जब गणेश प्रतिमा की आंखों से निकले आंसू



सुधीर पाठक, आष्टा 

भगवान गणेश के अनन्य भक्त का स्वर्गवास होने पर स्वयं भगवान इतने दु:खी हुए कि उनके नेत्रों से तीन दिन तक आंसू बहते रहे। आज भी इस चमत्कारी प्रतिमा के समक्ष लोग मनोती मांगते है और इच्छित फल पाते हैं। कोई 253 वर्ष से भी अधिक प्राचीन यह मंदिर नगर के बड़ा बाजार में स्थित हैं। मंदिर भव्य एवं आकर्षक होने के साथ साथ पत्थरों तथा लकडिय़ों की कलात्मक खुदाई का सुंदर नमूना है। एक जमाने में इस मंदिर की देखरेख दानवीर सेठ नथमल अग्रवाल करते थे जिन पर गणेशजी की असीम कृपा थी। नगर के बुजुर्गों का कहना है कि सेठ नथमल अग्रवाल भगवान गणेश के अनन्य भक्त थे उनके स्वर्गवास पर मंदिर स्थित गणेश प्रतिमा की आखों से तीन दिन तक आंसू टपकते रहे जो नगर के कई लोगों ने देखे हैं। मंदिर के पुजारी रणछोड़दास बैरागी इसकी पुष्टि करते हैं। इस ऐतिहासिक एवं मनोकामना पूर्ण करने वाले भगवान गणेश के मंदिर में स्थित प्रतिमा ने 15 अगस्त 1985 को अपना चोला छोड़ा था। उस वक्त आकाश में गर्जना हुई थी जिसका श्रवण करने वाले अनेक लोग आज भी मौजूद हैं। इसके पूर्व सन् 1950 में भी गणेश प्रतिमा ने अपना चोला छोड़ा था। सन् 1985 में छोड़े गए चोले को नगर में श्रद्धा के साथ परिक्रमा करवाकर नेमावर स्थित नर्मदा नदी पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करने के बाद प्रवाहित किया था। इस मंदिर के अंदर एक प्राचीन गुफा हैं, जिसमें भगवान शंकर की जलाधारी एवं पिंडी स्थित है। कहते हैं इस गुफा से एक रास्ता किले तक जाता था। हालांकि इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण तो मौजूद नहीं है लेकिन यदा कदा वर्षो पूर्व हुई खुदाई के दौरान कुछ ऐसे प्रमाण जरूर मिले हैं जिससे इस गुफा के अस्तित्व को एकदम से नकारा नहीं जा सकता। इस मंदिर एवं दुकानों का निर्माण भगवान गणेश के अनन्य भक्त सेठ नथमल अग्रवाल की सुपुत्री चौथीबाई ने सन् 1946 में करवाया था। तब मंदिर के ऊपर एक धर्मशाला का निर्माण भी हुआ था। इस जीर्णोद्धार के समय सेठ फूलचंद बनवट ने अपनी अग्रणी भूमिका निभाई थी। धर्मनिष्ठ सेठ अग्रवाल की सुपुत्री चौथीबाई द्वारा 1946 में कराए गए निर्माण पर 5101 रूपए की राशि खर्च हुई थी। इस मंदिर को लेकर अनेक प्रकार की किवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं। कहते है कि मालवा विजय के दौरान मुगल सम्राट औरंगजेब ने इस मंदिर को जागीर और सनद दी थी, लेकिन वर्तमान समय में अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी नहीं है और ना हीं ऐसे कोई पुष्ट दस्तावेज उपलब्ध हैं, लेकिन क्विंदंतियों का भी अपना कोई आधार तो होता ही है। वैसे भी प्राचीन मंदिरों को तत्कालीन शासकों द्वारा जागीर स्वरूप भूमियां दी गई थी। सन् 2011 में मंदिर के  नवीन फर्श के निर्माण के लिए की गई खुदाई में एक ऐतिहासिक महत्व का शिलालेख मिला है। जिसके अध्ययन से ज्ञात होता है कि विक्रम संवत् 1820 में भगवान गणेश की स्थापना राधिकादास द्वारा की गई थी, इस प्रकार इस शिलालेख के आधार पर यह मंदिर 253 वर्ष से अधिक पुराना है। इस शिलालेख से इस मंदिर के बारे में अनेक जानकारियां स्वत: स्पष्ट हो गई है। इस मंदिर की व्यवस्था समिति के माध्यम से होती है। इसके प्रथम अध्यक्ष सेठ फूलचंद बनवट थे और उनके निधन के बाद उनके पुत्र पूर्व विधायक चंदनमल बनवट रहे। तत्पश्चात कमल किशोर नागौरी ट्रस्ट के अध्यक्ष बनाए गए। उनके स्वर्गवास के बाद फिलहाल श्रद्धालुओं द्वारा इस मंदिर की व्यवस्था की जाती हैं।
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