लेखिका
बिडंबनाओं की चादर ओढ़े
नियति की भारी मार सहकर
एक नारी जब
अपने और अपनों की ज़रूरतों के लिए
उतरती है देह के बाज़ार में ...
तब वैश्या कहलाती है...
मजबूरियाँ.. कभी नादानी..
बैठा देती है उसे
जिस्म के बाज़ार में
रात के अंधेरे में
बोटी नोचते समाज के ठेकेदार..
दिन के उजाले में
हिकारत परोसते हैं
उसके आगे...
रात की शम्मा :::
दिन में कालिख परोसती है...
न जाने कितने रेड लाइट एरिया
कितने सोनागाछी हैं
इनके नसीब में
जहाँ बेटा -दलाल
और बेटी सिर्फ रातरानी बन महफिल सजाती है...
अरे... माँ की मूर्ति की पहली माटी
क्या इतनी अछूत
जो तुम इसे घर की चौखट... मंदिर की देहरी ... छोड़ो...
अपनी लोलुप कुत्सित सोच से परे
अपने इस समाज में
दिन का उजाला
और संवेदना का थोड़ा सा ऑक्सीजन नहीं दे सकते हो ?
वेश्या
बिडंबनाओं की चादर ओढ़े
नियति की भारी मार सहकर
एक नारी जब
अपने और अपनों की ज़रूरतों के लिए
उतरती है देह के बाज़ार में ...
तब वैश्या कहलाती है...
मजबूरियाँ.. कभी नादानी..
बैठा देती है उसे
जिस्म के बाज़ार में
रात के अंधेरे में
बोटी नोचते समाज के ठेकेदार..
दिन के उजाले में
हिकारत परोसते हैं
उसके आगे...
रात की शम्मा :::
दिन में कालिख परोसती है...
न जाने कितने रेड लाइट एरिया
कितने सोनागाछी हैं
इनके नसीब में
जहाँ बेटा -दलाल
और बेटी सिर्फ रातरानी बन महफिल सजाती है...
अरे... माँ की मूर्ति की पहली माटी
क्या इतनी अछूत
जो तुम इसे घर की चौखट... मंदिर की देहरी ... छोड़ो...
अपनी लोलुप कुत्सित सोच से परे
अपने इस समाज में
दिन का उजाला
और संवेदना का थोड़ा सा ऑक्सीजन नहीं दे सकते हो ?


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