लेखिका
औरत और चिरइया
एक ही तो हैं...
तिनका-तिनका कर
अपना नीड़ सहेजते हुए...
एक भी सिरा न छूटने पाए...
कहीं कुछ अधूरा न रह जाए...
सुबह से शाम तक
एक धूरी पर नाचती
चिरइया से कलेजे वाली औरत...
ज़माने के हर चलन
को पहचानते हुए
मन के विचलन को
संयम और संस्कारों के परिधि में बाँधते हुए..
निरंतर कर्मपथ गामिनी...
रोती है औरत खुशी में भी...
बेरंग आँसुओं में भी
आह्लाद का रंग सजोकर
बेटे और बेटी में बचपन के
गुड्डे-गुड़िया को सहेजती औरत...
सुन रे बावरी !
मुझे तेरा यह रूप पसंद है...
नहीं जाना मुझे समय के साथ...
नहीं जीतना मुझे
किसी जंग को..
मेरा ये घर ही
मेरी कायनात है..
साथी का सशक्त कंधा...
और जिम्मेदारियों के बोझ को संभालने के बीच
दो स्नेह भरे बोल चाहिए बस...
मुझे गर्व है फिर तो
मेरे औरत के अस्तित्व पर..
बस चिरइया की तरह ही
मेरा गगन उनमुक्त हो
लौटकर चिरइया की तरह
संस्कारों की परिधि में स्वयं को सहेजे मैं...
बार-बार अपने नीड़ में ही आऊँगी...
हाँ, सच ही तो है..
ओरत और चिरइया एक ही से हैं
औरत और चिरइया.......
औरत और चिरइया
एक ही तो हैं...
तिनका-तिनका कर
अपना नीड़ सहेजते हुए...
एक भी सिरा न छूटने पाए...
कहीं कुछ अधूरा न रह जाए...
सुबह से शाम तक
एक धूरी पर नाचती
चिरइया से कलेजे वाली औरत...
ज़माने के हर चलन
को पहचानते हुए
मन के विचलन को
संयम और संस्कारों के परिधि में बाँधते हुए..
निरंतर कर्मपथ गामिनी...
रोती है औरत खुशी में भी...
बेरंग आँसुओं में भी
आह्लाद का रंग सजोकर
बेटे और बेटी में बचपन के
गुड्डे-गुड़िया को सहेजती औरत...
सुन रे बावरी !
मुझे तेरा यह रूप पसंद है...
नहीं जाना मुझे समय के साथ...
नहीं जीतना मुझे
किसी जंग को..
मेरा ये घर ही
मेरी कायनात है..
साथी का सशक्त कंधा...
और जिम्मेदारियों के बोझ को संभालने के बीच
दो स्नेह भरे बोल चाहिए बस...
मुझे गर्व है फिर तो
मेरे औरत के अस्तित्व पर..
बस चिरइया की तरह ही
मेरा गगन उनमुक्त हो
लौटकर चिरइया की तरह
संस्कारों की परिधि में स्वयं को सहेजे मैं...
बार-बार अपने नीड़ में ही आऊँगी...
हाँ, सच ही तो है..
ओरत और चिरइया एक ही से हैं


Post A Comment: