लेखिका 

दोहे

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गुरुवर  की  आराधना, करती  है  कल्याण ।
गुरु  की  आज्ञा  मानकर , शिष्य बने गुणवान ।।

कदम कदम पर देखिये, झूठे लोग हजार ।
रचा हुआ हर ओर है, स्वारथ का संसार ।।

अंतःकरण की वेदना, देती दिल को चीर ।
बस मन का संतोष ही, हर लेता सब पीर ।‌।

सरहद पर जो दे गया, लड़ते- लड़ते  प्राण ।
ऐसे वीर सपूत को, करता नमन मसान ।।

यदि माया में लिप्त हो, छोड़ा अपना  देश ।
अपनों से होकर विमुख, बीते जीवन शेष ।।

करूँ नमन गुरुदेव को, नित्य नवाऊँ शीश ।
गुरु चरणन में दीखते ,परम पुरुष जगदीश ।।

हिंदी हिंद की आत्मा, मन से करो प्रचार ।
श्रेष्ठ सभी से है सखे , हिंदी का संसार ।।

सखे बिगाड़े क्या भला, उनका ये संसार ।
राम नाम के आसरे, करते जो भव पार ।।

होनी तो होकर रहे, समय बदलता चाल ।
कभी खुशी उर झूमती, कभी घूरता काल ।।

चाहे जितने ले बदल, रे मन अपने भेष ।
एक दिवस ले जायगा, काल पकड़कर केश ।।

निधि भार्गव 'मानवी' दिल्ली

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