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पुस्तक समीक्षा
कोरोना काल...... उस दौर को मानने को दिल करता है.. जब महल उदास और गलियाँ सूनी थी..... नागरिकों के जिस्म घरों में कैद... और मन में आशंकाओं के साथ डर के घने बादलों ने अपना डेरा जमाया हुआ था....। ये वक्त लॉक डाउन का सख्त दौर वाला था....। उसी गुजरे वक्त की घटनाओं... की साक्षी बनी युवा पत्रकार और लेखक आकाश माथुर की कलम.... लिखा गया एक दस्तावेज... जो आने वाले समय पर... इतिहास की तरह पढ़ा जाएगा... हालांकि यह जिस दौर में लिखा जा रहा था... उस दौर का शोध कार्य भी रहा... जो गाँव से लेकर प्रदेश... और देश से लेकर विदेश तक की कुछ घटनाओं... का कुल हासिल भी है...। जिस काल खंड में... मानव मन खंड खंड था... तब प्रकृति की अखंडता की निर्मलता का समावेश भी आपको इसमें मिलेगा....।
कुल सोलह सर्ग में सिमटी अलग अलग घटनाएं... जब लिपिबद्ध हुईं तब पुस्तक "कोरोना काल" की शक्ल ले पाई....। पहले सर्ग में कोरोना का आगमन... और सत्ता की लोलुपता में तार तार होता लोकतंत्र नजर आता है.... तो हत्या के शीर्षक में शामिल घटनाएं मानवता का कलेजा थर्राने के लिए काफी हैं....। तीसरे सर्ग में तो... सत्ता की निष्क्रियता को ताली, थाली, शंख, घंटाल बजाकर.... बिजली बंद कर.. दिए जलाकर छिपाने की सताधीश की मंशा को मानों उजागर ही कर दिया हो....। मजदूरों के पलायन करते छाले वाले पाँव... डामर की सड़क पर चिलचिलाती धूप में... अग्निपथ की तरह पार करते हैं... यहाँ लेखक उनके रिसते दर्द को... उससे निकलती कराह को भलीभाँति लिपिबद्ध कर देता है....। मानवीयता की मिसाल भी मौजूद मिलती हैं...... जो ठंडक देती है दिल को....। पढ़े लिखों द्वारा... अनपढ़ों को बाँटा गया रोग... और उससे उपजी भूख की बेबसी... उस वक्त का वह काला अध्याय है... जो एक बार के पढ़ने से ही ह्रदय को व्यथित कर जाता है..। देगची में माँ का रात भर पत्थर उबालाना.. और बच्चों का भ्रम में सो जाना कि माँ उनके लिए भोजन तैयार कर रही है... यह दर्दनाक मंजर भारत की धरती के कई हिस्सों पर एक साथ घटा... सरकार की बद इंतजामी सामने आई.... और भ्रष्टाचार भी... लेकिन वो (सरकार) हैं कि.. मानने को तैयार नही...। नेताओं को लगा छपास का रोग... जब अधिकारियों को संक्रमित कर जाता है... तब आम आदमी की मरण... और उनका (अधिकारियों का) अहम चरम पर होता है...। पत्रकार की सक्रियता दर्शाने के साथ अपने ही साथियों की प्रशासनिक चाटुकारिता के दर्शन कराने में कलम नहीं झिझकी है... ये एक बड़ी विशेषता है...। प्रकृति पर मानव के किये गए जुल्मों सितम की पोल भी इसी काल में खुलती है.... जब लेखक अपने आंचलिक पत्रकार साथी योगेश राजपूत से माँ नर्मदा की साफ नजर आती रेतीली तलहटी के दर्शन फोटो के माध्यम से करते हैं...। वैश्या नामक सर्ग में खालिस पुलिसिया अंदाज और खाकी के नीचे धड़कते इंसानी दिल दोनो का अहसास कराया है। तो अगले पड़ाव पर... उस वर्ग को दिखाया है जिसके पेट में तो आग है लेकिन चूल्हा ठंडा पड़ा है.. तो दूसरे वर्ग द्वारा किया गया शोषण का चित्रण.. महाकवि निराला की कविता कुकरमुत्ता के माध्यम से किया है...। मौत के साये में जीने वाले अंदाज में.. घरों में कैद जिंदगी में... मृत्यु दर में आश्चर्यजनक कमी आ जाना.... अनकहे रूप से हमारी खान पान, आहार विहार और स्वास्थ्य सेवाओं के व्यवसाय पर सवालिया निशान टांग जाता है...। वहीं उलकापिंड के पृथ्वी के टकराने और सिने स्टार इरफ़ान के अलविदा कह जाने की घटनाओं से जीवन जीने की शैली की भी व्याख्या कर दी जाती है...। देश और जिले की पहली मौत का जिक्र.... कोरोना से लड़ाई के सरकारी इंतजाम के दावों की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है...। छुअन का अहसास... अपनों के बीच की मौत की आवश्यकता को फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ परिभाषित करता घटनाक्रम है...। जनता की गाढी कमाई के 517 करोड़ हवाई यात्राओं में उड़ाने वाली सरकार से मजदूरों के लिए 433 करोड़ नहीं खर्च कर पाने की सत्ता की नीयत को भी रेखांकित करता है... रिवर्स माईग्रेशन..। हर स्टेशन पर ग्रीन सिगनल और निर्धारित पटरी पर दौड़ लगाने वाली रेल के श्रमिक ट्रेन के रूप मे कम ट्राफिक के दौर में रास्ता भटक जाना.. रेल मंत्रालय की मंशा और मजदूरों की व्यथा की करुणामयी कथा है। कुल मिलाकर सम सामयिक इतिहास की पुस्तक का जब भी जिक्र होगा तो आकाश माथुर की किताब "कोरोना काल" को जरूर याद किया जाएगा....। जिसे शिवना प्रकाशन ने प्रकाशित कर मौजूदा दौर के पुस्तक प्रकाशन के इतिहास में एक मील का पत्थर गाड़ दिया है। मर्म स्पर्शी , मन को अंदर तक झकझोरती घटनाओं का लेख है... कोरोना काल... जो समय की शिला पर... शब्दों की छेनी से... वाक्यों के हथौड़े बनाकर उकेरा गया है....। बधाई... लेखक और प्रकाशक दोनों को... ह्रदय की गहराइयों से...।
शैलेश तिवारी,


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