रामराज्य 

आशुतोष राना जी ने उद्घृत किया है - 
दैहिक दैविक भौतिक तापा | राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ||
सब नर करहिं परस्पर प्रीति | चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति ||
अर्थात् राम राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नहीं ब्यापते। वे होते तो हैं किंतु इनके दुष्प्रभाव से लोग बचे रहते हैं। सब मनुष्य एक दूसरे से परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति के अनुसार मर्यादापूर्वक अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करते हैं। 
जिस राज्य की कल्पनामात्र चित्त को शीतलता व मन को प्रसन्नता देने वाली है फिर उसके आरम्भ में ही व्यवधानों की झड़ी क्यों लग गई। 
माता, विमाता हो गई और पुत्र का चौदह वर्षों का कठोर वनवास माँग लिया। पुत्र वियोग में पिता ने प्राण त्यागे और लक्ष्मण ने स्वप्रेरणा से राम के साथ वन जाने का निर्णय लिया। जनकसुता ने पति राम को अपने तर्कों से निरुत्तर कर साथ जाने के लिए स्वीकृति ले ली और भरत ने राजमहल त्याग नंदीग्राम में कुटिया में मुनिवेश में राज्य की बागडोर सम्हाली, कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण अयोध्या अस्त-व्यस्त हो गई। 
रामचरितमानस ऐसे अनेक प्रश्न अवतरित करता है जिनके उत्तर खोज पाना अत्यंत दुश्कर प्रतीत होता है। 
#आशुतोष_राना जी ने अपने ग्रंथ में ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास किया है। 
ग्रंथ अध्ययन की सुविधा एवं प्रसंगों की न्यायोचित व्याख्या के लिए 11 उपखंडों में विभक्त है। 

माता पार्वती ने जब महादेव से राम कथा सुनाने का आग्रह किया तब देवाधिदेव ने कहा-
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए।
कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
अर्थात् श्री हरि विष्णु अनंत हैं उनका कोई पार नहीं पा सकता और इसी प्रकार उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से सुनते और सुनाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते।

यह प्रसंग मैं कहा भवानी।
हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।
सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥

शिवजी कहते हैं कि हे पार्वती! मैंने यह बताने के लिए इस प्रसंग को कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान की माया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु कौतुकी व लीलामय हैं और शरणागत का हित करने वाले हैं। वे सेवा करने में बहुत सुलभ और सब दुःखों के हरने वाले हैं।

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है, जिसे भगवान की महान बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचारकर उस महामाया के स्वामी श्री रामजी का भजन करते रहना चाहिए।
बस उन्हीं लीलाओं के माध्यम से जगत कल्याण के लिए प्रभु श्री राम ने अनेक दृष्टांत प्रस्तुत किए।
राम का सम्पूर्ण व्यक्तित्व मर्यादापुरुषोत्तम का दिखाई देता है। जीवन के हर कार्य का कोई न कोई उद्देश्य है व सुनिश्चित परिणिति है।
एक स्वरूप है जिसमें रघुवीर की सर्वाधिक आलोचना हुई है, वह है गर्भवती सीता का परित्याग। जनसाधारण के लिए यह बात राम का अक्षम्य अपराध है परंतु राना जी ने आत्मावलोकन शैली व शिव-राम संवाद, सीता-राम संवाद के माध्यम से प्रत्येक बिंदु को इस तरह स्पष्ट किया है कि संशय की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं रह पाती।
यूँ तो प्रत्येक खण्ड किसी न किसी शंका का समाधान करता है परन्तु मेरा उद्देश्य यहाँ उसे उल्लेखित कर मैं जिज्ञासा को क्षीण करना नहीं है।
मेरी अपेक्षा सभी मित्रों से है कि रामराज्य को अवश्य पढ़ें व रामचरितमानस के प्रति अपने मन में चल रहे झंझावातों को शांत करें। ऐसे सटीक व सहज ग्रंथ कभी-कभी ही उपलब्ध होते हैं। 
आशुतोष राना जी को इस कालजयी सृजन हेतु साधुवाद एवं अनेकानेक बधाई। 
शुभेच्छु
मुकेश दुबे
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                          समीक्षक
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