लेखिका 

माना कि तुम समुंदर हो और मैं एक नदी
पर क्या तुम अपना खारापन छोड़ पाए
हर बार नदी छोड़कर अपनी मिठास
अस्तित्व विहीन हुई तेरी गहराई में
वेग औ उफ़ान अपने आँचल में समेटे
दर्द को भूलकर नेह ही लुटाती रही।
नदी भी चाहती है कुछ मीठे पल 
तुम्हारे दामन के खारेपन को भुलाकर
पर हर बार तेरा मुड़ -मुड़कर यूं ही
लहरों के साथ बहते किनारों को छूना
नदी को आवेशित औ उद्वेलित करता।
क्या कभी तुम समझ सकोगे नदी को..
जिसके विलुप्त अस्तित्व में तुम्हारी सार्थकता है....!!!


जया सिंह, सुल्तानपुर, उप्र

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परिचय

जया सिंह सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं। पेशे से शिक्षिका का दायित्व निभाती हैं। साहित्य के प्रति रुचि के चलते आप साहित्य सृजन करती हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर हार्दिक स्वागत है। 
संपादक
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