मच्छरों के काटने का दर्द आप क्या जानों साहब...

सुधीर पाठक

वैसे साफ तौर पर यह कह सकते हैं कि मच्छरों के काटने का दर्द क्या होता हैं यह साहब क्या जाने..? क्योंकि साहब के कक्ष और निवास दोनो स्थानों पर मच्छरों का आना प्रतिबंधित है। यदि गलती से भी कोई  मच्छर प्रवेश कर जाए तो वहा लगे संसाधन मच्छर को चंद सेकंड में धराशाही कर देते हैं। 
यह सब इसलिए उल्लेख किया जा रहा हैं कि एक बैंठक के दौरान एसडीएम साहब ने नगर पालिका के साहब को निर्देशित किया था। 
इस दिशा-निर्देश के दौरान बैंठक में मौजूद सदस्यों के प्रस्ताव की सहमती ध्वनित होती हैं। ऐसे में नगरपालिका का यह रवैया बताता हैं कि वह शहर के नागरिकों के प्रति कितनी संवेदनशील हैं। तुर्रा यह कि यह सब उस तहसील में हो रहा हैं जिसके जिले को यह गर्व हैं कि मुख्यमंत्री हमारे जिले के हैं।
सरकार और स्वास्थ विभाग का कहना हैं कि रोगप्रतिरोधक क्षमता बड़ानी चाहिए। प्रारंभ में सरकार ने इसके लिए काढ़ा वितरित कराया। कुछ को मिला और अनेक वंचित रह गए,
 परंतु  सरकार की गिनती सरकारी नुमाइंदों ने पूरी कर दी। कुछ समाजसेवी आगे आए और उन्होने अपने स्तर पर शहरभर को सेनेटाईज भी किया। इधर बारिश होते ही शहर में मच्छरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। कालोनियों के साथ-साथ शहर में कुछ स्थानों पर पानी जमा हो जाता हैं। ऐसे स्थान मच्छरों की फौज को बड़ाने के लिए आदर्श माने जाते हैं। यहा पनपते मच्छरों की फौज अब शाम होते ही हमला करने को तैयार हो जाती हैं। ऐसे में बिजली का गुल होना बच्चों के लिए तिलमिलाने वाला साबित होता हैं। जिस आकार में मच्छर इन दिनों मौजूद हैं, वे मक्खी का भ्रम उत्पन्न करते हैं। मच्छरों की फौज जब हमला करती हैं, तो उसके काटने का दर्द जिसने भी सहा हैं वह तिलमिलाकर रह गया। 
ऐसे में डेंगू और मलेरिया से लोगों को बचाने का दावा स्वत: की खोखला साबित हो रहा हैं। यदि डेंगू और मलेरिया हुआ तो फिर कोरोना से बचना मुश्किल। 

यह देखना दिलचस्प होगा कि नगरपालिका फागिंग मशीन चलाती हैं या नही? और पानी से भरे गड्डों में क्रूड आईल न सही वाहनों में उपयोग किया हुआ जला हुआ आईल का उपयोग करती हैं या नहीं?
पूरा मामला सिर्फ़ सीहोर जिले के आष्टा से ही जुड़ा नहीं, मैं तो हंडी का एक चावल सरकार के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। जो समूचे प्रदेश से कुछ न कुछ रिश्ता रखता है।

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