छतीसगढ़ जनसंपर्क का तानाशाही फरमान...
राज्‍य से बाहर वाले समाचार पत्रों को नही मिलेगा विज्ञापन,
अभिव्‍यक्ति की आजादी को पंगु बनाने का प्रयास,
भूपेश सरकार की छबि धूमिल करने का एक और कारनामा

विजया पाठक

एडिटर, जगत विज़न

                हाल ही में छत्‍तीसगढ़ के जनसंपर्क विभाग ने एक तुगलकी फरमान जारी किया है। फरमान पत्र-पत्रिकाओं को मिलने वाले शासकीय विज्ञापनों को लेकर है। इस फरमान में स्‍पष्‍ट कहा गया है कि राज्‍य के बाहर वाले पत्र-पत्रिकाओं (समाचार पत्रों) को अब शासकीय विज्ञापन जारी नहीं होंगे। 
इस आदेश के बाद छत्‍तीसगढ़ मीडिया में हड़कंप मचा हुआ है। चारों ओर इस आदेश की निंदा तो हो ही रही है, साथ ही प्रदेश की भूपेश सरकार भी कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। क्‍योंकि प्रदेश के इतिहास में पहली बार अभिव्‍यक्ति की आजादी पर इस तरह का कुठाराघात किया गया है। इस तानाशाही आदेश को कानूनी जामा पहनाने के लिए बकायदा जनसंपर्क विभाग ने आठ सदस्‍यीय समिति गठित की थी। इस समिति में अतिरिक्‍त मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी छत्‍तीसगढ़ संवाद, अपर एवं संयुक्‍त संचालक (विज्ञापन) जनसंपर्क संचालनालय नया रायपुर, अतिरिक्‍त मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी पिप्‍स, सीनियर प्रोग्रामर एलआईसी, बीईसीआईएल के प्रतिनिधि, टाईम्‍स ऑफ इंडिया रायपुर के संपादक जोसेफ जान और नवभारत बिलासपुर के संपादक हर्ष पाण्‍डेय शामिल थे। वहीं विश्‍वस्‍त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि इस कमेटी में शामिल दोनों पत्रकारों हर्ष पाण्‍डेय और जोसेफ जान से कमेटी में शामिल करने की सहमति नहीं ली गई थी। हालांकि इस समिति की कारगुजारियों पर प्रश्‍नचिन्‍ह खड़े किये जा रहे हैं क्‍योंकि जनसंपर्क विभाग से दिल्‍ली एवं अन्‍य प्रदेशों के बड़े-बड़े मीडिया संस्‍थानों को विज्ञापन जारी हो रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि छोटे और मध्‍यम श्रेणी के समाचार पत्रों पर जानबूझकर निशाना साधा गया है।
      इस पक्षपातपूर्ण किए गए आदेश के बाद तरह-तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं-
क्‍या मीडिया किसी राज्‍य विशेष की होती है?
क्‍या मीडिया के माध्‍यम से अभिव्‍यक्ति की आजादी को ऐसे पंगु बनाया जा सकता है?*
क्‍या मीडिया के शब्‍दों या विचारों को ऐसे दबा-कुचला जा सकता है?
क्‍या मीडिया संस्‍थानों को विज्ञापन देने का भी पैमाना होता है?
क्‍या विज्ञापन के माध्‍यम से मीडिया और शासन को बांटा जा सकता है?
ऐसे तमाम सवाल हैं जो प्रदेश की सरकार को और प्रदेश के जनसंपर्क विभाग को कठघरे में खड़ा करती है।
      मैं स्‍पष्‍ट तौर पर और मानसिक क्षुब्‍ध होकर सरकार से पूछना चाहती हूँ और सवाल खड़ा करती हूँ कि लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ को प्रोत्‍साहन के रूप में दी जाने वाली राशि (विज्ञापन) देने और न देने का क्‍या पैमाना होता है? कौनसे कानून और नियम में लिखा है कि फला संस्‍थान को विज्ञापन देना है और कौनसे संस्‍थान को विज्ञापन नहीं देना है। ऐसे फरमान जारी करने वाले ये वे विकृत मानसिकता के लोग हैं जो थोड़े से लोभ-लालच और व्‍यक्तिगत खुन्‍नस के चलते नियमों, कायदों को ही ताक पर रख देते हैं। दुर्भाग्‍य से ऐसे चंद अफसर शासन के महत्‍वपूर्ण विभाग में बैठ जाते हैं और अपनी ओछी मानसिकता को उजागर करते रहते हैं। ऐसी मानसिकता वाले लोग न सरकार का भला कर पाते हैं और न ही लोगों का।
      देश के अन्‍य प्रांतों के जनसंपर्क विभागों द्वारा भी विज्ञापन जारी होते हैं। विज्ञापन देने का भी एक उद्देश्‍य होता है। एक मोटिव होता है। विज्ञापन देने के बदले मीडिया संस्‍थान संबंधित सरकार की लोक-कल्‍याणकारी योजनाओं, समाचारों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। मीडिया संस्‍थान सरकार, शासन और आम लोगों के बीच सेतु का कार्य करते हैं। साथ ही सरकार की शासन की साफ-स्‍वच्‍छ छवि को निखारने का कार्य करते हैं। अब यदि ऐसे आदेशों से मीडिया को पंगु बनाया जाऐगा तो सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार कौन करेगा?
      यदि बात राज्‍य की मीडिया और बाहर की मीडिया की करें तो क्‍या भूपेश सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार केवल राज्‍य की मीडिया ही करती है। बाहर की मीडिया का कोई रोल नही है। हम जानते हैं कि वर्तमान मीडिया का स्‍वरूप विस्‍तृत और विस्‍तारित है। सरकार को यह बात भूलनी नही चाहिए। आज ऐसी बहुत पत्र-पत्रिकाऐं हैं जो देश के अन्‍य प्रांतों से प्रकाशित होती हैं। उनमें भी छत्‍तीसगढ़ के समाचार समाहित होते हैं। उनके भी हजारों पाठक छत्‍तीसगढ़ में हैं। क्‍या उन्‍हें भी बाहरी मान लिया जाएगा? बाहरी मान भी लिया जाए लेकिन कहीं न कहीं उनका सरोकार छत्‍तीसगढ़ से जुड़ा तो होता है। जनसंपर्क विभाग का जारी यह आदेश मुझे बहुत अचंभित और क्षुब्‍ध करने वाला लगता है।
      अब इस आदेश के दूसरे पहलू की बात करते हैं। निश्चित तौर पर विज्ञापन के संबंध में जो कमेटी बनी है और जो लोग इस कमेटी में हैं वह अपने-अपने क्षेत्र में काबिल होंगे। उनकी काबिलियत पर संदेह नही किया जा सकता है, लेकिन विज्ञापन देने और न देने जैसे मामलों में संपादकों या अन्‍य विभागों के अधिकारियों को क्‍या ज्ञान होगा? इस मसले में उनकी क्‍या प्रासंगिकता हो सकती है? मेरी समझ से परे है। हां, यदि अखबारों को शामिल करना ही था तो विभाग अखबारों के सीईओ को शामिल करता। जिनका विज्ञापन, प्रचार-प्रसार जैसे मसलों से सरोकार होता है। यहां तो रिक्तियां भरने का काम किया गया है।
      इन सबके बीच बात जनसंपर्क विभाग की करें तो बड़ा ताज्‍जुब होता है कि विभाग ऐसे कदम उठा सकता है। जनसंपर्क विभाग के आयुक्‍त तारण सिन्‍हा हैं। उनकी छबि साफ, स्‍वच्‍छ, निर्विवाद की है, लेकिन ऐसा क्‍या हुआ कि उन्‍होंने इस कदम का समर्थन किया। आखिर जनसंपर्क विभाग सरकार का बहुत महत्‍वपूर्ण विभाग है। जहां से ही सरकार की छवि प्रदर्शित होती है। दूसरी ओर सीएम के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग और संवाद के एडिशनल डायरेक्‍टर उमेश मिश्रा की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि इस आदेश में इन दोनों का रोल न हो। हो सकता है कि यह सारा किए कराया इन दोनों का ही प्रपंच हो। लेकिन ऐसा करके यह सरकार की छवि कैसे प्रदर्शित करना चाहते हैं। क्‍योंकि इस तरह के आदेश सरकार की छवि धूमिल करते हैं न कि निखारते हैं। आने वाले समय में मुख्‍यमंत्री भूपेश बघेल को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
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