सुधीर पाठक
इस बार नदी अपनी हद बताकर चली गई, यह सब ऐसे ही नही हुआ। इसके पीछे प्रकृति की नाराजगी हैं, वह चाहती हैं कि हम अपनी हद में रहे। इसी के चलते नदियां अपने किनारों को छोड़कर शहर में आ गई, सही बात तो यह हैं कि जहा तक वे आई यह उनकी अपनी सीमा हैं। नाराज तो पहाड़ और टीले भी हैं। अभी तो नदी ने मोर्चा संभालकर अपनी हद बताई हैं। आगे पहाड् और टीले भी हमारे अपने को छीन लेगे हैं। सरकार भले ही लाखों देदे लेकिन जो गया हैं उसकी भरपाई नही हो सकती। क्या हम प्रकृति को उसकी हद छोडने के लिए छेड़ रहे हैं? तो यह महंगा सौदा हैं।पार्वती नदी अपनी हद बताकर चली गई, नदी की इस भाषा को कैसे समझे? इसे भी समझना होगा कि तेंदुआ शहर के मुहाने तक आ पहुचा। हाईवे पर हिरणों का समूह दिखा, यह सब प्रकृति के संकेत हैं। इनकों समझना होगा। इस तहसील में बहने वाले पार्वती, पापनाशिनी, दूधी, नेवज, कासम, धामनी नदी और कई बड़े नाले हैं। बीते दिनों नदियां अपने किनारों को छोड़कर शहर तक आ गई, कई लोगो के मकान में पहुच गई, कुछ के मकान ही डूब गए। सरकार मदद के लिए पहुंची तबतक नदी अपनी सीमा बताकर बिदा हो गई। यह कोई पहली बार नही हुआ हैं, जब भी नदी और नाले अपनी सीमा बताते हैं। हम इसे बाढ़ शब्द से संबोधित करते हैं। इस शब्द से नदी कोई परहेज नही, लेकिन इंसानी लोगों को हैं। हम चाहते हैं अपनी सुविधानुसार अपनी बस्ती बनाना। इस सुविधा के चक्कर में हम प्रकृति की इच्छा, सुविधा और सीमा तीनों भूल जाते हैं। हमकों यह तीनों को भुलाने में दो का बड़ा हाथ रहता हैं, एक राजनीति, दूसरे में वह महानुभाव जिनके पास प्रशासनिक व्यवस्था का जिम्मा हैं। राजनीति को वोट से मतलब हैं और प्रशासन में बैठे लोगों में अधिकांश ऐसे हैं, जो चाहते हैं कि सबकुछ शांतिपूर्वक हो जाए। फिर चाहे वह सही हो या गलत। इसी के चलते नेता वोट की फसल काट लेता हैं और प्रशासन में बैठे जिम्मेदार उसके बगलगीर बन इच्छित फल प्राप्त कर जाते हैं। इस जुगलबंदी से इंसानी लोग तो खुश हो जाते हैं, लेकिन प्रकृति नाराज हो जाती हैं और समय आने पर अपनी सीमा बताती हैं कि मेरी हद यहा तक हैं। नदियों के अपनी सीमा बताने से इंसानी ताकते नाराज हो जाती हैं। नदिया ही क्यों प्राकृतिकरूप से बने पहाड़, टीले भी हमसे नाराज हैं। स्थान की बडोत्री के चलते जिस प्रकार मकान का आगन हर वर्ष लगातार बड़ता जाता हैं और जिस प्रकार मकान की मंजिले एक के उपर एक बनती जाती हैं, उस लालच के चलते पहाड़, टीले का दबाव दीवारे सहन नहीं कर पाती, तो कही यह खुदाई परिवार के सदस्यों को छीन लेती हैं। घटनाए हर वर्ष घटती हैं, लेकिन इन से सबक ना लेकर जीवन की गाड़ी को आगे हांक देते हैं। गाडी तो चलती हैं, लेकिन अपने को खोने की कीमत अदा करने के बाद। सरकार राहत के लाख नही दस लाख दे पर परिवार का जो सदस्य खर्च हो गया, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। प्रकृति भी यही चाहती हैं कि हम अपनी हद में रहे, तो प्रकृति भी अपनी हद में रहेगी। क्या हम अपनी हद में रहने को तैयार हैं? यदि नही तो प्रकृति अभी तो सीधे तौर पर समझा रही हैं, आगे प्रकृति दूसरे तरीके अपना सकती हैं। क्या हम प्रकृति को उसकी हद छोड़ने के लिए छेड़ रहे हैं?


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