श्रावण मास में पार ब्रह्म परमेश्वर की आराधना 

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श्रावण मास...रिमझिम फ़ुहारों वाला वातावरण....जिसमें झूले लगते रहे... बहुये बेटी बनकर मायके जाती हैं.....लेकिन इससे अलग हटकर....इसी महीने में होती है... परब्रह्म परमेश्वर की आराधना....। महादेव के रूप में....इसको भोलेनाथ की पूजा अभिषेक से भी जाना जाता है...। श्रावण सोमवार की झाँकियों का दौर भले ही गुजर गया हो... उज्जैन में बाबा महाकाल की सवारी....निकलने का काल यही होता है...।सभी ज्योतिर्लिंग पर....विशेष पूजा का समय भी यही होता है.....। हम जिक्र कर रहे हैं...पर ब्रह्म परमेश्वर का.....जिनका उल्लेख होते ही... एक सवाल मन में उठता है... ये हैं कौन...? वैष्णव सम्प्रदाय इसे भगवान विष्णु से जोड़कर देखता है तो शैव संप्रदाय इसको आशुतोष भगवान भोलेनाथ से जोड़कर देखता है...। दोनों अपने अपने मत के पक्ष में क्रमशः विष्णु पुराण एवं शिव पुराण का संदर्भ देते हैं.....। जो जगत को चलाने वाला है उस परमेश्वर को जगदीश मानते है और उन्हीं जगदीश भगवान को विष्णु जी के रूप में पूजा जाता है...। खासकर तब जब सत्यनारायण भगवान की पूजा के बाद... ऊँ जय जगदीश हरे..... वाली आरती का गाया जाना.....। इसी आरती में एक पंक्ति आती है.... 
पार ब्रह्म परमेश्वर तुम सबके स्वामी..... 
यह पंक्ति भी पुष्ट करती है भगवान विष्णु के परम ब्रह्म होने के मत को....। इसको सही कहने वालों के लिए.... एक श्लोक की तरफ ध्यान दिलाया जाना उचित होगा.... जिसे अधिकांश सनातन धर्मी न केवल प्रयोग करते हैं.... बल्कि इस श्लोक मे उल्लेखित शब्दों के अनुसार.... इसका अर्थ भी बखूबी समझते हैं..... श्लोक पढ़िये..... 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । 
गुरुसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः।। 

अर्थात.....गुरु ब्रह्मा है... जो शिष्य को ज्ञानवान जीवन देता है.... गुरु विष्णु है जो शिष्य के जीवन को अध्यात्म का विस्तार देता है.... गुरु महेश है... जो उसका सर्वस्व प्रकार से कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है....। यही गुरु साक्षात पर ब्रह्म भी है.... जिसको हम शिष्य रूप में नमन करते हैं...। 
इस तात्पर्य में इतना समझ जरूर आता है कि.. गुरु ब्रह्मा, विष्णु, महेश से ऊपर कोई और पर ब्रह्म है... उसकी भी साक्षात मूर्ति गुरु ही है...। यह पर ब्रह्म निश्चय ही अजन्मा, अविनाशी और निराकार है... जिसमें यह त्रिदेव समाहित हैं..। 
श्रावण मास में... प्रकृति में नव जीवन जन्म लेता है... यानि सृष्टि का प्रारम्भ... ब्रह्मा की भूमिका में...। यहीं से उसका विस्तार भी शुरू.. यानि विष्णु की भूमिका में... और उसके कल्याण का मार्ग भी खुलता है... महेश की भूमिका का श्री गणेश होता है....। इन्हीं त्रिदेव को पार ब्रह्म का अंश मानें... तो उन्होंने ही इन्हें ये कार्य सौंपे... यानि विभाग का बंटवारा हुआ....। उसी पार ब्रह्म की आराधना की जाती है.... श्रावण मास में.... शायद आपको यकीन नही हो.... तो आईये आज उस आरती को पढ़ते और समझते हैं... जो इस महीने में शिवालयों में गाई जाती है.... 

जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा ।

ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ 

शिव यानि कल्याण के देवता... जिनके बिना जीवन में प्रसन्नता नहीं... लेकिन ब्रह्मा और विष्णु के साथ ही शिव की कल्याण की धारा का प्रवाह जीवन में संभव है। अगली पंक्ति की तरफ चलते हैं... वहाँ त्रिदेव के सम्मिलित रूप का एक और दर्शन मिलता है..... 
एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥
एक मुख वाले विष्णु, चार मुख वाले ब्रह्मा और पांच मुख वाले शिव.... अपने अपने वाहन पर सवार होते हैं.... हंस ब्रह्मा का, गरुड़ विष्णुजी का और वृषभ भोलेनाथ का वाहन है....। इन त्रिदेव के स्वरूप का वर्णन आरती में किया गया है... जो पर ब्रह्म का दर्शन कराता है... इन तीनों के माध्यम से...। 
आगे की पंक्तियों में भी त्रिदेव के विभिन्न स्वरूपों या उनके गुणों का वर्णन इस आरती में किया गया है...। पढ़िये... इन पंक्तियों को.. 

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ 
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ 
..... यहाँ तक की हर पंक्ति पर ब्रह्म परमेश्वर के अंश त्रिदेव की ही व्याख्या करती है.... और यह आरती श्रावण मास में गाई भी खूब जाती है.... परंतु इसकी जो आखिरी दो पंक्तियाँ हैं.... वह तो सारे भेद समाप्त करती है... साथ ही भ्रम भी दूर कर देती हैं...। 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ 

.... पढ़ा न ध्यान से... उक्त की पहली पंक्ति कह रही है... ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव इनको तीन अलग अलग रूप में जानने वाले अविवेकी अर्थात विवेक शून्य होते हैं.... क्योंकि ये तीनों ही... प्रणव अक्षर..... यानि ओम (ऊँ) के मध्य में जाकर एक हो जाते हैं... और पार ब्रह्म परमेश्वर कहलाते हैं... जिनके नाम का वाचक ऊँ कहलाता है....। संभवतः यही कारण हो कि... परमेश्वर के नाम वाचक ऊँ को प्रत्येक मंत्र के आरंभ में उच्चारित किया जाता हो....। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के गुण से युक्त... आरती की पंक्तियाँ.. उस पार ब्रह्म परमेश्वर की स्तुति में गाई जाती हैं....। जो निराकार, अजन्मा, है...। श्रावण मास उस परम पिता परमेश्वर की आराधना का.... शुभ महीना है। 

शैलेश तिवारी, सीहोर (मध्यप्रदेश)

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लेखक  एमपी मीडिया पाइंट के संपादक  और आध्यात्म के ज्ञाता हैं। आपकी कई पुस्तकें
 "आध्यात्म" विषय पर  प्रकाशित हो चुकी हैं। 
समूचे देश मे आपका नाम पत्रकारिता और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आदर के साथ लिया जाता है। आप सफल ज्ञाता और विज्ञाता के रुप मे अपनी विशिष्ठ पहचान रखते हैं।
राजेश शर्मा 
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