लेखिका
तेरे साथ- साथ चलती रही।
जन्मों -जन्मों से गुजर कर ,
तुम पर ही तो आ के थमती रही।
जिंदगी के एक घाट से,
मौत के,
दूसरे घाट तक का सफर।
युगों- युगों से ना बदला है।
ना बदलेगा ।
जन्मों- जन्मों का यह सफर।
देखता हूँ....... तेरे घाट पर ,
जीवन का अनूठा ही फन।
मां की गोद में रुधन से भरा ।
नन्हीं किलकारी का स्वप्न ।
वो ममता ,
वो प्यार और स्नेह का अंबार।
जिंदगी के ,
स्वर्णित पलों का आभास ।
घुटनों के बल चलते,
सपनों की रंग -बिरंगी,
तितलियों को पकड़ने को,
मचलते मन की फुहार ।
कभी रुठ जाते, जिद्द करते,
फिर मान जाने के ढंग।
चिंताओं से मुक्त ,
हवा के झोंके से मुक्त ,
बहते जीवन के पल ।।
फिर समय की लहरों में ,
बचपन खो जाता है ।
पांव दबा के रेत के ,
घर बनाते भोले बचपन को,
जवानी की दहलीज पर ,
महल बनाने का स्वप्न सताता है।
फिर होड़ की ,
एक दौड़ शुरु होती है ।
इंसान सब पा जाना चाहता है।
हर रंग में खेलकर,
हर रस पी जाना चाहता है।
तब सब पा लेने की,
अमिट लालसा पाता है।
विषयों की लपटें,
दिन-रात दुगनी होती हैं।
इंसान ,
दूसरों को सीढ़ी बना।
अपने मतलब साधता है ।
विषयों का बोझ ढोते हुए।
पैसा कमाने की होड़ में ,
दिन-रात खोता है ।
अपना- पराया सब भूलता है।
धन की हवस में,
भोला बचपन तो..... क्या
बुढ़ापा भी आएगा यह भूलता है।
बस अपने लिए ,
अपनों के लिए जीता है ।
दूसरों को मारता- काटता है।
सच- झूठ के ,
कितने ही खेल खेलता है।
इस दौड़ में कब ,
जवानी बुढ़ापे में बदल गई ।
पता ही नहीं चलता है।
तब अपने किए कृत्यों का,
हिसाब नजर आता है।
वो अपनी जिन्हें अपना,
समझने का ,
भ्रम पाले बैठा था।
कोई अपना नहीं,
सारे अपने हैं।
यह एहसास जब आता है।
अपनी ही दुनिया बसा,
दुनिया बनाने वाले को
कब से भूले बैठा था ।
जब याद......... आता है ।
दूसरे ही पल सब छूट जाता है।
भीतर की ,
आत्मा जब जागती है।
बाहर की ,
आंख- कान- सांस
बंद हो जाते हैं।
जीवन के इस घाट पर,
रंगे सपने दूसरे घाट पर ,
खुद को ,
सफेद धुंध को ओढ़े हुए पाते हैं।
कितना भी ऊंचा उठ जाएं ,
खुद को धरा पर ही पाते हैं।
सब अपने -सब सपने ,
उस घाट पर रह जाते हैं।
फिर इस घाट से,
उस घाट का,
सफर कब खत्म हो गया ।
पिछले घाट पर,
छूटा सपनों का महल ।
अंतिम स्नान से ही धुल गया।
रिश्ते -नाते ,प्यार ,कड़वाहट,
यादें -बातें सब दिन ।
आग में हवन हो जाते हैं।
दूसरे घाट पर,
राख के ढेर के बादल उड़कर।
गंगा तेरी ही,
गोद में शरण पाते हैं।
तेरे ही प्रवाह में ,
प्रवाहित हो जाते हैं ।
फिर उसी से ,
नवजीवन का प्रवाह पाते हैं।
युगों- युगों से तुम्हारे घाट ,
जन्मों-जन्मों के ,
जीवन मरण की ,
अमृत कथा सुनाते हैं।
-----------
वो..... नाचती थी ?
जीवन की,
हकीकत से ,
अनजान।
अपनी लय में,
अपनी ताल में,
हर बात से अनजान ।
वो...... नाचती थी ?
सोचती.......... थी?
नाचना ही..... जिंदगी है ।
गीत- लय- ताल ही बंदगी है।
नाचना........ ही जिंदगी है ।
नहीं ........ शायद
नाचना ही.... जिंदगी नहीं है ।
इंसान हालात से नाच सकता है।
मजबूरियों की ,
लंबी कतार पे नाच सकता है।
लेकिन ...........
अपने लिए ,
अपनी खुशी से नाचना।
जिंदगी में यहीं,
संभव -सा नहीं।
हकीकतें दिखी......
पाव थम गए।
फिर कभी सबकी आंखों से,
ओझल हो ......
नाचती अपने लिए।
लेकिन जिम्मेदारियों से ,
वह भी बंध गए।
फिर गीत -लय -ताल,
न जाने कहां थम गए ।
पांव रुके,
और हाथ चल दिए।
शब्द नाचने लगे।
जीवन की,
हकीक़तों को मापने लगे।
उन रुके पांवों को ,
आज भी बुलाते हैं ।
तुम थमें हो ,
नाचना भूले तो नहीं ।
वो.....नाचती थी।
कभी हकीकतों से परे,
आज ......भी नाचती है ।
हकीकतों के तले ।।
संपादक
गंगा तेरा घाट
युगों- युगों से यात्रा मेरी,तेरे साथ- साथ चलती रही।
जन्मों -जन्मों से गुजर कर ,
तुम पर ही तो आ के थमती रही।
जिंदगी के एक घाट से,
मौत के,
दूसरे घाट तक का सफर।
युगों- युगों से ना बदला है।
ना बदलेगा ।
जन्मों- जन्मों का यह सफर।
देखता हूँ....... तेरे घाट पर ,
जीवन का अनूठा ही फन।
मां की गोद में रुधन से भरा ।
नन्हीं किलकारी का स्वप्न ।
वो ममता ,
वो प्यार और स्नेह का अंबार।
जिंदगी के ,
स्वर्णित पलों का आभास ।
घुटनों के बल चलते,
सपनों की रंग -बिरंगी,
तितलियों को पकड़ने को,
मचलते मन की फुहार ।
कभी रुठ जाते, जिद्द करते,
फिर मान जाने के ढंग।
चिंताओं से मुक्त ,
हवा के झोंके से मुक्त ,
बहते जीवन के पल ।।
फिर समय की लहरों में ,
बचपन खो जाता है ।
पांव दबा के रेत के ,
घर बनाते भोले बचपन को,
जवानी की दहलीज पर ,
महल बनाने का स्वप्न सताता है।
फिर होड़ की ,
एक दौड़ शुरु होती है ।
इंसान सब पा जाना चाहता है।
हर रंग में खेलकर,
हर रस पी जाना चाहता है।
तब सब पा लेने की,
अमिट लालसा पाता है।
विषयों की लपटें,
दिन-रात दुगनी होती हैं।
इंसान ,
दूसरों को सीढ़ी बना।
अपने मतलब साधता है ।
विषयों का बोझ ढोते हुए।
पैसा कमाने की होड़ में ,
दिन-रात खोता है ।
अपना- पराया सब भूलता है।
धन की हवस में,
भोला बचपन तो..... क्या
बुढ़ापा भी आएगा यह भूलता है।
बस अपने लिए ,
अपनों के लिए जीता है ।
दूसरों को मारता- काटता है।
सच- झूठ के ,
कितने ही खेल खेलता है।
इस दौड़ में कब ,
जवानी बुढ़ापे में बदल गई ।
पता ही नहीं चलता है।
तब अपने किए कृत्यों का,
हिसाब नजर आता है।
वो अपनी जिन्हें अपना,
समझने का ,
भ्रम पाले बैठा था।
कोई अपना नहीं,
सारे अपने हैं।
यह एहसास जब आता है।
अपनी ही दुनिया बसा,
दुनिया बनाने वाले को
कब से भूले बैठा था ।
जब याद......... आता है ।
दूसरे ही पल सब छूट जाता है।
भीतर की ,
आत्मा जब जागती है।
बाहर की ,
आंख- कान- सांस
बंद हो जाते हैं।
जीवन के इस घाट पर,
रंगे सपने दूसरे घाट पर ,
खुद को ,
सफेद धुंध को ओढ़े हुए पाते हैं।
कितना भी ऊंचा उठ जाएं ,
खुद को धरा पर ही पाते हैं।
सब अपने -सब सपने ,
उस घाट पर रह जाते हैं।
फिर इस घाट से,
उस घाट का,
सफर कब खत्म हो गया ।
पिछले घाट पर,
छूटा सपनों का महल ।
अंतिम स्नान से ही धुल गया।
रिश्ते -नाते ,प्यार ,कड़वाहट,
यादें -बातें सब दिन ।
आग में हवन हो जाते हैं।
दूसरे घाट पर,
राख के ढेर के बादल उड़कर।
गंगा तेरी ही,
गोद में शरण पाते हैं।
तेरे ही प्रवाह में ,
प्रवाहित हो जाते हैं ।
फिर उसी से ,
नवजीवन का प्रवाह पाते हैं।
युगों- युगों से तुम्हारे घाट ,
जन्मों-जन्मों के ,
जीवन मरण की ,
अमृत कथा सुनाते हैं।
-----------
वो..... नाचती थी ?
जीवन की,
हकीकत से ,
अनजान।
अपनी लय में,
अपनी ताल में,
हर बात से अनजान ।
वो...... नाचती थी ?
सोचती.......... थी?
नाचना ही..... जिंदगी है ।
गीत- लय- ताल ही बंदगी है।
नाचना........ ही जिंदगी है ।
नहीं ........ शायद
नाचना ही.... जिंदगी नहीं है ।
इंसान हालात से नाच सकता है।
मजबूरियों की ,
लंबी कतार पे नाच सकता है।
लेकिन ...........
अपने लिए ,
अपनी खुशी से नाचना।
जिंदगी में यहीं,
संभव -सा नहीं।
हकीकतें दिखी......
पाव थम गए।
फिर कभी सबकी आंखों से,
ओझल हो ......
नाचती अपने लिए।
लेकिन जिम्मेदारियों से ,
वह भी बंध गए।
फिर गीत -लय -ताल,
न जाने कहां थम गए ।
पांव रुके,
और हाथ चल दिए।
शब्द नाचने लगे।
जीवन की,
हकीक़तों को मापने लगे।
उन रुके पांवों को ,
आज भी बुलाते हैं ।
तुम थमें हो ,
नाचना भूले तो नहीं ।
वो.....नाचती थी।
कभी हकीकतों से परे,
आज ......भी नाचती है ।
हकीकतों के तले ।।
प्रीति शर्मा "असीम" नालागढ़ हिमाचल प्रदेश
---------परिचय -
प्रीति शर्मा" असीम" नालागढ़, जिला-सोलन हिमाचल प्रदेश की निवासी हैं। साहित्यिक रुचि ने पढ़ने के साथ साथ लिखने के लिए भी प्रेरित किया। रचनात्मक कार्यों में रुचि होने के साथ ही आपको हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी भाषाओं का ज्ञान है। आप नालागढ़ कला साहित्य मंच से जुड़ी हैं। जीवन का रंग और प्रेरणा नामक दो एकल काव्य संकलनों के अलावा आपके एक दर्जन से ज्यादा साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। देश- विदेश की पत्र -पत्रिकाओं में आपके कविता आलेख का प्रकाशन होता रहता है। आपको अनेक संगठनों द्वारा समय समय पर सम्मानित और पुरुस्कृत किया जा चुका है। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।संपादक


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