सीमा भाटिया जी लुधियाना पंजाब से हैं। गृहस्थी के दायित्वों के साथ साहित्य की अनवरत सेवा करती आ रही हैं। काव्य और कथा दोनों के ही साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा भी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। मानवीय संवेदनाओं को शब्द देने वाली शब्द शिल्पी सीमा जी का एमपी मीडिया पॉइंट में स्वागत है।
संपादक
Share To:

Post A Comment: