बिकती हैं कल्पनाएँ ... बोलो खरीदोगे.. 
                            लेखक

अभी आंखें खुलना तो नहीं चाह रही थीं, लेकिन धूप उनमें चुभ रही थी । उसने अपनी कमीज़ को अपनी आंखों पर रख लिया । कुछ देर तो अच्छा लगा लेकिन वो गंदी कमीज़ जल्दी ही धूप से गर्म होने लगी और उसकी निद्रा फिर टूट गई ।

झुंझला कर वो उठ बैठा उफ्फ ये गर्मी आती ही क्यों है ? खुद से ही पूछ बैठा । लेकिन जवाब का क्या वो तो नहीं ही मिलना था ।
      तभी एक बड़े बालों वाला एक आदमी जिसकी उम्र शायद पचास के आस - पास थी लेकिन पहनावे और काली रंगत उसकी उम्र सत्तर से कम नहीं बताते थे । आकर वहीं उसके निकट बैठ गया । उसने पहले ही शब्द से उस लड़के का नाम पूछा । मेरा नाम सुयश है बताकर लड़का फिर आंखों को धूप से अभ्यस्त करने लगा । वो वैसे भी उस भिक्षुक से बात नहीं करना चाहता था । उसके पेट में भूख के कारण मरोड़ जो हो  रही थी ।
       लेकिन बार - बार उस भिक्षुक के बोलते रहने के कारण सुयश झल्ला गया और बोला तुमको क्या चाहिए क्यों दिमाग खा रहे हो ?
भिक्षुक बोला मैं सौदागर हूं कल्पनाओं का ! अगर तुम चाहो तो तुम भी खरीद सकते हो !
लड़का जोर से हंसा क्योंकि उसने दुनिया भर के व्यापारियों के बारे में सुना था लेकिन कभी ऐसे व्यापारी के बारे में नहीं सुना था जो कल्पनाएं बेचता हो । 
         नहीं ! मुझे  नहीं चाहिए, तुम किसी और को बेवकूफ बनाओ जाकर । इतना कहकर शुयश वहां से चलने लगा लेकिन तभी भिक्षुक ने कहा कि मैं सिर्फ उसको ही कल्पनाएं बेचता हूं जिसको इनकी जरूरत होती है । जिसको जरूरत नहीं उसके पास तो मैं आज तक नहीं गया । तो फिर तुम गलत पते पर आ गए क्योंकि मुझे जरूरत नहीं तुम्हारी इन कल्पनाओं की । कहकर सुयश ने पल्ला झाड़ने की कोशिश की ।

तुमको जरूरत है बेटा तभी तो तुम्हारे पास भेजा है मुझको ।
अब लड़का कुछ सोच में पड़ गया कि भेजा है ! किसने भेजा होगा ? लेकिन अपना जी छुड़ाने के लिए उसने चुप रहना ही सही समझा ।

      लेकिन वो भिक्षुक उसके पीछे पड़ा ही रहा की तुमको चाहिए तो ले लो अगर में एक बार चला गया तो दोबारा नहीं आऊंगा ।  सुयश का मन पहले ही भूख से परेशान था तो बात टालने के लिए कहा कि ठीक है लिए मुझे दीजिए आपकी कल्पनाएं ।
        बेटा कल्पनाएं मेरी नहीं तुम्हारी ही हैं !  उनको मेरी कहकर उनका दिल न दुखाओ । सुयश  अब परेशान हो चला था कि अजीब आदमी है ! कहता है कि कल्पनाओं का दिल मत दुखाओ क्या कल्पना भी दुखी हो सकती है ? 
फिर सिर को झटका देकर बोला ठीक है बाबा जो भी देना है दीजिए क्योंकि मेरी भूख से हालत बुरी हो चली है आपकी ये बातें मेरी समझ नहीं आ रही हैं । अब आप अगर देना चाहते हैं तो दीजिए वरना अपना रास्ता नपिए ।

भिक्षुक शांत स्वर में बोला कि ठीक है लेकिन बदले में क्या दोगे मुझे तुम ? सुयश अब समझ चुका था कि ये आदमी कोई ठग है जो उसको ठगने आया है । उसने कहा कि मेरे पास तो कुछ है ही नहीं जो तुमको दूं । इसका मतलब हमारा और तुम्हारा सौदा अब संभव नहीं इसलिए अब अपने रास्ते जाओ ।
भिक्षुक अब परेशान था कि वो सुयश की कल्पनाएं कैसे बेचेगा उसको । और अगर बिना कुछ बेचे गया वापस तो क्या मुंह दिखाएगा वो अपने मालिक को । इसलिए अब वो बेचैन हो चला था ।
        इस दौरान भिक्षुक को उस लड़के से अपनत्व सा लगने लगा जैसे सुयश उसकी ही देह का कोई भाग या अंग हो । लेकिन सुयश की तरफ से कोई आत्मिकता नहीं थी और यही बात भिक्षुक को बुरी लग रही थी । आज तक उसने जिस किसी को भी कल्पना बेची थी वो सब कितने सभ्य और शालीन थे । उसका कितना सत्कार किया था उन सभी लोगों ने । और एक ये है हठी और नादान लड़का जो उसको ही ठग समझ रहा है ।
सुयश ने भिक्षुक के मौन को उसकी हार समझा और चल दिया । 
        ठीक है जाओ लेकिन अगर तुम्हारे मन के अनुसार मुझे तुम ठग समझ रहे हो तो ये तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है । सुयश ठिठका और पलट कर पूछा कि तुमको कैसे पता कि मैं तुमको ठग समझ रहा हूं । इसपर बात को घुमाते हुए भिक्षुक ने कहा कि अक्सर लोग पहले मुझे ठग ही समझते हैं । भिक्षुक जानता था कि वो झूठ बोल रहा है लेकिन सुयश को रोकने का और अपना भेद छुपाने का यही एक तरीका था ।

        अब सुयश हार मान चुका था उसने अपनी बात को स्पष्ट किया कि देखिए आप कल्पनाएं मुफ्त में देंगे नहीं, और मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है । इसलिए ये सौदा संभव नहीं तो आप ही बताएं कि क्या किया जा सकता है ?
भिक्षुक बोला तुम एक धनी लड़के हो फिर भी कहते हो कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है मुझे देने के लिए, इस तरह से तुम भी तो झूठे हुए न !
   
        सुयश ने एक बार सोचा कि कहीं इसने चढ़ा तो नहीं रखी ?  लेकिन भिक्षुक ने जैसे ही कहा "नहीं बेटा मैंने बिल्कुल नशा नहीं किया" सुयश चुप हो गया । अब वो सच में उस भिक्षुक से प्रभावित था क्योंकि बार - बार उसके मन की बात जान लेने वाला कौन हो सकता है ये ?
उसने कहा कि बताइए क्या दे सकता हूं मैं आपको लेकिन सोच समझ कर मांगिएगा जो मैं दे सकूं । सुयश सोच चुका था कि वो कुछ भी मांगे उसको नहीं मिलने वाला क्योंकि जब है ही नहीं तो दूंगा क्या ।
ठीक है अपनी कमीज़ मुझे दे दो !
अब सुयश और विस्मित था कि ये क्या ? इसको मेरी कमीज़ चाहिए ? ये तो फटी और मैली है और इसको आएगी भी नहीं । लगता है इसने मेरी कमीज़ में रखे तीन रुपए देख लिए हैं । लेकिन फिर उसको एक झटका लगा जब उस भिक्षुक ने कहा कि बेटा अपनी जेब में रखे रुपए निकाल लो मुझे रुपए नहीं चाहिए । और एक वादा करो की कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाओगे । बस यही कीमत होगी तुम्हारी कल्पनाओं की ।

       सुयश ने उसको अपनी कमीज़ दे दी । और वादा किया कि आज के बाद चाहे भूख से प्राण ही निकल जाएं लेकिन वो भीख नहीं मांगेगा । कमीज़ लेकर भिक्षुक ये बोलकर जाने लगा बेटा तुम बहुत नेक लड़के हो ।

        लेकिन सुयश अब बेचैन था कि ये तो कमीज़ लेकर जा रहा है और मेरी कल्पनाओं का क्या ?  उसने जोर देकर कहा कि बाबा आपकी कल्पनाएं कहा हैं जो आप मुझे देने वाले थे ? भिक्षुक पलटा और बोला बेटा वो तो मेरी थी ही नहीं वो तो हमेशा से तुम्हारी ही थीं ।

     भिक्षुक दूर जा चुका था सुयश गुस्से से बोलने चला तो आवाज ही नहीं निकली उसके मुख से, फिर जब पूरी ताकत लगा कर चिल्लाने कि कोशिश की तो उसकी नींद टूट गई ।
वो उठ कर बैठ गया धूप अब भी उसके ऊपर पड़ रही थी, लेकिन अब वो गर्म नहीं लग रही थी ।
उसकी भूख अब खत्म हो चुकी थी । तीन रुपए उसकी मुट्ठी में अभी भी बंद थे । आस - पास कोई नहीं था लेकिन उसकी कमीज़ उसके पास नहीं थी । उसको उस भिक्षुक का चेहरा अब भी याद था ।

      सुयश अपनी झोपड़ी की ओर भागा और अपना संदूक खोलकर एक पुरानी अधगली तस्वीर निकली जो हूबहू उस भिक्षुक जैसी सूरत वाली थी ।
सुयश उस भिक्षुक को बार - बार पुकारता रहा लेकिन कोई फायदा नहीं अब वहां कोई नहीं था बस सुयश और उसकी टूटी हुई उम्मीद ।

       आज उस बात को कई वर्ष बीत गए हैं । सुयश आज पतंगों की छोटी सी दुकान चलाता है । और अपने क्षेत्र का सबसे चतुर पतंगबाज़ है । क्योंकि उसको बचपन से ही पतंग उड़ाने का बहुत शौक था । वो बचपन में जब भी पिताजी से पतंगबाजी में हारता था तो एक ही बात कहता कि पिताजी मैं जब बड़ा हो जाऊंगा तो जरूर हराऊंगा आपको और उसके पिताजी कहते की बेटा मुझे बस उसी दिन का इंतजार है जब तुम मुझे हराओगे । लेकिन पिताजी की मौत के साथ ही वो बात खत्म हो गई थी । आज उसको पतंग के खेल में हारे हुए उतने ही साल हो गए हैं जितने साल पहले वो सपना आया था ।

       आज फिर सुयश सुबह - सुबह दुकान खोलकर रोज की तरह उसी तस्वीर के आगे हाथ जोड़े खड़ा था । तभी पीछे से आहट पाकर पलटा । सुयश जैसे उसके आने के इंतजार में ही था, सीधे उसके चरणों में गिर गया !
भिक्षुक ने उसको उठाया । मुस्कुरा कर बोला कि तुमको तुम्हारी कल्पनाएं मिलीं या नहीं ? 
सुयश भीगी आंखे अपनी आस्तीन में पोछते हुए बोला हां मुझे मिल गईं थीं । और मैंने आपका बहुत इंतजार किया था । आपको धन्यवाद देना चाहता था कि अपने मेरी कल्पनाएं मुझे वापस करने के लिए ।
भिक्षुक ने व्यंग वाले लहजे में बस यही पूछा की क्या वो सच में तुम्हारी ही थीं ? 
सुयश इसके आगे कुछ नहीं कह सका ।।

अमित हिंदुस्तानी, लखीमपुर, उत्तरप्रदेश

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