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**निर्णय**

  कइयों बार हमें जीवन में निर्णय लेने होते। हर निर्णय हम सदा सजगतापूर्वक और पूर्ण चैतन्य अवस्था में लें ऐसा नहीं होता और सामान्यतः ऐसा हो भी नहीं सकता, पर आप चाहें तो ये संभव है किन्तु आवश्यक नहीं क्योंकि इस तरह करने से आपको जीवन के अनेक पहलुओं, आयामों और अनुभव नहीं प्राप्त हो पायेंगे...
         आप जब निर्णय लेते हैं तो उस समय बहुत सारे पूर्वाग्रहों से प्रभावित होते हैं और निर्णय लेने का सबसे मुख्य कारण अधिकतर किसी स्थिति, परिस्थिति, व्यक्ति और घटना के प्रभाव में आकर आप निर्णय ले लेते हैं किन्तु निर्णय लेते समय आपको इस बात का एहसास नहीं होता कि यह निर्णय आपके लिए कितना कठोर हो जाएगा, यह निर्णय  सामने वाले के लिए कितना कठोर हो जाएगा । जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आप निर्णय लेते हैं या जिस कल्पना के आधार पर कि ऐसा होगा और आप निर्णय ले लेते हैं, इसके विपरीत होना भी संभव है और आपके उद्देश्य की पूर्ति होना भी संभव है । (1)
                           
     यहाँ इस बात की चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यही है कि निर्णय आप को कठोर बना देते हैं, निर्णय आपको कईं हद तक तोड़ देते हैं, कईं हद तक तहस-नहस, नष्ट-भ्रष्ट कर कर देते हैं । आपके भावनात्मक पहलू को इसका आभास बहुत बाद होता है या कई बार तो कईयों को होता ही नहीं और जिन्हें होता है वह अपने ही निर्णय पर बाद में पछताते हैं, रोते हैं, किंतु कुछ कर नहीं पाते ।
              निर्णय लेने से पहले अवश्य अपने आपको देखें, अपने आप से चर्चा करें, मंथन करें, थोड़ा-सा रुक जाए फिर निर्णय ले लें । चाहें तो किसी से चर्चा कर लें, उससे जिससे लगता है कि वह आपको उचित सुझाव दे सकता है लेकिन उनके सुझाव को आप माने या न माने ये आप पर निर्भर करता है और जब आप निर्णय लें तो स्मरण रखें कि किसी के सुझाव के प्रभाव में आकर निर्णय न लें क्योंकि सुझाव देने वाला मात्र सुझाव दे सकता है, आवश्यक नहीं कि वह उन परिस्थितियों से गुजरा हो और यदि गुजरा भी हो तो उसकी सोच आपकी सोच, उसका निर्णय आपका निर्णय,  उसकी स्थिति आपकी स्थिति एक जैसी हो, न हो आवश्यक नहीं । यह भी ध्यान रहे कि आप अपने-आप में  एक अलग व्यक्तित्व हैं, व्यक्ति-विशेष हैं।(2)
                                     
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि आप अपने आपको बता दें कि जो निर्णय आप ले रहे हैं वह आपका अपना है, उसके जो भी परिणाम होंगे उससे निपटने का उत्तरदायित्व आपका है, उसे स्वीकार आप कर पायेंगे या नहीं यह बाद की बात है किंतु आपको स्वीकार करना होगा, आपको स्वीकार करना पड़ेगा यह भी अपने आपको आप समझाने लें ।

        इतना अवश्य ध्यान रखें कि निर्णय आपकी स्वाभाविकता को, आपके मन की भावनाओं को, आपके अस्तित्व को, खत्म तो नहीं कर रहा, समाप्त तो नहीं कर रहा क्योंकि मनुष्य जीवन में प्रभाव में आकर, बहाव में आकर, जोश में आकर, काम-क्रोध-मद-लोभ जैसे विषयों के प्रभाव में आकर के,  वशीभूत होकर 'वह' कर बैठते हैं जो वाकई में वे होते नहीं । ध्यान रहे आप अपने अंतस को कहीं मार तो नहीं रहे, बस इस बात का विचार रहे, इस बात का ध्यान रहे, इस बात का चैतन्यता बनी रहे , इस बात की सजगता बनाए रखें और निर्णय लें ।(3)

                  !!!अस्तु !!!

 अखिलेश...हटिला, तेलगाना(हैदराबाद)

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परिचय 

अखिलेश हठीला ‘सरल’  हैदराबाद तेलंगाना मे निवास करते हैं। सीहोर के यशस्वी और आशु कवि स्व. रमेश हठीला के पुत्र हैं। आप अध्यापन से जुड़े हुए हैं। अध्यात्म में विशेष प्रवीणता है। नाट्य कला में भी आपकी रुचि है। 
   आपके काव्य संग्रह कलम अभी ज़िंदा है , झरोखा-२०००, झरोखा-९९ प्रकाशित हो चुके हैं और महज़ इतनी-सी तो बात थी...  नामक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। कई सम्मान आपको प्राप्त हो चुके हैं। कवि सम्मेलनों में आपकी सक्रियता रहती है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
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