तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिका “दिनमान” के मुख्य संपादक श्री त्रिलोक दीप जी का नरसिहगढ़ रियासत के मुखिया के साथ संस्मरण......
पहली बार जब मैं उनके यहां डिनर पर गया तो मेरे आने की खबर उनके निजी सचिव से लेकर सभी सेवकों को थी। बड़ी इज़्ज़त के साथ उनका निजी सचिव भानु प्रकाश सिंह जी से मिलवाने के लिए भीतर ले गये तो रास्ते में ही उनसे मुलाकात हो गयी। डिनर का भव्य इंतज़ाम था। खुलकर कई मुद्दों पर बात हुई इस ताकीद के साथ कि यह 'घोर निजी' बातचीत है जिसका गलती से कहीं ज़िक्र नहीं होना चाहिए। अब तक मुझे यह पता चल चुका था कि वह नरसिंहगढ़ के राजपरिवार के मुखिया हैं और बीकानेर राजघराने में उनका ससुराल है।उनकी पत्नी राजकुमारी लक्ष्मी कुमारी महाराजा डॉ.कर्णीसिंह की रिश्ते में हैं। डॉ.कर्णसिंह को मैं लोकसभा के समय से जानता था। कभी कभी भानु प्रकाश सिंह जी से उनके बारे में चर्चा भी हो जाया करती थी। भानु प्रकाश सिंह 1962 में राजगढ़ से बतौर निर्दल उम्मीदवार जीते थे लेकिन इंदिरा गांधी के आग्रह पर 1964 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। 1967 का चुनाव कांग्रेस की टिकट पर जीते। उनमें एक खासियत यह भी थी कि डिनर के बाद वह मुझे घर टैक्सी पर पहुंचवाया करते थे। दूसरी बार जब मैं डिनर के लिए गया तो वार्तालाप दोस्ताना हो गया। डिनर के दौरान ही उन्होंने मुझे नरसिंहगढ़ चलने का प्रस्ताव दिया। किन्ही कारणों से वह हक़ीक़ी शक्ल अख्तियार नहीं कर पाया। अब अक्सर मुलाक़ातें होने लगीं थी। एक दिन किसी स्टोरी के सिलसिले में मैं उनके घर मिलने के लिए चला गया। उनके निजी सचिव ने बताया कि वह किसी'सीक्रेट' कार्य में व्यस्त हैं, फिर भी मैं पूछ लेता हूं। मेरा नाम सुनकर वह खुद बाहर आ गए और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, 'मैं अपना त्यागपत्र लिख रहा था, सिर्फ मंत्री पद से ही नहीं, कांग्रेस पर्टी से भी। ' मेरे सवाल करने या कुछ कहने से पहले खुद ही बोले कि'इंदिरा गांधी भूतपूर्व राजाओं को मिलने वाली प्रिवी पर्स की व्यवस्था खत्म करने जा रही हैं। उनका तर्क है कि देश में इतनी गरीबी है कि पूर्व राजाओं को मिलने वाली ये सुविधाएं तर्कसंगत नहीं लगतीं। इसके उत्तर में मेरी दलील थी कि सभी 565 भूतपूर्व राजा इतने अमीर नहीं कि वे अपने घर का खर्च चला सकें। जब मेरी दलील उन्होंने खारिज कर दी तो मैंने मंत्री पद के साथ साथ पार्टी छोड़ने का भी फैसला ले लिया। उसी पर मैं काम कर रहा था। यह खबर जानने वाले आप पहले व्यक्ति हैं।' वर्तमान चित्र उसी समय का है 50 साल पहले का।
हमारी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। 1970 में कांग्रेस पार्टी और मंत्रिपद से इस्तीफे के बाद उन्होंने रजवाड़ों के हितों को कई मंचों पर उठाया। राजवाड़ा संघ ने उन्हें अपना अध्यक्ष बना दिया। कुछ रजवाड़ों ने नई स्वतंत्र पार्टी का गठन किया। बाद में भानु प्रकाश सिंह ने गुना-राजगढ़ से'शेर' चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा औऱ जीता लेकिन 1984 का चुनाव हार गये। 1991 में उन्हें गोआ का राज्यपाल बनाया गया। इस दौरान उनसे मुलाक़ातें जारी रहीं। एक बार गोआ सदन में डिनर का प्रोग्राम भी बना उस डिनर में हमने अपने पुराने दिनों को याद किया। इस बार उन्होंने गोआ आने का न्योता दिया लेकिन मैं उसका लाभ भी नहीं उठा सका। यहां भी उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री (संभवतः प्रताप सिंह राणे) से मतभेदों के चलते 1994 में इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल भानु प्रकाश सिंह स्वतंत्र सोच के व्यक्ति थे और खासे पढ़ाकू भी। उनकी नज़र में जो नीति या निर्णय उन्हें ठीक नहीं लगता था उसका वह विरोध करने से नहीं डरते थे। बाद में मुलाक़ातें कम हो गयीं। लेकिन उनकी सहृदयता मन में कहीं गहरे बैठी हुई है।
राजपरिवार के इन पूर्व राजाओं के कई तरह के शौक होते हैं। जैसे भानु प्रकाश सिंह को पढ़ने और बागबानी तथा यात्राएं करने का शौक था और हॉकी और क्रिकेट उनके प्रिय खेल थे। उनके ससुराली महाराजा कर्णसिंह दुनिया के बेहतरीन शूटर थे और ओस्लो में विश्व शूटिंग प्रतियोगिता के वह चैंपियन रहे। उनके नाम पर दिल्ली में कर्णसिंह शूटिंग रेंज भी है। विज़ियानगर के महाराजा महान क्रिकेटर थे और 'विज़ज़ी' के नाम से अंग्रेज़ी में क्रिकेट कमेंटरी करने के साथ सांसद भी थे।कई पूर्व महाराजा राजनीति में हैं, कुछ के अपने व्यापारिक संस्थान हैं, कुछ होटल उद्योग में हैं तो कुछ सामाजिक सेवाओं में भी हैं। अपने अपने शौक और माली हालत पर सभी लोग व्यस्त हैं। भानु प्रकाश सिंह की याद को सादर नमन।
Trilok Deep जी की वाॅल से साभार:
आजकल अपनी कुछ पुरानी एल्बम खंगाल रहा हूं। इसमें कुछ ऐसे व्यक्तियों के चित्र भी मिल रहे हैं जिनसे मेरी मुलाकात तो 'दिनमान' के पत्रकार के कारण हुई थी लेकिन धीरे धीरे कब वह दोस्ती में बदल गयी, पता ही नहीं चला। भानु प्रकाश सिंह जी ऐसे ही व्यक्तियों में हैं। जब मैं उनसे मिला था तो वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में उपमंत्री थे लेकिन रुतबा उनका किसी काबीना मंत्री से कम नहीं था। उनसे दो-तीन मुलाकातों के बाद ही मुझे पता चला कि वह नरसिंहगढ़ राजपरिवार के मुखिया हैं। वह बातचीत में बहुत ही विनम्र, सहज और सरल थे और दो मुलाकातों के बाद उन्होंने मुझे यह कह कर डिनर पर आमंत्रित कर लिया कि 'सुभीते' से खुलकर बातचीत करेंगे। पूरी तरह से तो याद नहीं है कि मैं उनसे कांग्रेस की राजनीति पर बात करने गया था या देश के आंतरिक व्यापार की जानकारी लेने अथवा खनिकों की बदहाली पर उनकी प्रतिक्रिया लेने। लेकिन यह भलीभांति स्मरण है कि उनसे हुई बातचीत को उनके शब्दों और भावनाओं के साथ जिस अंदाज में भेंटवार्ता के तौर पर छापा गया था वह उन्हें रुचिकर लगा और हमारे मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया। जब भी मुझे कांग्रेस पार्टी या उनके मंत्रालय बाबत जानकारी चाहिए होती थी भानु प्रकाश सिंह जी सदा उपलब्ध रहा करते थे।पहली बार जब मैं उनके यहां डिनर पर गया तो मेरे आने की खबर उनके निजी सचिव से लेकर सभी सेवकों को थी। बड़ी इज़्ज़त के साथ उनका निजी सचिव भानु प्रकाश सिंह जी से मिलवाने के लिए भीतर ले गये तो रास्ते में ही उनसे मुलाकात हो गयी। डिनर का भव्य इंतज़ाम था। खुलकर कई मुद्दों पर बात हुई इस ताकीद के साथ कि यह 'घोर निजी' बातचीत है जिसका गलती से कहीं ज़िक्र नहीं होना चाहिए। अब तक मुझे यह पता चल चुका था कि वह नरसिंहगढ़ के राजपरिवार के मुखिया हैं और बीकानेर राजघराने में उनका ससुराल है।उनकी पत्नी राजकुमारी लक्ष्मी कुमारी महाराजा डॉ.कर्णीसिंह की रिश्ते में हैं। डॉ.कर्णसिंह को मैं लोकसभा के समय से जानता था। कभी कभी भानु प्रकाश सिंह जी से उनके बारे में चर्चा भी हो जाया करती थी। भानु प्रकाश सिंह 1962 में राजगढ़ से बतौर निर्दल उम्मीदवार जीते थे लेकिन इंदिरा गांधी के आग्रह पर 1964 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। 1967 का चुनाव कांग्रेस की टिकट पर जीते। उनमें एक खासियत यह भी थी कि डिनर के बाद वह मुझे घर टैक्सी पर पहुंचवाया करते थे। दूसरी बार जब मैं डिनर के लिए गया तो वार्तालाप दोस्ताना हो गया। डिनर के दौरान ही उन्होंने मुझे नरसिंहगढ़ चलने का प्रस्ताव दिया। किन्ही कारणों से वह हक़ीक़ी शक्ल अख्तियार नहीं कर पाया। अब अक्सर मुलाक़ातें होने लगीं थी। एक दिन किसी स्टोरी के सिलसिले में मैं उनके घर मिलने के लिए चला गया। उनके निजी सचिव ने बताया कि वह किसी'सीक्रेट' कार्य में व्यस्त हैं, फिर भी मैं पूछ लेता हूं। मेरा नाम सुनकर वह खुद बाहर आ गए और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, 'मैं अपना त्यागपत्र लिख रहा था, सिर्फ मंत्री पद से ही नहीं, कांग्रेस पर्टी से भी। ' मेरे सवाल करने या कुछ कहने से पहले खुद ही बोले कि'इंदिरा गांधी भूतपूर्व राजाओं को मिलने वाली प्रिवी पर्स की व्यवस्था खत्म करने जा रही हैं। उनका तर्क है कि देश में इतनी गरीबी है कि पूर्व राजाओं को मिलने वाली ये सुविधाएं तर्कसंगत नहीं लगतीं। इसके उत्तर में मेरी दलील थी कि सभी 565 भूतपूर्व राजा इतने अमीर नहीं कि वे अपने घर का खर्च चला सकें। जब मेरी दलील उन्होंने खारिज कर दी तो मैंने मंत्री पद के साथ साथ पार्टी छोड़ने का भी फैसला ले लिया। उसी पर मैं काम कर रहा था। यह खबर जानने वाले आप पहले व्यक्ति हैं।' वर्तमान चित्र उसी समय का है 50 साल पहले का।
हमारी मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। 1970 में कांग्रेस पार्टी और मंत्रिपद से इस्तीफे के बाद उन्होंने रजवाड़ों के हितों को कई मंचों पर उठाया। राजवाड़ा संघ ने उन्हें अपना अध्यक्ष बना दिया। कुछ रजवाड़ों ने नई स्वतंत्र पार्टी का गठन किया। बाद में भानु प्रकाश सिंह ने गुना-राजगढ़ से'शेर' चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा औऱ जीता लेकिन 1984 का चुनाव हार गये। 1991 में उन्हें गोआ का राज्यपाल बनाया गया। इस दौरान उनसे मुलाक़ातें जारी रहीं। एक बार गोआ सदन में डिनर का प्रोग्राम भी बना उस डिनर में हमने अपने पुराने दिनों को याद किया। इस बार उन्होंने गोआ आने का न्योता दिया लेकिन मैं उसका लाभ भी नहीं उठा सका। यहां भी उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री (संभवतः प्रताप सिंह राणे) से मतभेदों के चलते 1994 में इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल भानु प्रकाश सिंह स्वतंत्र सोच के व्यक्ति थे और खासे पढ़ाकू भी। उनकी नज़र में जो नीति या निर्णय उन्हें ठीक नहीं लगता था उसका वह विरोध करने से नहीं डरते थे। बाद में मुलाक़ातें कम हो गयीं। लेकिन उनकी सहृदयता मन में कहीं गहरे बैठी हुई है।
राजपरिवार के इन पूर्व राजाओं के कई तरह के शौक होते हैं। जैसे भानु प्रकाश सिंह को पढ़ने और बागबानी तथा यात्राएं करने का शौक था और हॉकी और क्रिकेट उनके प्रिय खेल थे। उनके ससुराली महाराजा कर्णसिंह दुनिया के बेहतरीन शूटर थे और ओस्लो में विश्व शूटिंग प्रतियोगिता के वह चैंपियन रहे। उनके नाम पर दिल्ली में कर्णसिंह शूटिंग रेंज भी है। विज़ियानगर के महाराजा महान क्रिकेटर थे और 'विज़ज़ी' के नाम से अंग्रेज़ी में क्रिकेट कमेंटरी करने के साथ सांसद भी थे।कई पूर्व महाराजा राजनीति में हैं, कुछ के अपने व्यापारिक संस्थान हैं, कुछ होटल उद्योग में हैं तो कुछ सामाजिक सेवाओं में भी हैं। अपने अपने शौक और माली हालत पर सभी लोग व्यस्त हैं। भानु प्रकाश सिंह की याद को सादर नमन।


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