लेखिका
उसे यकीन हो चला था अंजुरी में भरे फूलों की खूशबू फूलो के हथेली से अलग होने के बाद भी हाथो में अक्सर रह जाती है ।
मंजु श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा मप्र
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समीक्षा
प्रतिद्वंदी..... एक लघु कथा.... तीन पीढ़ियों के अंतर को स्पष्ट करती है... जिसमें खास बिंदु है जनरेशन गेप को.... एक मनोविज्ञान से परिभाषित करना...। जब पुत्री अपनी ही माता से प्रतिस्पर्धा करे.... इस हद तक कि माँ की प्रशंसा करना भी.... बुरा लगने लगे.... तब उसको शब्दों में बांधना... एक दुष्कर कार्य है... लेकिन इस कठिनता जैसे... एवरेस्ट पर फतह पाने का काम लेखिका की लेखनी ने बखूबी किया है.....। खास कर जाते बचपन... और आते यौवन.... के समय की गिरते आसमान को उंगली पर भी रोक लेने.... के युवा जज्बे को भी इशारे में... बहुत ही सुंदरता से व्यक्त किया है.....। फिर अपनी ही जायी... का विरोध सहना.... किसी भी माँ के लिए कितना कष्टकर होता है... इसको भी माँ की सहनशीलता से.... रेखांकित करने का सफल प्रयास भी हुआ है... अगर माँ भी बेटी के सामने प्रतिद्वंदी बनकर... खड़ी हो जाती.. तो परिवार की शांति भंग होने में कितना समय लगना था.... इस महत्वपूर्ण बिंदु को भी... अनकहे रूप से कह दिया है.... यह कहानी का मर्म बिंदु भी कहा जा सकता है...।
एक मर्म और ये लघुकथा अपने अंतस में समेटे है.... जब बेटी की माँ से एकतरफा स्पर्धा है... लेकिन बेटी को माँ की जिम्मेदारी तब तक समझ में नहीं आती... जब तक वह खुद माँ नहीं बन जाती... यही इस कथा का असल सौंदर्य है.... जो अंजुरि में भरे गुलाब... को अपने इष्ट को अर्पित कर देने के बाद भी..... खाली हुई हथेलियों में वो सुवास छोड़ जाता है.... जिसकी महक से... जीवन मे मस्ती छा जाती है... लगभग इन्हीं भावनाओं के साथ... लघु कथा का समापन हो जाता है...। यह लघु कथा हिंदी साहित्य में... प्रयोग बतोर भी याद की जाना चाहिए... क्योंकि मनोविज्ञान आधारित कथाओं के चलन के आरम्भिक स्तर पर.. लेखिका की लेखनी चली है.... वह भी पूरी साहित्यिक गरिमा के साथ... शाब्दिक सौंदर्य के साथ.... अनकहे को कह देने की कला के साथ.... और पात्र के नाम बिना भी... अपनी पहचान छोड़ती यह लघु कथा के लिए.... लेखिका बधाई की हकदार हैं.... तो उनकी कलम प्रणम्य है... एक मील का पत्थर स्थापित करने के लिए.....।
शैलेश तिवारी, संपादक
प्रतिद्वंदी
कोख जायी थी वो,प्रतिछाया,मां के रक्त मज्जा से बनी, मां का प्रतिरूप----पर मां से विरुद्ध,विद्रोहिणी।जैसे हर वक्त मौके तलाशती हो।जुबां को तीर बना देने मेंऔर अक्सर कामयाब भी होती।बचपन की दहलीज पार कर यौवनास्था में पर्दापण कर रही थी।छूटता बचपन और आते यौवन का कच्चा सौंदर्य ,माँ के परिपक्व सौदंर्य से जैसे प्रतिस्पर्धा को तैय्यार था।सह नहीं पाती माँ के व्यक्तित्व की प्रशंसा।सामाजिक प्रशंसाऔर प्रंशसाओं के उत्तर प्रतिदंश ही होते अक्सर----परंतु मां तो मां थी।आहत तो होती पल-पल---पर क्षणांश में पीड़ा को विस्मृत कर देती। मित्र दोस्त,रिश्तेदार ,परिचित माँ के मनोरम व्यक्तित्व की चर्चा ,प्रशंसा अक्सर उसे चाहे-अनचाहे प्रतिद्वंदिता के उस स्तर तक ले आते।जहां उसे मां ,मां नहीं ।अपनी प्रतिद्वद्वीं ही नजर आती।भरसक प्रयत्न होता,मां का भी अपनी कोखजायी को अव्वल रखने का।परंतु विद्रोह के आगे,कोशिशे सदैव हार जाती,जो मां को ही नहीं मानती,वो माँ की कैसे मान लेती।सृष्टि के नियमों से कौन नहीं बंधा है,बेटी सात फेरो के बाद ससुराल में आज मां होने का गौरव प्राप्त करने जा रही थी,तीसरी पीढ़ी का गौरव। प्रतीक्षित परिवार जन प्रतिक्षा में थे,आज तीसरी पीढ़ी का जन्म होने जा रहा था। माँ की चितिंत निगाहों में असंख्य सवाल थे ---तीसरी पीढ़ी में आज फिर बेटी का जन्म हुआ था,और कोखजायी अपनी देह से ,अपने रक्त मज्जा से बनी अपनी प्रतिछाया को देख माँ की ओर देख मुस्कुरा रही थी,और मां की आंखो से जैसे पीड़ा झर-झर वही जा रही थी----उसे यकीन हो चला था अंजुरी में भरे फूलों की खूशबू फूलो के हथेली से अलग होने के बाद भी हाथो में अक्सर रह जाती है ।
मंजु श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा मप्र
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समीक्षा
प्रतिद्वंदी..... एक लघु कथा.... तीन पीढ़ियों के अंतर को स्पष्ट करती है... जिसमें खास बिंदु है जनरेशन गेप को.... एक मनोविज्ञान से परिभाषित करना...। जब पुत्री अपनी ही माता से प्रतिस्पर्धा करे.... इस हद तक कि माँ की प्रशंसा करना भी.... बुरा लगने लगे.... तब उसको शब्दों में बांधना... एक दुष्कर कार्य है... लेकिन इस कठिनता जैसे... एवरेस्ट पर फतह पाने का काम लेखिका की लेखनी ने बखूबी किया है.....। खास कर जाते बचपन... और आते यौवन.... के समय की गिरते आसमान को उंगली पर भी रोक लेने.... के युवा जज्बे को भी इशारे में... बहुत ही सुंदरता से व्यक्त किया है.....। फिर अपनी ही जायी... का विरोध सहना.... किसी भी माँ के लिए कितना कष्टकर होता है... इसको भी माँ की सहनशीलता से.... रेखांकित करने का सफल प्रयास भी हुआ है... अगर माँ भी बेटी के सामने प्रतिद्वंदी बनकर... खड़ी हो जाती.. तो परिवार की शांति भंग होने में कितना समय लगना था.... इस महत्वपूर्ण बिंदु को भी... अनकहे रूप से कह दिया है.... यह कहानी का मर्म बिंदु भी कहा जा सकता है...।
एक मर्म और ये लघुकथा अपने अंतस में समेटे है.... जब बेटी की माँ से एकतरफा स्पर्धा है... लेकिन बेटी को माँ की जिम्मेदारी तब तक समझ में नहीं आती... जब तक वह खुद माँ नहीं बन जाती... यही इस कथा का असल सौंदर्य है.... जो अंजुरि में भरे गुलाब... को अपने इष्ट को अर्पित कर देने के बाद भी..... खाली हुई हथेलियों में वो सुवास छोड़ जाता है.... जिसकी महक से... जीवन मे मस्ती छा जाती है... लगभग इन्हीं भावनाओं के साथ... लघु कथा का समापन हो जाता है...। यह लघु कथा हिंदी साहित्य में... प्रयोग बतोर भी याद की जाना चाहिए... क्योंकि मनोविज्ञान आधारित कथाओं के चलन के आरम्भिक स्तर पर.. लेखिका की लेखनी चली है.... वह भी पूरी साहित्यिक गरिमा के साथ... शाब्दिक सौंदर्य के साथ.... अनकहे को कह देने की कला के साथ.... और पात्र के नाम बिना भी... अपनी पहचान छोड़ती यह लघु कथा के लिए.... लेखिका बधाई की हकदार हैं.... तो उनकी कलम प्रणम्य है... एक मील का पत्थर स्थापित करने के लिए.....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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