लेखिका 

श्रमिक  की व्यथा 


 मजदूर , व्यवस्था  से कोसों दूर
हाथ में फावड़ा, गले में अंगोछा है
चेहरे पर  रहता  पसीने का पोछा है
टपकती झोपड़ी  में एक टूटी चारपाई है 
 हाथों में छाले पैरों में बिवाई है
मजाल है बिना  इनके किसी भी बंगले 
में रौनक  छाई है
जो लकीरे दी ईश्वर  ने हाथों में
मेहनत कर के वह खुद ही मिटाई है
कभी खैनी बनाता है  कभी बीड़ी  जलाता है  
दो टुकडों से घर अपना  चलाता है 
हंसता  मुस्कुराता गुनगुनाता है 
पीछे इसके  न जाने कितनी  बेबसी 
यह छुपाता है 
वह मजदूर  ही है जो तमाम  आशियाने 
बना खुद  लावारिस  बन जाता है 
 लम्हा  जिन्दगी  का इनके  कोई
आसान  नही होता  
यह वही मजदूर  है बेईमान  नही होता है 
दे दूसरों को सम्मान  खुद अपमानित
अक्सर  हो जाता है
दो सूखी रोटी को यह न जाने  कितने 
चाव से खाता है 
कभी फुटपाथ  पर गाड़ियों से, कभी
पटरी पर अक्सर  यह कुचला  जाता है
बस दो सूखी रोटी के लिए  दर ब दर यह 
दुत्कार  दिया  जाता है
लाख दम्भ  भरें ये दुनिया  तेरे सुख हरने की
पर धरातल  में बातें है सब करने की
 लिखनी है तुम पर एक कविता    
चन्द अल्फाजों में दुख तेरा  कैसे हरती
स्तम्भ  हो हमारी  व्यवस्था के 
गर्व से  कहती हूँ 
लेखनी से सैकड़ो  बार  नमन तुम्हारा  करती हूँ ।
"पल भर को हो कोई  मजबूर 
पर ताउम्र   को ना हो मजदूर "
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दर दर भटकते हैं... बुजुर्ग

सौंप  अपनी विरासत  सारी
यह अब खाली हाथ  तकते हैं
बस दो जून की रोटी को
यह अब बच्चों से लपकते हैं
रात दिन  एक किये 
जिन  बच्चों की   चाह में
रोड़े से लगने लगे उनको
अब यह राह में
खून पसीने से खड़ी  की
इमारतें कई 
खुद एक कोने में अब सुबकते हैं
 मांगा  था मन्नतो में जिनको
अब वह इनको बोझ समझते हैं
कभी छींक भी आने पर
नजरे जिनकी उतारते थे
उन्ही  नजरों में अब यह खटकते हैं
सौंप  अपनी विरासत  सारी
दर दर  अब यह भटकते हैं।


बसंती सामंत, खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड

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परिचय

बसंती सामंत, ग्राम बिरिया, विकासखंड खटीमा, जिला उधमसिंह नगर उत्तराखंड की निवासी हैं। आप गृहिणी हैं लेकिन साहित्य से गहरा लगाव है। साहित्य सेवा के लिए यह अपना समय दान करती हैं। आपकी अधूरे अल्फ़ाज नाम से एक काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। इसके अलावा भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित और प्रसारित होती रहती हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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