लेखक 

दादी

जिस दिन दादी बनेगी ना, उस दिन समझ आएगा उसे, चीकू को मिलाने भी नहीं ला सकती थी क्या बहू मुझसे? वो जानती है ना चीकू को देखे बिना मेरी आँखें बेसहार हो जाती हैं, उसे कलेजे से ना लगालूँ जब तक दिल भटकता रहता है मेरा।    

अपनी आराम कुर्सी पर बेचैन होती शांति जी तल्ख आवाज़ में बड़बड़ा रही थीं। वैसे तल्ख मिज़ाजवाली नहीं थीं वो, पर पोते की याद और बहू के रवैये ने चिड़चिड़ा बना दिया था उन्हे। संदीप को दुबई गए हुए दो साल हो गए थे, अब ऐसे में नए विचारों वाली बहू से ताल मैल बैठाना, ऐसा था जैसे पानी में तेल मिलना। दोनों एक दूसरे से कभी सहमत नहीं होते।

शांति जी के चेहरे पर उभरी लकीरें इसी चिंता में गहरी हो गई थीं। जैसे कड़ी धूप ने किसी किसान की जमीन पर उभरी दरारों को और गहरा कर दिया हो। इतना बड़ा घर होने के बाद भी जिंदगी एक कमरे तक सिमट गई थी। बहू चीकू को अपने साथ ले तो गई थी पर, घर में फैली चीकू की यादों को कैसे समेटती वो। घर के सामान के साथ दुबकी बैठी चीकू की यादें, शांति जी को मोहल्ले के शरारती बच्चों की तरह दिन भर सताती रहतीं।

दिन खत्म होता तो रातें भी यादों से भरी गठरी ले आतीं। भले फिर वो नाइट लैम्प की रोशनी में चीकू का खो जाना हो, या अंधेरे से डर दादी से चिपक जाना, हर पल पूरी तरह याद था शांति जी को। रात की बात निकली तो शांति जी को वो रात भी याद आयी जिस रात चीकू की खांसी बंद नहीं हो रही थी, उन्होने अदरक का रस और शहद चीकू को क्या दिया, बहू तो उनसे झगड़ ही पड़ी, जैसे शांति जी कोई नासमझ हों। 

कह रही थी “आपको समझ नहीं आता क्या मम्मी, डॉक्टर की दवाई दे तो रही हूँ मैं, ये सब नुसके मत आजमाया कीजिये चीकू पर प्लीज”

शांति जी पूरी रात सोचती रही थीं की, “क्या इतनी बड़ी गलती कर दी मेंने? संदीप को भी तो देती थी अदरक का रस और शाहद, फिर कैसे चैन की नींद सो जाता था वो।”

इन्हीं ख़यालों में खोई शांति जी की अभी नींद लगी ही थी की, खिड़की से घुसे एक तेज़ हवा के झोके ने किच्चन की चोखट पर टंगे केलेंडर को नीचे गिरा दिया। केलेंडर पर निगाह पड़ी तो देखा, लाल रंग के गोले में एक तारीख टिम टिमा रही थी। दूसरी तारीखों से बिलकुल

अलग, जहां सबका रंग काला भाव शून्य था, वहीं नारंगी रंग से रंगी ये तारीख किसी बच्चे की तरह खिलखिला रही थी।

चीकू के पसंदीदा रंग से सजी उस तारीख को देख शांति जी के चेहरे की चमक लौट आयी। उन्हे याद आया उस दिन चीकू किस तरह अपने बर्थ डे की प्लानिंग कर रहा था, वो कह  रहा था – “दादी मैंने अपना बर्थ डे ऑरेन्ज कर दिया है, मेरे बर्थ डे पर अपन सब चिड़ियाघर चलेंगे, वहाँ तरह तरह के जानवर देखेंगे और फिर मैं आपको हाथी की सवारी कराऊँगा।” ऐसा बोल चीकू हवा में उछला था, कितना खुश था वो उस दिन। यह सब सोच शांति जी के चेहरे पर मुस्कुराहट तैरने लगी। ना जाने कहाँ से उस बुझी काया में ऊर्जा लौट आयी थी। कुर्सी छोड़ वो सफाई करने खड़ी हो गईं, उन्हे यकीन था की बहू ग़ुस्से कि भले तेज़ है पर जन्मदिन वाले दिन तो वो चीकू को उसकी दादी से मिलाने जरूर लाएगी।

फिर वो दिन भी आ ही गया, घर का एक एक कोना काँच की तरह चमकाया था शांति जी ने, गेस पर कड़ाई, बगल में घी, शकर का डब्बा, सूजी सब तैयार रखा था। - चीकू आयेगा तो गरम गरम सूजी का हलवा खिलाकर मुह मीठा कराउंगी उसका, फिर बहुत सारी बातें करेंगे हम, चिड़ियाघर जाएंगे, हाथी की सवारी करेंगे और फिर..... फिर मौका देख मैं बहू को घर वापस आने का बोल दूँगी, कह दूँगी अब छोड़ दे ग़ुस्सा बहू, मैं मेरे चीकू के बिना नहीं रह पाती, वो भी तो एक माँ है ना, समझ जाएगी मेरी बात। शांति जी ने अपने मन को दिलासा देते हुए कहा।

फिर सफाई में मिली चीकू की ड्राइंग बुक गोदी में रख, दरवाजे के ठीक सामने कुर्सी लगा बैठ गई। कभी दरवाजे को देखतीं तो कभी घड़ी को, और फिर कभी चीकू की ड्राइंग बुक में बनी तस्वीरों में खो जाती।

किताब के पहले पन्ने पर बने वंश वृक्ष में चीकू के मम्मी पापा की तस्वीर के ऊपर लगी, खुद की तस्वीर देख खुश हो ही रही थीं वो कि, घड़ी के पेंडुलम ने आवाज़ कर 12 बजने का इशारा कर दिया। घड़ी के दोनों कांटे एक दूसरे से जा मिले थे। पर दादी से मिलने उसका लाडला अभी तक नहीं आया था।

दादी – घडी की छोटी सुई घंटे में समय बताती है और बड़ी सुई मिनट में....चीकू की कही गई अंग्रेजी कहावत का हिंदी मायने याद कर दादी मुस्कुरा उठीं और  उनके कानों में घड़ी से जुड़ी चीकू की यादें गूंजने लगीं।  फिर दरवाजे पर आहट हुई, शांति जी अपनी कुर्सी पर सचेत हो गईं, उन्हे लगा चीकू आ गया, पर वो हवा का झोंका था , जो शांति जी से फिर एक और भद्दा मज़ाक कर गुजरा था।  12  बजे के बाद 3 बजे फिर घड़ी ने दस्तक दी, इस बार दरवाजे पर आहट कुछ तेज़ हुई, और फिर दरवाजा भी खुला –

सूरज की तेज़ रोशनी से दरवाजे पर खड़ी छवि धुंधली दिखाई दे रही थी। फिर शांति जी ने धीरे से आवाज़ दी –आ गया क्या मेरा बेटा?

और फिर कुछ ही पलों में चीकू की मीठी आवाज़ में जवाब आया – मैं आ गया हूँ दादी। वो दौड़ कर शांति जी के गले लग गया। शांति जी ने उसे सैकड़ों बार चूमा, कहने लगीं – “मेरा बेटा, इतनी देर क्यूँ लगा दी आने में, मैं कबसे इंतज़ार कर रही थी तेरा।”

दादी मम्मी आने ही नहीं देती मुझे, आज भी बस ड्राईवर भैया से रिक्वेस्ट की तो उन्होने छोड़ा मुझे, वो अभी दूसरे बच्चों को छोड़कर आएंगे फिर मुझे लेकर जाएंगे, दस मिनट बाद। चीकू ने दुखी होते हुए बोला तो शांति जी ने चीकू पर अपनी पकड़ और मजबूत कर लिया।

बोलीं – इतना प्यार करता है मेरा बेटा दादी से?

हाँ दादी बहुत….  आई लव यू....दादी।


जयंत दासवानी, सीहोर, मप्र

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समीक्षा

ये कहानी पहली नजर में.... दादी और पोते के प्रेम की कहानी है.... लेकिन जब इसको पढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं... तो रिश्तों की सीवन में से.... उधड़ती तुरपाई साफ शिकायत करती है.... कि दादी...... वो कहानी है ... जो रिश्तों को जीना भी दर्शा रही है... और उनमें बढ़ती खटास को भी बताती है..। कहानी को बिना किसी... भाषागत घुमाव फिराव के सीधे और सरल शब्दों में बयाँ किया है..... यही लेखनी का कमाल भी है कि.... बिना शाब्दिक मेक अप के भी... कहानी अपने सौंदर्य की पूर्णता को न केवल प्राप्त करती है.... बल्कि अपने चुम्बकीय आकर्षण में पाठक को... बांधे भी रखती है....। भाव प्रधान कथानक वैसे बहुत ही सीधा है... और आम विषय  है.... जो एक कहावत... मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है... उस पर टिका है....। यानि पुत्र से ज्यादा प्यार.... पौत्र (पोते) पर आता है....। प्रेम की इस गंगा का वेगवान प्रवाह रोकती है... आधुनिक विचारों वाली बहु..... जिसका पति संदीप... विदेश में है.... और एक हल्की फुलकी बीमारी का जिक्र कर... लेखक ने विचारो की खाई... की गहराई के दर्शन करायें हैं.... अदरक और शहद का खाँसी में दिया जाना.. बहु का डॉ से इलाज कराने का कहते हुए.... चीकू पर नुस्खे नहीं आजमाने का निवेदन करना..... यहीं बिंदु है परिवार में बिखराव का भी.... जब नए विचार.. पुरानी मान्यताओं को धकियाते हैं..... या पुरानी परम्परा नए ख्याल को घर की देहली नहीं चढ़ने देती....। दोनों का संतुलन ही परिवार की एकता बनता है.....। परिवार के बिखराव को रोकने के लिए.... यह समाधान कहानी... बिना कहे दे रही है....। फिर भाव शून्य रंग काला.... और नव उमंग व ऊर्जा के प्रतीक... नारंगी रंग... का अंतर चीकू की जन्म तारीख से बताना... मानव के मनो विज्ञान.... का ज्ञान भी करा देता है.....। दादी का बेकरारी से बहु के साथ पोते के घर आने का इंतजार.... लेकिन वह खाई क्या जो पट जाए.... न बहु आती है... न पोते को लाती है... प्रेम के मोती...दादी का .....इंतजार लुटा रहा है....  तो चीकू भी स्कूल बस ड्राईवर से निवेदन कर.... दस मिनट के लिए ही सही.... उन मोतियों को समेटने आ जाता है... दादी का लाडला पोता....। प्रेम प्रगाढ़ होने के लिए.... आलिंगन बद्ध होता है....। कई पाठकों को अपने आसपास घट रही घटना भी कहानी में नजर आने लगेगी तो.... जिनका पाला ऐसी बहु से नहीं पड़ा है... उन्हें ऐसी बहु होने का यकीन शायद ही हो.....। लेकिन यह बहु.... जो अब माँ बन गई है.... समय आने पर जब दादी बनेगी... तब समझ आयेगी... दादी पोते के प्यार की यह..... केमिस्ट्री.... तब तक वह अपनी गणित में उलझी रहेगी..... लेकिन कहानी यह भी चुपके से कह देती है.... कहीं देर न हो जाए....। एक युवा लेखक की लेखनी जब... इस तरह के कथानक रचती है.... तो ये यकीन दिलाती है कि... प्राचीन और अर्वाचीन के मिलन की घडी आ रही है... जब दोनों विचार.... परस्पर सहयोग बनाते हुए.... नव समाज का मार्ग प्रशस्त करेंगे...। 
शानदार कथानक की..... जानदार बधाई.... जयंत भाई......। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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