लेखक
चइतुवा पिछले चालीस दिन से लाकडाउन में फंसा हुआ था। प्रधानमंत्री की बात मान उसने चंडीगढ़ में रुकने का फैसला किया। उसके साथियों ने कहा कि चलो चलें पर वह अपने निर्णय पर अडिग था। उसे अपने आप से अधिक राष्ट्र की चिंता थी। वह कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहता था जिससे राष्ट्र पर संकट आए। प्रधानमंत्री उसके आदर्श थे और उनकी बात उसके लिए किसी आदेश से कम न थी।
चइतुआ अधिक पढ़ा लिखा नहीं था पर सब समझता था। उसे पता था कि यह बीमारी एक से दूसरे में बड़ी तेजी से फैलती है। उसे पता था कि यदि वह घर गया तो कहीं उसका परिवार संक्रमित न हो जाए।
चइतुआ रोज अपनी घरवाली सुंदरिया से रोज फोन पर बात कर लेता था। उसके पास एक साधारण बटन वाला फोन था। उसे केवल फोन मिलाना और काल रिसीव करना आता था।
आज एकतालीसवां दिन था। पिछले चालीस दिनों में सारे पैसे , सारा राशन सब खतम हो गया था । पर यह सब बातें उसने अपनी घरवाली से नहीं बताईं थी।
आज चइतुआ ने अपनी घरवाली को फोन लगाया सुंदरिया फोन का इंतजार कर रही थी। सुंदरिया ने झट से फोन उठाया और प्यार से बोली ए रघवा के बाबू कइसन हो। चइतुवा बोला ठीक हैं। उहां सब कइसन है। सुंदरिया बोली हिंया सब ठीक हैं। आज घुरवा के बप्पा रमधनिया के काका कुंतनिया क देवर सब गांव आ गये हैं। सब अपने अपने घर म घुसे हैं। तुमहूं आ जाओ न। आखिर कब तक परदेश म रहियो। इ लाकडाउन तो सुरसा के मुह कि नाई बढत जात है। चइतुआ बोला का बताई अब। कइसे आई हमरे कुछ समझ नहीं आवत। हम का करी केसे कही। हम बहुत परेशान हैं। सुंदरिया बोली तुम परेशान न हो चुप्पे चले आव।
देखो तुम्हार रघवा अबकी तीन साल क पूर होई जाई अबे तक तुम ओका देखेव नहीं आ जाओ। चले आओ। हे रघवा के बाबू तोका हमार कसम आ जाओ ।हे सुंदरिया तैं कसम काहे चढा दिहे ।अच्छा धर हम कुछ करित ही।
चइतुवा बहुत परेशान था न खाने को कुछ न पास में पैसे कैसे अपने घर जाए। तभी चइतुआ ने एक डिब्बी सी कोई चीज निकाली और अपने मकान मालिक के पास पहुंचा और बोला। भैया हमका अपने घर जाएका है एका रख लेव ओ हमका कुछ पइसा दई देव। मकान मालिक बोले अरे यार कैसी बात करते हो यह तो भाभी जी के लिए बनवाए थे आपने इनका मैं क्या करूँगा। चइतुआ बोला घर जाना है अब न किराए के पैसे हैं न खाने के। मकान मालिक बोला अरे तो क्या हुआ मेरे यहाँ खाओ और किराया किसने मांगा।
चइतुआ बोला अरे घर में सब परेशान हैं कब तक आपके यहां खाऊंगा बस इसको लेके कुछ पैसे दे दो। मकान मालिक बोला यह भाभी जी की अमानत है इसे मैं नहीं लूंगा। अब चइतुआ हताश हो गया। पर तभी मकान मालिक ने चइतुवा को दो हजार रुपये दिए और बोला लाकडाउन के बाद जब आना मेरे पैसे वापस कर देना।
चइतुवा की आंखों में आंसू आ गये। बोला भैया यह उपकार मैं कैसे चुका पाऊंगा। मकान मालिक ने कहा भाई कहते हो और उपकार की बात करते हो। इंसान ही इंसान के काम आता है। विपदा की घड़ी है सबको एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।
चइतुवा सुबह चार बजे पैदल गांव के लिए निकल पड़ा। सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम, शाम से रात, रात से सुबह। अब चइतुवा चलता जा रहा था चलता जा रहा था। चलते चलते चइतुवा थक गया एक छोटे से कस्बे के बाहर रुक गया एक छोटी सी दुकान दिखी जो थोड़ी सी खुली थी। चइतुवा बोला भैया कुछ खाने को होगा क्या। दुकानदार बोला नमकीन बिस्कुट है। चइतुवा नमकीन बिस्किट खाया और पानी पी कर वहीं बैठ गया। तभी दुकानदार आया और बोला यहां से उठो उधर दूर जाके बैठो।कोरोना लिए घूम रहे हो। चइतुवा उठा और दूर घास में लेटकर सो गया। थकान के कारण गहरी नींद आ गयी। सुबह चइतुवा उठा तो देखा उसका बैग नहीं दिखा। इधर उधर देखा तो कहीं नहीं दिखा। उसका दिल अनहोनी से कांप उठा उस बैग में सुंदरिया के झुमके थे। उसने जेब में हांथ डाला तो मोबाइल और पैसे सुरक्षित थे। उसने आस पास के लोगों से बैग के बारे में पूंछा तो लोगों ने बताया कि यहां जुंआरी शराबी नसेड़ी बहुत हैं किसी ने मार दिया होगा जाओ जल्दी यहां से निकल जाओ। अब चइतुवा की आंख में आंसू आ गये एक एक पाई जोड़ कर सुंदरिया के झुमके बनवाए थे। तीन साल बाद घर जा रहा था और वादा करके आया था कि अबकी तोरे बरे झुमकी लइके अइंहों।रघवा मां के पेट में था तभी चइतुवा गांव छोंड़ कर चला आया था। अब कौन मुह लेकर गांव जाए।
चलते चलते चार दिन हो गए थे पांव में छाले पड़ गये थे। चला नहीं जा रहा था। तभी रास्ते में एक जगह पेड़ की छाया में बैठ गया और सुंदरिया को फोन लगाने के लिए फोन खोला तो बैटरी लो का संदेश आया और फोन बंद हो गया तभी दो लड़के बाइक से आए और पीछे वाले लड़के ने फुर्ती से चइतुवा का फोन छीना और उसे धक्का मारकर भाग गये।यह लगातार दूसरी चोट थी। कोई इंसान इतना क्रूर कैसे हो सकता है। आपदा की इस घड़ी में एक लाचार गरीब पथिक को अन्न के कुछ दाने और विश्राम हेतु आश्रय देना तो दूर उसके पास का सामान बलात छीन लेना मानवता के विरुद्ध था। यह कैसे समाज का निर्माण किया है हमने। किसी दूसरे की खुशियां छीनने का हमें कोई अधिकार नहीं। ऐसे लोग मानवता को शर्मसार करते हैं।
अब चइतुवा हताश हो गया। उसका मोबाइल भी चला गया अब वह सुंदरिया से कैसे बात करेगा वही एक सहारा था सुख दुःख बताने का।अब उसके अंदर चलने का साहस न था। तभी कुछ लोग साइकल से आते दिखे चइतुवा को परेशान देख बोले क्या बात है भाई बड़ा परेशान लग रहे हो। चइतुवा रोने लगा। उन साइकल सवार लोगों ने चइतुवा को चुप कराया पानी पिलाया और पूंछा कहाँ जाओगे भाई क्या हुआ है आपके साथ तो चइतुवा ने सारी बात बताई और बोला कानपुर के आगे जाना है। तो साइकल सवार ने पूंछा कानपुर के आगे कहां तो चइतुवा बोला फतेहपुर। अरे भाई फतेहपुर में कहां साइकल सवार बोला पूरा पता बताओ। तो चइतुवा बोला खागा के आगे दरियामऊ गांव है मेरा। साइकल सवार बोला हमें अमौली जहानाबाद जाए क है।हम सब तो नजदीक के हैं। पै तुम पैदल कइसे जइहो औ दुई जन म बड़ी समस्या है। कुछ पइसा वइसा है तुम्हरे पास तो चइतुवा बोला हां दुई हजार है बस अउर कुछ नहीं। साइकल सवार बोला आओ अच्छा बइठो आगे एक कस्बा है तुमका साइकिल खरिदवाइत ही। चइतुवा ने सत्रह सौ रुपया की एक दुकान से पुरानी साइकल खरीदी। अब चइतुवा उन साइकल वालों के साथ चल पड़ा। लाई चना, नमकीन बिस्किट, ब्रेड, खाते वह कानपुर पहुंच गया।
इधर सुंदरिया का रो रो कर बुरा हाल था वह कई बार फोन कर कर के थक गई थी। चइतुवा का फोन बंद था। माकान मालिक को फोन किया तो उसने सारी बात बता दी थी। अब सुंदरिया रोए जा रही थी।
इधर चइतुवा के तीन सौ रुपये खर्च हो गये थे।वह साइकल सवार कानपुर से अमौली जहानाबाद की ओर मुड़ गये थे। अब चइतुवा कानपुर से अकेले साइकल से केवल पानी पी पी कर खागा पहुंचा। भूंख के मारे उसके पेट में दर्द होने लगा। खागा में जहां पुल की शुरुआत होती है वहां किसी पंडित जी के मकान के सामने आने वाले प्रवासियों को पूड़ी सब्जी बंट रही थी। वहां चइतुवा ने पूड़ी सब्जी खाई और पानी पीकर स्टेशन में लेट गया रात के दस बजे थे। तभी जी आर पी वालों ने उसे प्लेटफार्म से भगा दिया। अब चइतुवा हरदों अस्पताल के बाहर रात भर लेटा रहा। सवेरे चइतुवा उठा और फिर चल दिया अब उससे साइकल चलाई नहीं जा रही थी ऐलई से आगे उसे लगा वह गिर जाएगा। चइतुवा को चक्कर आने लगा। अपने पानी की बोतल से उसने मुह धोया और पैदल साइकल लेकर चलने लगा। चइतुवा धीरे धीरे चल रहा था उसके लिए एक एक कदम भारी था। उसे लग रहा था बस यही ढेर हो जाएगा। तभी उसे अपने बेटे रघवा की याद आ गयी तो अचानक उसके शरीर में जान आ गई कि उसे चलना होगा। अब वह पनिहा बाबा पहुंच चुका था मारे खुशी के उसके कदम तेज हो गये वह सीधे प्राथमिक विद्यालय दरियामऊ पहुंचा। साइकल फेंकी और विद्यालय की फर्श पर ढेर हो गया।
तब तक पूरे गांव में खबर फैल गई कि चइतुवा आ गया, चइतुवा आ गया। सुंदरिया को जैसे पता चला वह रघवा को ले के भागकर प्राइमरी स्कूल पहुंची। वहां चइतुवा की जांच हो रही थी। डाक्टर इलाज कर रहे थे। सुंदरिया दूर से अपलक चइतुवा को निहार रही थी और टप टप आंसू गिर रहे थे। चइतुवा होश में आ चुका था। सुंदरिया को रोते देख बोला ए पगलिया काहे रोउती हौ हम आ गवा है न बस चौदह दिन की बात है एके बाद हम कहूं न जाब हिंयै गांव म रहब तोहरे औ रघवा के साथे। हम हिंयैं गांव म काम करब....।
उत्तर प्रदेश में अध्यापन का कार्य करते हैं। साथ ही साहित्य के प्रति रुचि है और विविध विधाओ में आपकी लेखनी गतिमान रहती है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
चइतुवा की वापसी
चइतुवा पिछले चालीस दिन से लाकडाउन में फंसा हुआ था। प्रधानमंत्री की बात मान उसने चंडीगढ़ में रुकने का फैसला किया। उसके साथियों ने कहा कि चलो चलें पर वह अपने निर्णय पर अडिग था। उसे अपने आप से अधिक राष्ट्र की चिंता थी। वह कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहता था जिससे राष्ट्र पर संकट आए। प्रधानमंत्री उसके आदर्श थे और उनकी बात उसके लिए किसी आदेश से कम न थी।
चइतुआ अधिक पढ़ा लिखा नहीं था पर सब समझता था। उसे पता था कि यह बीमारी एक से दूसरे में बड़ी तेजी से फैलती है। उसे पता था कि यदि वह घर गया तो कहीं उसका परिवार संक्रमित न हो जाए।
चइतुआ रोज अपनी घरवाली सुंदरिया से रोज फोन पर बात कर लेता था। उसके पास एक साधारण बटन वाला फोन था। उसे केवल फोन मिलाना और काल रिसीव करना आता था।
आज एकतालीसवां दिन था। पिछले चालीस दिनों में सारे पैसे , सारा राशन सब खतम हो गया था । पर यह सब बातें उसने अपनी घरवाली से नहीं बताईं थी।
आज चइतुआ ने अपनी घरवाली को फोन लगाया सुंदरिया फोन का इंतजार कर रही थी। सुंदरिया ने झट से फोन उठाया और प्यार से बोली ए रघवा के बाबू कइसन हो। चइतुवा बोला ठीक हैं। उहां सब कइसन है। सुंदरिया बोली हिंया सब ठीक हैं। आज घुरवा के बप्पा रमधनिया के काका कुंतनिया क देवर सब गांव आ गये हैं। सब अपने अपने घर म घुसे हैं। तुमहूं आ जाओ न। आखिर कब तक परदेश म रहियो। इ लाकडाउन तो सुरसा के मुह कि नाई बढत जात है। चइतुआ बोला का बताई अब। कइसे आई हमरे कुछ समझ नहीं आवत। हम का करी केसे कही। हम बहुत परेशान हैं। सुंदरिया बोली तुम परेशान न हो चुप्पे चले आव।
देखो तुम्हार रघवा अबकी तीन साल क पूर होई जाई अबे तक तुम ओका देखेव नहीं आ जाओ। चले आओ। हे रघवा के बाबू तोका हमार कसम आ जाओ ।हे सुंदरिया तैं कसम काहे चढा दिहे ।अच्छा धर हम कुछ करित ही।
चइतुवा बहुत परेशान था न खाने को कुछ न पास में पैसे कैसे अपने घर जाए। तभी चइतुआ ने एक डिब्बी सी कोई चीज निकाली और अपने मकान मालिक के पास पहुंचा और बोला। भैया हमका अपने घर जाएका है एका रख लेव ओ हमका कुछ पइसा दई देव। मकान मालिक बोले अरे यार कैसी बात करते हो यह तो भाभी जी के लिए बनवाए थे आपने इनका मैं क्या करूँगा। चइतुआ बोला घर जाना है अब न किराए के पैसे हैं न खाने के। मकान मालिक बोला अरे तो क्या हुआ मेरे यहाँ खाओ और किराया किसने मांगा।
चइतुआ बोला अरे घर में सब परेशान हैं कब तक आपके यहां खाऊंगा बस इसको लेके कुछ पैसे दे दो। मकान मालिक बोला यह भाभी जी की अमानत है इसे मैं नहीं लूंगा। अब चइतुआ हताश हो गया। पर तभी मकान मालिक ने चइतुवा को दो हजार रुपये दिए और बोला लाकडाउन के बाद जब आना मेरे पैसे वापस कर देना।
चइतुवा की आंखों में आंसू आ गये। बोला भैया यह उपकार मैं कैसे चुका पाऊंगा। मकान मालिक ने कहा भाई कहते हो और उपकार की बात करते हो। इंसान ही इंसान के काम आता है। विपदा की घड़ी है सबको एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।
चइतुवा सुबह चार बजे पैदल गांव के लिए निकल पड़ा। सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम, शाम से रात, रात से सुबह। अब चइतुवा चलता जा रहा था चलता जा रहा था। चलते चलते चइतुवा थक गया एक छोटे से कस्बे के बाहर रुक गया एक छोटी सी दुकान दिखी जो थोड़ी सी खुली थी। चइतुवा बोला भैया कुछ खाने को होगा क्या। दुकानदार बोला नमकीन बिस्कुट है। चइतुवा नमकीन बिस्किट खाया और पानी पी कर वहीं बैठ गया। तभी दुकानदार आया और बोला यहां से उठो उधर दूर जाके बैठो।कोरोना लिए घूम रहे हो। चइतुवा उठा और दूर घास में लेटकर सो गया। थकान के कारण गहरी नींद आ गयी। सुबह चइतुवा उठा तो देखा उसका बैग नहीं दिखा। इधर उधर देखा तो कहीं नहीं दिखा। उसका दिल अनहोनी से कांप उठा उस बैग में सुंदरिया के झुमके थे। उसने जेब में हांथ डाला तो मोबाइल और पैसे सुरक्षित थे। उसने आस पास के लोगों से बैग के बारे में पूंछा तो लोगों ने बताया कि यहां जुंआरी शराबी नसेड़ी बहुत हैं किसी ने मार दिया होगा जाओ जल्दी यहां से निकल जाओ। अब चइतुवा की आंख में आंसू आ गये एक एक पाई जोड़ कर सुंदरिया के झुमके बनवाए थे। तीन साल बाद घर जा रहा था और वादा करके आया था कि अबकी तोरे बरे झुमकी लइके अइंहों।रघवा मां के पेट में था तभी चइतुवा गांव छोंड़ कर चला आया था। अब कौन मुह लेकर गांव जाए।
चलते चलते चार दिन हो गए थे पांव में छाले पड़ गये थे। चला नहीं जा रहा था। तभी रास्ते में एक जगह पेड़ की छाया में बैठ गया और सुंदरिया को फोन लगाने के लिए फोन खोला तो बैटरी लो का संदेश आया और फोन बंद हो गया तभी दो लड़के बाइक से आए और पीछे वाले लड़के ने फुर्ती से चइतुवा का फोन छीना और उसे धक्का मारकर भाग गये।यह लगातार दूसरी चोट थी। कोई इंसान इतना क्रूर कैसे हो सकता है। आपदा की इस घड़ी में एक लाचार गरीब पथिक को अन्न के कुछ दाने और विश्राम हेतु आश्रय देना तो दूर उसके पास का सामान बलात छीन लेना मानवता के विरुद्ध था। यह कैसे समाज का निर्माण किया है हमने। किसी दूसरे की खुशियां छीनने का हमें कोई अधिकार नहीं। ऐसे लोग मानवता को शर्मसार करते हैं।
अब चइतुवा हताश हो गया। उसका मोबाइल भी चला गया अब वह सुंदरिया से कैसे बात करेगा वही एक सहारा था सुख दुःख बताने का।अब उसके अंदर चलने का साहस न था। तभी कुछ लोग साइकल से आते दिखे चइतुवा को परेशान देख बोले क्या बात है भाई बड़ा परेशान लग रहे हो। चइतुवा रोने लगा। उन साइकल सवार लोगों ने चइतुवा को चुप कराया पानी पिलाया और पूंछा कहाँ जाओगे भाई क्या हुआ है आपके साथ तो चइतुवा ने सारी बात बताई और बोला कानपुर के आगे जाना है। तो साइकल सवार ने पूंछा कानपुर के आगे कहां तो चइतुवा बोला फतेहपुर। अरे भाई फतेहपुर में कहां साइकल सवार बोला पूरा पता बताओ। तो चइतुवा बोला खागा के आगे दरियामऊ गांव है मेरा। साइकल सवार बोला हमें अमौली जहानाबाद जाए क है।हम सब तो नजदीक के हैं। पै तुम पैदल कइसे जइहो औ दुई जन म बड़ी समस्या है। कुछ पइसा वइसा है तुम्हरे पास तो चइतुवा बोला हां दुई हजार है बस अउर कुछ नहीं। साइकल सवार बोला आओ अच्छा बइठो आगे एक कस्बा है तुमका साइकिल खरिदवाइत ही। चइतुवा ने सत्रह सौ रुपया की एक दुकान से पुरानी साइकल खरीदी। अब चइतुवा उन साइकल वालों के साथ चल पड़ा। लाई चना, नमकीन बिस्किट, ब्रेड, खाते वह कानपुर पहुंच गया।
इधर सुंदरिया का रो रो कर बुरा हाल था वह कई बार फोन कर कर के थक गई थी। चइतुवा का फोन बंद था। माकान मालिक को फोन किया तो उसने सारी बात बता दी थी। अब सुंदरिया रोए जा रही थी।
इधर चइतुवा के तीन सौ रुपये खर्च हो गये थे।वह साइकल सवार कानपुर से अमौली जहानाबाद की ओर मुड़ गये थे। अब चइतुवा कानपुर से अकेले साइकल से केवल पानी पी पी कर खागा पहुंचा। भूंख के मारे उसके पेट में दर्द होने लगा। खागा में जहां पुल की शुरुआत होती है वहां किसी पंडित जी के मकान के सामने आने वाले प्रवासियों को पूड़ी सब्जी बंट रही थी। वहां चइतुवा ने पूड़ी सब्जी खाई और पानी पीकर स्टेशन में लेट गया रात के दस बजे थे। तभी जी आर पी वालों ने उसे प्लेटफार्म से भगा दिया। अब चइतुवा हरदों अस्पताल के बाहर रात भर लेटा रहा। सवेरे चइतुवा उठा और फिर चल दिया अब उससे साइकल चलाई नहीं जा रही थी ऐलई से आगे उसे लगा वह गिर जाएगा। चइतुवा को चक्कर आने लगा। अपने पानी की बोतल से उसने मुह धोया और पैदल साइकल लेकर चलने लगा। चइतुवा धीरे धीरे चल रहा था उसके लिए एक एक कदम भारी था। उसे लग रहा था बस यही ढेर हो जाएगा। तभी उसे अपने बेटे रघवा की याद आ गयी तो अचानक उसके शरीर में जान आ गई कि उसे चलना होगा। अब वह पनिहा बाबा पहुंच चुका था मारे खुशी के उसके कदम तेज हो गये वह सीधे प्राथमिक विद्यालय दरियामऊ पहुंचा। साइकल फेंकी और विद्यालय की फर्श पर ढेर हो गया।
तब तक पूरे गांव में खबर फैल गई कि चइतुवा आ गया, चइतुवा आ गया। सुंदरिया को जैसे पता चला वह रघवा को ले के भागकर प्राइमरी स्कूल पहुंची। वहां चइतुवा की जांच हो रही थी। डाक्टर इलाज कर रहे थे। सुंदरिया दूर से अपलक चइतुवा को निहार रही थी और टप टप आंसू गिर रहे थे। चइतुवा होश में आ चुका था। सुंदरिया को रोते देख बोला ए पगलिया काहे रोउती हौ हम आ गवा है न बस चौदह दिन की बात है एके बाद हम कहूं न जाब हिंयै गांव म रहब तोहरे औ रघवा के साथे। हम हिंयैं गांव म काम करब....।
मनीष कुमार तिवारी डेंडासई फतेहपुर उत्तर प्रदेश
-------------परिचय
मनीष कुमार तिवारी, धाता रोड सिराथू कौशांबी के निवासी हैं। वर्तमान में श्री बलदेव प्रसाद शुक्ल इंटर कॉलेज डेंडासई फतेहपुरउत्तर प्रदेश में अध्यापन का कार्य करते हैं। साथ ही साहित्य के प्रति रुचि है और विविध विधाओ में आपकी लेखनी गतिमान रहती है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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