लेखक
बात शुरू करते हैं एक छोटी सी कहानी से.... जो एक गाँव की है.... जहाँ फैली महामारी की वजह से दस मौत हुई.... गाँव के श्मशान में उनका दाह संस्कार हुआ.... मसान(श्मशान) में रहता था एक बाबा..... उसने गाँव वालों से जानकारी ली.... एक साथ इतने लोगों के मरने की.... महामारी से मरे.... उसको बताया गया... । रात हुई... बाबा को एक काली छांया टहलती दिखी.... उसने पूछा परिचय.... छांया ने खुद को बताया मृत्यु....। साथ ही कहा ...कल फिर दस लोगों को मारने आऊँगी.....। दूसरे दिन श्मशान में चालीस चिताएं जलती दिखाई दीं .... मसान में रहने वाला बाबा हैरत में पड़ गया.... सोचने लगा... अभी तक यही सुना था जिंदगी झूठ बोलती है..... अब तो मौत भी झूठ बोलने लगी है... कह रही थी दस को मारूंगी... यहाँ तो चालीस चिताएं जल रही हैं....। वो बेसब्री से रात होने का इंतजार करता है.... वही काली छाया... मौत... आती है.... बाबा अपना सवाल दोहराते हैं.... दस मारने आई थी... ये चालीस क्यों मार दिए.... मौत ने जवाब दिया.... मैंने तो दस को ही मारा.... बाकी के तीस तो डर से मर गए...!!!
..जो मौत का उत्तर था..... लगभग उससे मिलता जुलता हाल कोरोना की बीमारी का है... लोग शरीर से कोरोना पीड़ित हों या न हों...... लेकिन सबका दिमाग कोरोना से पीड़ित हो गया है...। यह स्थिति ठीक तो कतई नहीं कही जा सकती....। विचारणीय बात है कि... जिस बीमारी का कोई वेक्सीन नहीं है.... जिसकी कोई दवा इजाद नहीं हुई है... उस बीमारी से मरने वाले केवल चार प्रतिशत हैं.... और बचने वाले 96 प्रतिशत हैं.....। वर्ल्डो मीटर के आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं.. आज सुबह 11 बजकर 28 मिनट पर अपडेट की गई जानकारी के अनुसार.... 10 लाख 78 हजार 782 लोग पीड़ित बताये जा रहे हैं..... इनमे से बीमारी से ठीक होने वालों की संख्या 6 लाख 77 हजार 856 है.... तो मरने वालों का आंकडा महज 26 हजार 838 है..... जो क्लोज केस का केवल चार प्रतिशत है...... अगर कुल केस संख्या में से मरने वालों का प्रतिशत निकाला जाए तो महज दो से ढाई फीसदी पर ये आंकडा ठहर जाता है.....। गौरतलब है कि .... जिस बीमारी से लोग मर कम रहे हैं.... और ठीक ज्यादा हो रहे हैं..... उस को महामारी माना क्यों जा रहा है...? और इतना हंगामा बरपाने की जरूरत क्या है...?
इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) द्वारा जो... सिरोलॉजिकल सर्वे कराया गया था... उसका परिणाम और ज्यादा चोंकाने वाला है... उसके अनुसार जितने लोग कोरोना से पीड़ित होकर... सरकार की सूची में शामिल है... सर्वे बताता है कि...उस सूची से डेढ़ से दो सौ गुना ज्यादा लोगों में कोरोना की एंटी बॉडी पाई गई हैं.... अर्थात उन लोगों को मालूम ही नहीं पड़ा कि... वह कब कोरोना से पीड़ित होकर... कैसे इस बीमारी से ठीक भी हो गए...। यह बात भी इसकी पुष्टि करती है कि कोरोना जानलेवा बीमारी... उन्हीं लोगों के लिए है... जो पहले से किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं...।
सवाल उठेगा फिर इसका इलाज क्या... लॉक डाउन है...? अधिकांश का जवाब हाँ में हो सकता है.... लेकिन आप-अपन लॉक डाउन का सीधा मतलब इस उदाहरण से समझते है कि.... एक घर में चूहा घुस गया... उस चूहे को पकड़ कर बाहर निकालने की... नाना प्रकार की तरकीबें अपनाई गई.... आखिर में परेशान होकर घर मालिक ने.... अपने घर में ही आग लगा दी....।
आपको क्या लगता है.... उस मकान मालिक ने ठीक किया...? या गलत किया.....? लॉक डाउन भी कोरोना नाम के चूहे से निजात पाने के लिए... घर में आग लगा देना.... जैसा उपाय है....। इसकी तफ़्सील भी जान लीजिये... बीते दिनों देश ने लंबा लॉकडाउन झेला.... बताया जाता है कि... इसकी वजह से 14 करोड़ लोगों को अपने... रोजगार से हाथ धोना पड़ा... यानि 14 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए.... इसका मतलब अगर निकाला जाए तो.... साफ है कि ये बेरोजगार अब बाजार से केवल जीवनोपयोगी सामान की खरीदारी ही करेंगे..... यानि बाजार से बहुत सी चीजों की मांग कमजोर होगी... जो आर्थिक सेहत के लिए.... नुकसानदेह है.... सरकार बाजार में मांग पैदा हो... इस विषय पर ध्यान न के बराबर दे रही है... हाँ बाजार में आपूर्ति बनी रहे... इसकी कोशिशे ज्यादा कर रही है..। जो ठीक नहीं कहे जा सकते.... जब मांग ही नहीं होगी तो... आपका आपूर्ति का फंडा तो औंधे मुँह जमीन पर पड़ा... कराह रहा होगा...।
बेरोजगारी और महंगाई पर... कोरोना से ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी लगने लगा है... आम आदमी के दिमाग से कोरोना का भूत भगाना.... समय की मांग है...। इस भूत को भगाने के लिए.... कोरोना टेस्ट की संख्या क्रमशः कम की जाना चाहिए.... सिरोलॉजिकल सर्वे को ध्यान में रखते हुए...। क्योंकि वर्तमान में रोजाना के बत्तीस हजार केस सामने आ रहे हैं... जो ज्यादा टेस्टिंग का परिणाम है... टेस्ट केवल उन्हीं लोगों का किया जाए.... जिनमें गंभीर प्रकृति के कोरोना लक्षण नजर आ रहे हों....। ज्यादा टेस्ट कराने का टार्गेट अगर हर नागरिक का टेस्ट कर लेना है तो... भारत की विशाल जनसंख्या के मद्दे नजर इस टेस्टिंग में सालों लग जायेंगे... एक पीढी जन्म लेकर अधेड़ हो जाने तक के साल लगेंगे.....।
इसलिए हंगामा न बरपा कर अब कोरोना से ध्यान कम किया जाए... यह कदापि डरने का रोग नहीं, सिर्फ़ सावधानी और सतर्कता का विषय रह गया है। फोकस दूसरे जन हितैषी मुद्दों पर किया जाए...। अगर केवल नागरिकों की जान ज्यादा से ज्यादा बचाना इसका उद्देश्य है तो... देश को संपूर्ण लॉक डाउन केवल इसलिए कर दिया जाए... क्योंकि कोरोना से ज्यादा लोग तो देश में हर रोज सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं... इससे शायद ज्यादा नागरिकों की जान बचाई जा सकेगी....।
दुष्यन्त कुमार के लहजे मे कहें तो..
फकत हंगामा खड़ा करना
मेरा मकसद नहीं है,
यह मायूस सूरतें बदलनी चाहिए.....।
देखिए लेख से जुड़ा इंदौर के एक अस्पताल का वीडियो
हंगामा है क्यों बरपा..... डराने का...
बात शुरू करते हैं एक छोटी सी कहानी से.... जो एक गाँव की है.... जहाँ फैली महामारी की वजह से दस मौत हुई.... गाँव के श्मशान में उनका दाह संस्कार हुआ.... मसान(श्मशान) में रहता था एक बाबा..... उसने गाँव वालों से जानकारी ली.... एक साथ इतने लोगों के मरने की.... महामारी से मरे.... उसको बताया गया... । रात हुई... बाबा को एक काली छांया टहलती दिखी.... उसने पूछा परिचय.... छांया ने खुद को बताया मृत्यु....। साथ ही कहा ...कल फिर दस लोगों को मारने आऊँगी.....। दूसरे दिन श्मशान में चालीस चिताएं जलती दिखाई दीं .... मसान में रहने वाला बाबा हैरत में पड़ गया.... सोचने लगा... अभी तक यही सुना था जिंदगी झूठ बोलती है..... अब तो मौत भी झूठ बोलने लगी है... कह रही थी दस को मारूंगी... यहाँ तो चालीस चिताएं जल रही हैं....। वो बेसब्री से रात होने का इंतजार करता है.... वही काली छाया... मौत... आती है.... बाबा अपना सवाल दोहराते हैं.... दस मारने आई थी... ये चालीस क्यों मार दिए.... मौत ने जवाब दिया.... मैंने तो दस को ही मारा.... बाकी के तीस तो डर से मर गए...!!!
..जो मौत का उत्तर था..... लगभग उससे मिलता जुलता हाल कोरोना की बीमारी का है... लोग शरीर से कोरोना पीड़ित हों या न हों...... लेकिन सबका दिमाग कोरोना से पीड़ित हो गया है...। यह स्थिति ठीक तो कतई नहीं कही जा सकती....। विचारणीय बात है कि... जिस बीमारी का कोई वेक्सीन नहीं है.... जिसकी कोई दवा इजाद नहीं हुई है... उस बीमारी से मरने वाले केवल चार प्रतिशत हैं.... और बचने वाले 96 प्रतिशत हैं.....। वर्ल्डो मीटर के आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं.. आज सुबह 11 बजकर 28 मिनट पर अपडेट की गई जानकारी के अनुसार.... 10 लाख 78 हजार 782 लोग पीड़ित बताये जा रहे हैं..... इनमे से बीमारी से ठीक होने वालों की संख्या 6 लाख 77 हजार 856 है.... तो मरने वालों का आंकडा महज 26 हजार 838 है..... जो क्लोज केस का केवल चार प्रतिशत है...... अगर कुल केस संख्या में से मरने वालों का प्रतिशत निकाला जाए तो महज दो से ढाई फीसदी पर ये आंकडा ठहर जाता है.....। गौरतलब है कि .... जिस बीमारी से लोग मर कम रहे हैं.... और ठीक ज्यादा हो रहे हैं..... उस को महामारी माना क्यों जा रहा है...? और इतना हंगामा बरपाने की जरूरत क्या है...?
इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) द्वारा जो... सिरोलॉजिकल सर्वे कराया गया था... उसका परिणाम और ज्यादा चोंकाने वाला है... उसके अनुसार जितने लोग कोरोना से पीड़ित होकर... सरकार की सूची में शामिल है... सर्वे बताता है कि...उस सूची से डेढ़ से दो सौ गुना ज्यादा लोगों में कोरोना की एंटी बॉडी पाई गई हैं.... अर्थात उन लोगों को मालूम ही नहीं पड़ा कि... वह कब कोरोना से पीड़ित होकर... कैसे इस बीमारी से ठीक भी हो गए...। यह बात भी इसकी पुष्टि करती है कि कोरोना जानलेवा बीमारी... उन्हीं लोगों के लिए है... जो पहले से किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं...।
सवाल उठेगा फिर इसका इलाज क्या... लॉक डाउन है...? अधिकांश का जवाब हाँ में हो सकता है.... लेकिन आप-अपन लॉक डाउन का सीधा मतलब इस उदाहरण से समझते है कि.... एक घर में चूहा घुस गया... उस चूहे को पकड़ कर बाहर निकालने की... नाना प्रकार की तरकीबें अपनाई गई.... आखिर में परेशान होकर घर मालिक ने.... अपने घर में ही आग लगा दी....।
आपको क्या लगता है.... उस मकान मालिक ने ठीक किया...? या गलत किया.....? लॉक डाउन भी कोरोना नाम के चूहे से निजात पाने के लिए... घर में आग लगा देना.... जैसा उपाय है....। इसकी तफ़्सील भी जान लीजिये... बीते दिनों देश ने लंबा लॉकडाउन झेला.... बताया जाता है कि... इसकी वजह से 14 करोड़ लोगों को अपने... रोजगार से हाथ धोना पड़ा... यानि 14 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए.... इसका मतलब अगर निकाला जाए तो.... साफ है कि ये बेरोजगार अब बाजार से केवल जीवनोपयोगी सामान की खरीदारी ही करेंगे..... यानि बाजार से बहुत सी चीजों की मांग कमजोर होगी... जो आर्थिक सेहत के लिए.... नुकसानदेह है.... सरकार बाजार में मांग पैदा हो... इस विषय पर ध्यान न के बराबर दे रही है... हाँ बाजार में आपूर्ति बनी रहे... इसकी कोशिशे ज्यादा कर रही है..। जो ठीक नहीं कहे जा सकते.... जब मांग ही नहीं होगी तो... आपका आपूर्ति का फंडा तो औंधे मुँह जमीन पर पड़ा... कराह रहा होगा...।
बेरोजगारी और महंगाई पर... कोरोना से ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी लगने लगा है... आम आदमी के दिमाग से कोरोना का भूत भगाना.... समय की मांग है...। इस भूत को भगाने के लिए.... कोरोना टेस्ट की संख्या क्रमशः कम की जाना चाहिए.... सिरोलॉजिकल सर्वे को ध्यान में रखते हुए...। क्योंकि वर्तमान में रोजाना के बत्तीस हजार केस सामने आ रहे हैं... जो ज्यादा टेस्टिंग का परिणाम है... टेस्ट केवल उन्हीं लोगों का किया जाए.... जिनमें गंभीर प्रकृति के कोरोना लक्षण नजर आ रहे हों....। ज्यादा टेस्ट कराने का टार्गेट अगर हर नागरिक का टेस्ट कर लेना है तो... भारत की विशाल जनसंख्या के मद्दे नजर इस टेस्टिंग में सालों लग जायेंगे... एक पीढी जन्म लेकर अधेड़ हो जाने तक के साल लगेंगे.....।
इसलिए हंगामा न बरपा कर अब कोरोना से ध्यान कम किया जाए... यह कदापि डरने का रोग नहीं, सिर्फ़ सावधानी और सतर्कता का विषय रह गया है। फोकस दूसरे जन हितैषी मुद्दों पर किया जाए...। अगर केवल नागरिकों की जान ज्यादा से ज्यादा बचाना इसका उद्देश्य है तो... देश को संपूर्ण लॉक डाउन केवल इसलिए कर दिया जाए... क्योंकि कोरोना से ज्यादा लोग तो देश में हर रोज सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं... इससे शायद ज्यादा नागरिकों की जान बचाई जा सकेगी....।
दुष्यन्त कुमार के लहजे मे कहें तो..
फकत हंगामा खड़ा करना
मेरा मकसद नहीं है,
यह मायूस सूरतें बदलनी चाहिए.....।


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