कहाँ तक ये अंधेरे.. मन को छलेंगे.. 

अभी कुछ समय से जब से देश दुनिया को कोरोना की काली छाया ने घेर लिया है तबसे एक गीत ने अपने देश में लोगों को बड़ा सहारा दिया हुआ है ,गीत है  "कहाँ तक ये मन को अँधेरे छलेंगे ,उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे " लॉक डाउन के दौरान यह गीत सबसे ज्यादा देखा /सुना गया।  ऐसे अद्भुत गीत को लिखने वाले के बारे शायद बहुत लोग नहीं जानते हैं  ? इनको लिखने वाले गीतकार योगेश 29 मई को  इस दुनिया को अलविदा कह गए।  इनके बारे में मैं इसलिए लिखना चाहूँगा कि इनके मरने का न कोई बहुत शोर हुआ और न ही इन्हें कोई ठीक प्रकार से श्रद्धांजलि दी गई। कइयों ने तो इनके ऊपर अजीत जोगी के साथ दो लाइन की खिराजे अकीदत देकर छुट्टी पा ली,दोनों को एक साथ ही निबटा दिया ! कुछ ने अच्छा लिखा भी लेकिन योगेश जी के ऊपर जब तक योगेश जैसा न लिखा जाए तो बात बनेगी नहीं,जंचेगी भी नहीं । योगेश जैसा कोई गीतकार हुआ ही नहीं है ,कई बार सोचा कि उन्हें मैं कुछ लिखकर श्रद्धांजलि दे दूँ  पर जब जब भी लिखने बैठा उनका नाम सोचते ही बदन में झुरझुरी सी आ गई ,बदन में बिजलियाँ सी दौड़ने लगीं (जो कि उनका नाम सुनकर हमेशा ही दौड़ जातीं हैं ) और जेहन में एक गीत गूँजने लगा "आये तुम याद मुझे गाने लगी  धड़कन ,खुशबू लाई पवन महका चन्दन. . "।
मन में यह विचार आ रहा है कि जो शख्स मुझे ,मेरी सकारात्मकता और संवेदना को उस पल  जिला देता है जब यह मरने लगती है तो उसे मैं श्रद्धांजलि कैसे दे सकता हूँ ? मैं तो उन्हें अपनी इस पोस्ट के जरिये बस याद कर रहा हूँ ,सबको याद दिला रहा हूँ ताकि हम सब के जीवन में सकारात्मकता और संवेदनशीलता सघन हो सके ,वायरल हो सके। योगेश जैसे महान व्यक्ति कभी मरा नहीं करते हैं ,इतने रोमांटिक ,सकारात्मक और चरम आनंद से सराबोर गीतों को लिखने वाला तो आबे हयात (अमृत) पीकर आता है और सदा अमर रहता है ,बस जाता है सभी के दिलों में एक खुशबू की मानिंद ।  इसलिए जब तक ये क़ायनात है ,जीवन है तब तक वे जीवित रहेंगे ,समीचीन रहेंगे अपने गीतों और कविताओं को जरिये । आइये जरा देखें की वे आज भी इतने समीचीन क्यों है और भविष्य में भी रहने वाले हैं  ? मानव जीवन में समस्याएं कभी भी पूर्णतयः दूर या हल नहीं होतीं हैं इसलिए हर कोई इनसे समझौता कर लेता है और वैसी ही बात करता है। लेकिन आज तक सिर्फ योगेश जी ही ये लिखने की हिम्मत कर पाए हैं कि  "..... ऐसा लग रहा है कि सारी उलझनें सुलझ गईं ..... ये धड़कनों की बात धड़कनें समझ गईं - फिल्म बातों बातों में ।  सोशल डिस्टन्सिंग के इस माहौल में अपनों से भावनात्मक नजदीकियां बनीं रहें , बढ़ने न  पाए तो उनको सुनिए "हमराही मंज़िल के मिल के चले हम आज सारे ,देखो कहीं कोई नहीं अब ज़िंदगी रो के गुज़ारे "-फिल्म अनोखा दान। जीवन यदि बदरंग नज़र आये तो भी योगेश जी ही याद आते हैं ,अपनी कलम रुपी कूची लेकर हमारे अफ़सुर्दा ,रंगहीन जीवन में सकारात्मकता और जिजीविषा के इंद्रधनुषीय रंग भर देते हैं। मिसाल पेश है जैसे "जीवन है एक सपना मधुर सुहाना सपना "-फिल्म हनीमून , "ये दिन क्या आये लगे फूल हंसने ,देखो बसन्ती बसन्ती होने लगे मेरे सपने "-फिल्म छोटी सी बात ,"खोये हो आखिर किस बेखुदी में कुछ और भी है इस ज़िंदगी में "-फिल्म चला मुरारी हीरो बनने , "ए मेरे यार तू छोड़ गम छोड़ दे ये उदासी ,मुस्कुराते हुए काट दे ज़िंदगी की घडी ये जरा सी" -फिल्म लव इन कनाडा , "कोई रोको न दीवाने को मन मचल रहा" -फिल्म प्रियतमा । ये सभी  गीत अपने आप में ऐसी अद्भुत,अप्रतिम और अन्यतम कल्पनायें लिए हुए है कि लगता है जैसे आपके जीवन से सारे रंजो गम मिट गए हों ,तिरोहित हो गए हों और आपको किसी ने कल्पतरु के नीचे बैठा दिया हो जहाँ पर आपकी सभी इच्छाएं,मनोकामनाएं  पूरी हो गई हों !  फिर भी जीवन में यदि किसी को दुःख ज्यादा ही लगने लगें तो फिर एक बार उनको सुनिए "हम नहीं दुःख से घबराएंगे ,है नहीं सुख सुख जरा सा चारों तरफ है निराशा,फ़िर भी छोड़ेंगे ना आशा,हर दम मुस्कुरायेंगे ,हम नहीं दुःख से घबरायेंगे फिल्म "जीना यहाँ " , "हम गम से न हारेंगे ,एक रोज  हमारी राहें ये फूल संवारेंगे " फिल्म -ममता। लता और मदन मोहन ने मिलकर ट्रेजेडी पसंद श्रोताओं के लिए एक अलग ही संसार रचा है लेकिन सलिल दा और राजेश रोशन के साथ योगेश ने आकर इसमें सेंध लगा दी है। "ओ रे मन गुनगुन झूम के गा रे कोई गीत जिसे सुनकर जागे मेरा सोया सोया मीत" -फिल्म अग्निपरीक्षा , "मैं कौन सा गीत सुनाऊँ क्या गाऊं जब पिया बस जाये मेरे तन मन में" -फिल्म दिल्लगी , "मद भरी ये हवाएं पास आएं नाम लेकर मुझको ये बुलाएँ" फिल्म अनोखा दान । फिल्म जीना यहाँ में तो उन्होंने "ओ शाम आयी रंगों में रंगी हुई,पायल वायल मेरे पांवों में कोई बाँधो लागे नयी नयी.......यह जादू कैसा है जानूं न,लागे मुझे यह जीवन मेरा सोना " लिखकर स्त्री जीवन के जैसे उत्कर्ष पर पंहुचाकर उसके लिए इस धरा पर ही जैसे स्वर्ग रच दिया है। शब्द संयोजन में योगेश जी लासानी थे ,गीतों में वे शब्दों को ऐसे पिरोते थे जैसे कोई पुजारी ईश आराधना के लिए ब्रह्म कमल की माला बना रहा हो। कुछ गीतों पर नज़र डालते हैं - "सौ बार बना के मालिक ने सौ बार मिटाया होगा" - फिल्म एक रात , "कभी कुछ पल जीवन के लगता है के चलते चलते कुछ देर ठहर जाते हैं" - फिल्म रंग बिरंगी , "तुम जब से जीवन में खुशबू  तरह आये" - फिल्म किसी से न कहना,"कहीं दूर जब दिन ढल जाएँ "-फिल्म आनंद। "कई बार यूँ भी देखा है" फिल्म रजनीगंधा,"गाओ मेरे मन चाहे सूरज चमके चाहे लगा हो ग्रहण - फ़िल्म अपने पराये । फिल्म मिली के एक गीत मैंने कहा फूलों से के एक अन्तरे में उन्होंने अनादि काल से जलते ,झुलसते सूरज को ये लिख कर आराम दे दिया है "सूरज हँसा तो बिखर बिखर गई सूरज हँसा तो बिखर बिखर गयी किरणें,किरण किरण चुन कर धरती ये सज के सुनहरी बन गयी रे "। इसी फिल्म का एक और गीत आये तुम याद मुझे उन्होंने इस भावना से लिखा की कुछ ऐसी परिस्थितयां बन गईं कि किशोर कुमार ने इस गीत के लिए कलेजा निकाल के रख दिया और जन्म हुआ इस संसार के सबसे गहरे और ऊँचे प्रेम गीत का "जिस पल नैंनों में सपना तेरा आये उस पल मौसम पर मेहंदी लग जाए ..  " कौन होगा जो इस गीत की अतल गहराईयों में गुम न हो जाये ! उनकी कलम बड़ी इंद्रधनुषीय है एक और वे "जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाये " ,"रिमझिम गिरे सावन " जैसे चंचल शोख गीत लिखते है तो वहीँ पर दूसरी ओर "प्यास लिए मनवा ये तरसे ,एक बूँद तेरी दया की जो बरसे " फिल्म मेरे भैया , "श्याम रंग रँगा रे हर पल मेरा रे " -फ़िल्म अपने पराये जैसी प्रार्थनायें भी रच जाते हैं। शायद ऊपर ईश्वर को भी उनकी कमी बड़ी शिद्दत से खली होगी तभी उसने योगेश को ये कहकर अपने पास बुला लिया कि " तुम जो आओ तो प्यार आ जाए ज़िंदगी में बहार आ जाए" । मुझे उनके लिखे गीतों को सुनकर हमेशा ये लगता था कि जो ऐसा लिखता है वो दिखता कैसा होगा ? लेकिन गीतकार की कोई फोटो अमूमन तो कहीं छपती नहीं है उस पर से कोई उन जैसा शर्मीला और प्रसिद्धी से दूर रहने वाला व्यक्ति हो तो दर्शन और भी दुर्लभ हो जातें हैं। बड़े इंतज़ार के बाद नब्बे के दशक में उनकी फोटो इंटरनेट पर कहीं देखने को मिली। बुढ़ापे और सुंदरता का सम्बन्ध ठीक ऐसा है जैसा भारतीय राजनीति और ईमानदारी का ,जो शायद कभी देखने को ही न मिले। पर वृद्धावस्था में यदि मैंने सबसे खूबसूरत कोई व्यक्ति देखा है तो वे योगेश जी ही हैं। ये बात वो व्यक्ति कह रहा है जो बड़े बड़े खूबसूरत रह चुके फिल्म स्टार्स /नायकों की फ़िल्में आज इसलिए नहीं देख पाता है कि ये सबको जरावस्था ने और अन्य कारणों ने इतना सड़ा गला के,कुम्हला के ,हिला के रख दिया है कि और इनको देखना मतलब अपना दिमाग .........। लेकिन योगेश जी अपने लिखे को जीते थे तभी तो वो जीवन में कभी मुरझाये हुए,कुम्हलाये हुए नहीं दिखे। वही फूल सी नजाकत ,पंत जी जैसी सुकोमलता ,मधुर,विनम्र और संयत वाणी ....उफ्फ उन जैसा तो कोई नहीं ! सकारात्मकता और संवेदना के वे जैसे ब्रांड एम्बेसेडर हैं । मुझे याद आ रहा है कि एक बार  गुलज़ार जैसे बड़े गीतकार/लेखक को भी अपने अंदर एक योगेश पैदा करना पड़ा था तभी वे वासु चटर्जी की एक बेहद खूबसूरत फिल्म खट्टा मीठा के अद्भुत गीत लिख पाए जो उनके मिजाज के कतई नहीं थे । ......... हरी गुन लिखा न जाइ की तर्ज पर उनके गुणों का ,व्यक्तित्व का बखान करने बैठूंगा तो यह पोस्ट कभी ख़त्म ही नहीं होगी। उनके लिखे फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी गीतों की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है उसे एक पोस्ट में समेटना असंभव है। इसलिए इस पोस्ट को समाप्त कर मैं पुनः योगेश जी की यादों में ,गीतों में गुम हो रहा हूँ " वहीँ चल मेरे दिल ख़ुशी जिसने दी है ,तुझे प्यार की ज़िंदगी जिसने दी है " । और आप सबको छोड़े जा रहा हूँ योगेश जी की एक ऐसे unreleased गीत "गा मन मेरे गाओ वो तराने ,तू सुहाने ,जिसे सुनके रुत बदले दिन बदले ,बदले ये ज़माने ,ओ हँस के जरा.......... " के साथ जिसे वॉइस ऑफ़ गॉड अर्थात महान येसुदास ने स्वर दिया है ,सलिल दा की धुन और संगीत है ,इसे सुने यदि ऊपर के गीतों को सुनकर भी आपके जीवन से रंजो गम न मिटें तो यह तो मिटा ही देगा क्योंकि यह एक ब्रह्मास्त्र है और आप भली भांति जानते हैं कि ब्रह्मास्त्र  कभी चुकते या चूकते नहीं हैं ,महाकवि योगेश की तरह......। 

                           लेखक 

अतुल सक्सेना, सीहोर, मप्र

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