लघुकथा
लेखिका
जल्दी जल्दी पर्दे और कुशन कवर बदल सुनिधि के साथ रसोई में आगया। चार बजते देर नही लगी किट्टी की थीम और खाने की खुब तारीफ़ भी हुई,तारीफ़ का सारा श्रेय सुनिधि ने अपने बेटे अनिकेत को दिया, यह सुनते ही सुनिधि की एक सहेली मुँह बनाकर बोली फिर तो सुनिधि तुम्हे अपने बेटे के फ़्यूचर की फ़िक्र नही होनी चाहिए यह तय है की वह शेफ़ ही बनेगा , एक तरह से मॉडर्न वेटर।
अनामिका की इस #प्रतिक्रिया पर सुनिधि अचंभित थी, मानसिकता पर आश्चर्य हो रहा था, क्या बेटे का घर काम में हाथ बंटाना भी आलोचना का विषय हो सकता है?
सुनिधि की मनोदशा देख बेटे अनिकेत ने तुरंत मोर्चा संभाला, झट से बोला शुक्रिया आँटीजी आपने तो मेरी बहुत बड़ी समस्या का समाधान कर दिया अब मै इंटर के बाद मै Hotel managment ही करूँगा और माँ के सिखाएं लज़ीज़ खानें को प्रमोट करूँगा ।क्यों माँ यह कहकर अनिकेत अपनी माँ सुनिधि के गले लग गया। सुनिधि की आँखों में ख़ुशी के आँसु थे वह असमंजस में थी। और माँ बेटे का स्नेहिल #प्रतिक्रिया देख सुनिधि की सहेलियाँ निःशब्द ,आवाक माँ बेटे को निहार रहीं थीं...!
#स्वरा सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ, उप्र
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कई लघुकथा के साँझा सँग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कई पत्र पत्रिकाओँ में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होने के साथ आलेख आदि भी प्रकाशित हुए हैं। साथ ही all india radio में वार्ता में शामिल होती रही हैं। एक दैनिक समाचार पत्र की सह संपादिका का दायित्व भी आप वहन कर चुकी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।
संपादक
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बदलते वक्त के साथ.... जब हमारी कदम ताल तेज हो रही हों... तब केवल वर्तमान की क्रिया भर अपना लेने से... दौर नहीं बदला करते... अपनी मानसिकता भी बदलनी होती है... नये ज़माने की नई संभावनाओं पर भी पैनी नजर रखनी होती है....। बेटे द्वारा की गई मदद से अभिभूत... सुनिधि जब किट्टी पार्टी की सफल तैयारियों का श्रेय अपने बेटे.. अनिकेत को देती है... तब माँ की उदारता और विशाल ह्रदय के दीदार होते हैं..... लेकिन अनामिका की अनिकेत के सुरक्षित भविष्य को लेकर... उसके आधुनिक शेफ बन जाने की टिप्पणी... आहत करती है सुनिधि को...। यहाँ अनामिका का गुप्त उपहास उड़ाना भी प्रकट होता है... लेकिन अनामिका की क्रिया की प्रतिक्रिया में.. अनिकेत का होटल मैनेजमेंट कर लेने का कहना... इस कथानक के शीर्षक को सही ठहरा जाता है....। कथानक का प्रवाह... वेगवान है और अपनी धारा में पाठक को अपने अंत तक बहा ले जाता है...। आधुनिक जीवन शैली, पुरानी सोच और भविष्य की योजना सभी को अपने में समाहित किये... यह कथानक बहुत कुछ अनकहा भी कह जाता है... जो वैचारिक परिवर्तन लाने को.. आंदोलित करता है..।
"स्वरा" की लेखनी के मुखर स्वर... गूँज रहे हैं कथानक में....। बहुत बहुत बधाई.. और शुभकामनाएं सुरेखा अग्रवाल जी...।
शैलेश तिवारी, संपादक
लेखिका
प्रतिक्रिया...
सुनिधि जल्द से ज़ल्द अपने काम समेटने में लगी हुई थी जल्दी से नियम को ऑफिस भेज कर उसका टिफ़िन लगा वह थीम के अनुसार पर्दे और कुशन कवर बदलने में लग गई आज किट्टी पार्टी जो थी उसके यहाँ शाम चार बजे से। खाने की तैयरी भी करनी थी ।उसका स्वास्थ्य भी सही नही था ,बेटे को बोर्नविटा दे वह फिर व्यस्त हो गई ,माँ की व्यस्तता देख बेटे अनिकेत ने भी माँ का हाथ बंटाना शुरू कर दिया बेटे के इस स्नेह को देख सुनिधि को बेटी ना होने का कमी कभी नही महसुस की,माँ तुम इतने काम मत किया करो मै हूँ ना?मुझे बताओ क्या करना है।जल्दी जल्दी पर्दे और कुशन कवर बदल सुनिधि के साथ रसोई में आगया। चार बजते देर नही लगी किट्टी की थीम और खाने की खुब तारीफ़ भी हुई,तारीफ़ का सारा श्रेय सुनिधि ने अपने बेटे अनिकेत को दिया, यह सुनते ही सुनिधि की एक सहेली मुँह बनाकर बोली फिर तो सुनिधि तुम्हे अपने बेटे के फ़्यूचर की फ़िक्र नही होनी चाहिए यह तय है की वह शेफ़ ही बनेगा , एक तरह से मॉडर्न वेटर।
अनामिका की इस #प्रतिक्रिया पर सुनिधि अचंभित थी, मानसिकता पर आश्चर्य हो रहा था, क्या बेटे का घर काम में हाथ बंटाना भी आलोचना का विषय हो सकता है?
सुनिधि की मनोदशा देख बेटे अनिकेत ने तुरंत मोर्चा संभाला, झट से बोला शुक्रिया आँटीजी आपने तो मेरी बहुत बड़ी समस्या का समाधान कर दिया अब मै इंटर के बाद मै Hotel managment ही करूँगा और माँ के सिखाएं लज़ीज़ खानें को प्रमोट करूँगा ।क्यों माँ यह कहकर अनिकेत अपनी माँ सुनिधि के गले लग गया। सुनिधि की आँखों में ख़ुशी के आँसु थे वह असमंजस में थी। और माँ बेटे का स्नेहिल #प्रतिक्रिया देख सुनिधि की सहेलियाँ निःशब्द ,आवाक माँ बेटे को निहार रहीं थीं...!
#स्वरा सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ, उप्र
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परिचय
स्वरा सुरेखा अग्रवाल मूलतः महाराष्ट्रीयन हैं , वर्तमान में लखनऊ उत्तरप्रदेश में निवासरत हैं। आपको साहित्य से लगाव है और अपनी कलम से साहित्य सेवा भी कर रही हैं। आपकेकई लघुकथा के साँझा सँग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कई पत्र पत्रिकाओँ में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होने के साथ आलेख आदि भी प्रकाशित हुए हैं। साथ ही all india radio में वार्ता में शामिल होती रही हैं। एक दैनिक समाचार पत्र की सह संपादिका का दायित्व भी आप वहन कर चुकी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
प्रतिक्रिया..... एक लघु कथा.. जिसका ताना बाना लेखिका ने.. वर्तमान की पृष्ठ भूमि को आधार बना कर बुना है....। प्रथमतः यह बात कहना चाहूंगा कि... इस कथानक में पात्रों के नाम चयन करने में... शायद किसी शोध जैसी प्रक्रिया अपनाई गई है... हर नाम अपने को चरितार्थ करता नजर आता है...। कहानी की नायिका सुनिधि... जो पति, संतान, मित्र, आदि सभी प्रकार की निधियों से संपन्न है.... तभी तो वर्तमान में प्रचलित... किट्टी पार्टी की तैयारी थीम के हिसाब से कर रही है... कुशन और पर्दे बदलते हुए... स्वास्थ्य की विपरीतता को अनुकूल बनाते हुए..... पति हैं नियम... जो नियम से अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं....। सहेली है अनामिका..... ठीक वैसी जैसे अनाम लोगों द्वारा... कुछ भी बोल दिया जाना... और इसका बोला जाना ही कथानक की मूल विषय वस्तु है...। फिर आता है अनिकेत.... जिसका अर्थ तो बेघर होता है लेकिन यह भगवान कृष्ण का एक नाम है... जो सारी दुनिया को अपना घर मानते रहे... उन्हीं की तरह अनिकेत की दुनिया अपनी माँ में सिमटी है... और वो अपनी माँ की मदद कर रहा है... घर के कामों में माँ का हाथ बँटाकर... यह पिन पॉइंट है कथा का... जो युवकों को तो एक संदेश दे ही रहा है कि... बदलते दौर में पुरुष की घरेलू कामों में बराबरी की हिस्सेदारी का युग आ रहा है.... अपनी सोच को इस दिशा में बदल लो...। दूसरा संदेश उनके लिए भी है... जो बेटे और बेटी को अलग अलग नजरों से देखते हैं.... अक्सर यह अंतर बेटी के मामले में ज्यादा रेखांकित होता है... लेकिन इस कहानी में बेटे के साथ घटित हो रहा है....। नायिका को बेटे की मदद तसल्ली दे रही है... और बेटी नहीं होने के गम को दूर कर रही है....।बदलते वक्त के साथ.... जब हमारी कदम ताल तेज हो रही हों... तब केवल वर्तमान की क्रिया भर अपना लेने से... दौर नहीं बदला करते... अपनी मानसिकता भी बदलनी होती है... नये ज़माने की नई संभावनाओं पर भी पैनी नजर रखनी होती है....। बेटे द्वारा की गई मदद से अभिभूत... सुनिधि जब किट्टी पार्टी की सफल तैयारियों का श्रेय अपने बेटे.. अनिकेत को देती है... तब माँ की उदारता और विशाल ह्रदय के दीदार होते हैं..... लेकिन अनामिका की अनिकेत के सुरक्षित भविष्य को लेकर... उसके आधुनिक शेफ बन जाने की टिप्पणी... आहत करती है सुनिधि को...। यहाँ अनामिका का गुप्त उपहास उड़ाना भी प्रकट होता है... लेकिन अनामिका की क्रिया की प्रतिक्रिया में.. अनिकेत का होटल मैनेजमेंट कर लेने का कहना... इस कथानक के शीर्षक को सही ठहरा जाता है....। कथानक का प्रवाह... वेगवान है और अपनी धारा में पाठक को अपने अंत तक बहा ले जाता है...। आधुनिक जीवन शैली, पुरानी सोच और भविष्य की योजना सभी को अपने में समाहित किये... यह कथानक बहुत कुछ अनकहा भी कह जाता है... जो वैचारिक परिवर्तन लाने को.. आंदोलित करता है..।
"स्वरा" की लेखनी के मुखर स्वर... गूँज रहे हैं कथानक में....। बहुत बहुत बधाई.. और शुभकामनाएं सुरेखा अग्रवाल जी...।
शैलेश तिवारी, संपादक


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