रमणीय अमरकंटक


भारतीय मिथक के अनुसार आयुर्वैदग्य हेमन्त मुनी ने अपने सबसे प्रिय शिष्य ‘उदय अरुण’ के शिक्षा समाप्त होने के पश्चात् उन्हें भारत के मध्य भाग में एक पहाड़ी के उपर घने जंगल में भेज दिया था और कहा था इस जंगल में जाकर ऐसा एक पेड़ या पौधा देखकर आओ या लेकर आओ, जिसमें औषधि गुण नहीं हैं। उदय अरुण चला गया और वर्षों घूम घूम कर थककर वापिस आया, व्यर्थता का एहसास लेकर। मन खराब था पर स्वस्थ ही लौटा था। उदय अरुण पूरे समय नर्मदा का पानी ही पीता रहा, जोकि स्वास्थ्य के लिये अत्यंत लाभदायक है। गुरु ने पूछा -
‘‘क्या लाये हो?’’
‘‘गुरु जी! कुछ भी नहीं। वहाँ कुछ ऐसा मुझे नजर ही नहीं आया जिसमें औषधि गुण न हो।’’
गुरु ने खुश होकर शिष्य को गले से लगा लिया और कहा ‘‘तुम्हारी शिक्षा समाप्त हो गई। आज से तुम एक आयुर्वैदग्य बन गये।’’ 
सम्भवतया वह पर्वत और वह वन प्रान्त अमरकंटक ही था। क्योंकि वहाँ के लोग कहते हैं इस मेकल पर्वत में जो भी पेड़-पौधे हैं सब औषधीय गुणों से युक्त हैं। 
आज इस अमरकंटक के बारे में हम बात करेंगे। कहाँ है यह अमरकंटक? और कैसा है? जिसके साथ तीन नदियों की कहानी, गुलबकावली नाम के फूल के बारे में कहानी प्रचलित है। नर्मदा और शोण की शादी की कहानी इत्यादि मिथक इस के साथ जुडे़ हुये हैं? 
यहाँ की लोककथा के हिसाब से शोण नद के साथ नर्मदा जी की शादी तय हुई थी। नर्मदा जी दुल्हन के वेष में तैयार हो रही थी। उनकी सहेली जोहिला विवाह मंडप में गई हुई थी, उसे गये काफी समय हो गया था। जहाँ शोण शादी के लिए आने वाले थे। वर वेष में शोण की कान्ति देखकर जोहिला मोहित हो गई थी और खुद ही नर्मदा बनकर दुल्हन की जगह बैठ गई। नर्मदा जी जब तैयार होकर विवाह मण्डप में सखियों के संग आईं तो देखा जोहिला दुल्हन की जगह बैठी हुई है। क्रोध में आकर नर्मदा जी ने जोहिला को पदाघात किया जिससे वह जाकर शिवजी के चरणों पर जा गिरी और वहीं धरती में समा गई। फिर वहीं से एक विषैली नदी बनकर निकली, कहा जाता है जिसका पानी पीने से लोग बीमार पड़ जाते हैं। नर्मदा जी की शादी मुहुर्त के निकल जाने से सम्पन्न नहीं हो पाई और वे जिन्दगी भर कुंवारी रह गईं। 
नर्मदा, शोण और जुहिला इन तीन नदियों का उद्गम स्थल है अमरकंटक। मेकल पर्वत श्रेणी जो विन्ध्य और सातपुड़ा पर्वत मालाओं को जोड़ती है उसी पर स्थित है यह पावन तीर्थ। वन क्षेत्र में एक छोटी घाटी जिसकी आबादी लगभग 10,000 है। एक छोटा सा कस्बा। अद्भुत सुन्दर पर्वतीय दृश्य चारों ओर वृक्षों, पेड़-पौधों, नदी, झरनों, तालाबों से सजा है यह कस्बा। 
सोनमुड़ा नाम का एक झरना है जो आगे जाकर शोण नदी बन जाता है। इसके उद्गम स्थल पर भव्य मन्दिर बना हुआ है। यह जगह वनसम्पदा औषधियों से भरपूर है। दर्शनीय स्थानों में माई की बगिया --
कहते हैं नर्मदा नदी जिसके दर्शन मात्र से ही समस्त पापों से मुक्त हो जाती हैं जीवात्माएँ, जहाँ गंगा में डुबकी लगानी पड़ती है। उस नर्मदा नदी को वहाँ के लोग माता के रूप से पूजन करते हैं। हिन्दू मिथक के अनुसार देवी नर्मदा अपनी सहेली गुलबकावली के साथ इस बगिया में खेलती थी, झूला झूलती थी और उनकी वह सहेली बाद में फूल बन गई। इस सफेद फूल के रस से आँखों की हर बीमारी ठीक हो जाती है, मोतियाबिंद तक। हजारों लोग इस औषधियों से लाभान्वित हुए हैं। 
नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर भी एक भव्य मन्दिर है। वहाँ पानी स्थिर रहता है इस स्थान पर एक अन्तसलिला है जो बहकर कोपिल धारा के रूप में पहाड़ की ऊँचाई से गिरती है। इस धारा में दुग्ध धारा और शंभु धारा मिश्रित होकर एक अतिसुन्दर प्रपात की सृष्टि हुई है। इस प्रपात की लम्बाई इतनी है कि सिर झुकाकर देखने से भी इति नज़र नहीं आती। चारों ओर झरनों का मुकुट पहनकर खड़ा है, अमरकंटक एक स्वर्गीय चेतना का विकास करते हुए। दुर्गाधारा प्रपात एक अन्य ऐसा ही प्रपात है जिसने घने जंगलों को अतिरमणीय बनाया है। 
चण्डिका गुफ़ा एक प्राकृतिक आश्चार्य है। कबीर चबूतरा पहाड़ी पर एक छोटी सी समतल भूमि है पर्वतीय जनजाति के लोग कहते हैं कबीर यहां बैठकर लिखा करते थे। 
यहां इस कस्बे में वन अनुसंधान विभाग के द्वारा नर्सरी बनी हुई है जहाँ विभिन्न औषधियों पर अनुसंधान का काम जोरां-शोरां से लगातार हो रहा है। मेकल पर्वतमाला आयुवैर्दिक औषधियों का भण्डार है। 
श्री जालेश्वर महादेव मन्दिर जहाँ जुहिला नदी का उद्गम हुआ है। भौगोलिक स्थिति के हिसाब से अमरकंटक 22 डिग्री से 40 अक्षांश 80 से 45 पूर्व देशान्त पर अवस्थित है। यह पटनी-बिलासपुर-रेलमार्ग पर पेंड्रा रोड स्टेशन से 45 किलोमीटर की दूरी पर है। वहाँ से बस या टैक्सी से पहुँचना पड़ता है। यह स्थान बिलासपुर से 120 किलोमीटर की दूरी पर है। रायपुर से 240 किलोमीटर और जबलपुर से 128 किलोमीटर की दूरी पर है, सड़क मार्ग से सम्बंध है। यहाँ पर तापमान दिसम्बर में न्यूनतम 0 डिग्री होता है और अप्रैल में अधिकतम 38 डिग्री होता है, बारिश लगभग 60 इंच है। 
अमरकंटक में हेलीपेड की सुविधा है। ठहरने के लिए सुन्दर-सुन्दर आश्रम हैं। जहां वातावरण शांत और रमणीय है। उसमें से सबसे रमणीय भव्य और अति सुन्दर पारीपार्शिक वातावरण सम्पन्न आश्रम है कल्याण सेवा आश्रम। यह पूज्य बाबा कल्याणदास जी ने स्थापित किया। जहां रहने खाने के लिए निशुल्क व्यवस्था है। नर्मदा डेम के सम्मुख यह भव्य मन्दिर है। जहां आवासीय व्यवस्था अतिसुन्दर है फूल पौधों से भरा बगीचा अति मनमोहक है। अमर कंटक जैसी सुन्दर जगह के लिए अति सुन्दर आवास स्थल ।
अमरकंटक में बरसात के पानी को रोकने के लिये दो डेम बनाये गये हैं। एक सावित्री सरोवर और दूसरा गायत्री सरोवर। पहले हर साल नर्मदा में बाढ़ आने की वजह से बहुत से गांव बह जाते थे। अब वह पानी नियन्त्रित करके सिंचाई के लिये उपयोग में लाया जाता है।  
अमरकंटक एक अतिरमणीय, दर्शनीय, पर्वतीय स्थान है। जहाँ आत्मा को मन को सुकून मिलता है, आँखों को सुख मिलता है। प्राकृतिक हर एक गहने से इस स्थान को ईश्वर ने सजाया, झरने, नदियाँ इत्यादि। यह तीन-तीन नदियों का उद्गम स्थल है। यह स्थान पहले झरना उसके बाद नदी बन कर चलते चलते धरती को नम बना देती है। फसल उगाने के योग्य बना देती है यह नदियाँ। प्राकृति ने बड़े ही लाड़ प्यार से इस अमरकंटक को सजाया। जिसके दर्शन से जीवन आनंदमय बन जाता है। स्वर्ग का स्वाद अस्वादन करती है आत्मा। 
  

कुहेली भट्टाचार्जी (डिब्रूगढ, आसाम)

----------
अंत मे याद आ गई पं भवानी प्रसाद मिश्र की कालजयी रचना

सतपुड़ा के घने जंगल
        सतपुड़ा के घने जंगल।
        नींद मे डूबे हुए से
        ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल.......
Share To:

Post A Comment: