लेखिका
झाँकती रहती है स्त्रियाँ
झाँकती रहती है स्त्रियाँकभी खिड़कियों के कोनों से,
कभी छतों से
कभी दरवाजों से, कभी चौखट के
भीतर से ..
आदत हो गयी है उन्हे झाँकने की
पर आने नहीं देती है अपने अंदर,
अपने ही सपनों को
रोक देती है अपनी ही चौखट पर,
खुद को रखती है वो चौखट के अंदर ही..
बस झाँकती रहती है,
न जाने उनकी आँखें
क्या तलाशती , क्या देखती है ।
हर आने जाने वालों में
इस दुनिया को देख लेती है
झाँकते हुए ही
पर अपने को रखती है
समेट कर खुद के अंदर।
वो चाहती है कि
कोई उन स्त्रियों से बोले कि
मत झाँको तुम, आ जाओ
बाहर आकर देख लो,
जो देखना है, जो भी सुनना है
मत लो आड़
दरवाजे और खिड़कियों की,
मत झाँको, "बंद करो झाँकना"
खुद को आने दो अब बाहर ।




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