लेखिका
प्रशांत कब से सुन रहा था अम्मा के खांसने व नीता के बडबडाने की आवाज ,,, जब रहा नहीं गया तो झट से उठकर मां के कमरे की तरफ लपका,,,,,
अम्मा सिरहाने में सर रखकर पूरे जोर से खो खो कर खांसती रही थी,,,,
बेटे को आया देख अम्मा की आंखों में उम्मीदों की चमक जाग उठी।
'क्या मां तुम्हें नींद नहीं आती तो हमें तो सोने दो, कितनी बार कहा है दरवाजा बंद करके खांसो ,दिन भर काम में खटने के बाद तुम रात को सोने भी नहीं देती '
अम्मा की आँखें डबडबा आईं,,,,,
सोचा बेटा हाल चाल पूछने आया है कमरे में ,,,,
पर वह पर वहां दो बातें सुना कर धड़ाम से दरवाजा बंद करते हुए उसके मुंह पर भी ताला लगा गया, ,,
अम्मा मुंह पर हाथ रखकर खांसने लगी,,,
कितने दिन हो गए यूं ही उसे बंद कमरे में खांसते हुए,,, प्रशांत आज कमरे में आया वह भी,,,,,। खाँसी के साथ ही यादों के ठसके आना शुरू हो गए।
कितनी मन्नतो के बाद तीन बेटियों के बाद प्रशांत आया था उनकी जिंदगी में
कितने खुश थे वह सब,,,
एक बार प्रशांत की तबीयत खराब थी तो उसके बाबूजी सारे मंदिर नंगे पांव हो आए
अम्मा का रो रो कर बुरा हाल हो गया था काफी इलाज के बाद वह ठीक हो पाया था ।
अम्मा बाबूजी और बहनों की आंख का तारा था प्रशांत ....। बाबूजी सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे । प्रशांत ने अच्छा खासा बचपन जिया और आधुनिक जीवन जीते हुएउच्च शिक्षा भी प्राप्त की। उस दौर में अम्मा के ठाठ भी कम न थे...।
बेटियों का अच्छे घर में रिश्ता हो गया
प्रशांत भी एक सुलझा बेटा साबित हो रहा था
अम्मा खुश थी अपने जीवन में,,,,
जब बाबूजी के साथ अम्मा घूमने जाती तो खुद को रानी सा महसूस करती ,ऊपर से प्रशांत जैसा बेटा पाकर पूरे मोहल्ले में शान से घूमती थी अम्मा,,,
पर वक्त को कुछ और ही मंजूर था बाबूजी को लकवा मार गया। वह बिस्तर पकड़ कर रह गए । अम्मा को प्रशांत की शादी की चिंता सताने लगी । प्रशांत की शिक्षा पूरी हो गई थी वह नौकरी के लिए तैयारी करने लगा।
बाबूजी को अचानक बिस्तर पकड़ते देख कुछ समझ ना आया।
एक दिन बाबू जी के दोस्त उन का हाल जानने घर आए तो अम्मा ने प्रशांत की शादी की चिंता बताई उस पर वह बोले अगर आपको ठीक लगे तो मेरी बेटी और प्रशांत का रिश्ता कर दिया जाए ।
अम्मा को जैसे मन मांगी मुराद मिल गई,,,,,
काफी खुश थी अम्मा ...जानती थी प्यारी सी बिटिया नीता को ।
उन्होंने प्रशांत से राय लेकर रिश्ते के लिए हां कर दी। जल्दी बाजी में दोनों का रिश्ता पक्का हो गया।
बाबूजी की हालत दिन ब दिन खराब होती गई । अम्मा प्रशांत की शादी कर देना चाहती थी पर प्रशांत बाबू जी के ठीक होने पर शादी करने को बोलता एक रात बाबू जी ऐसे सोए की उठे ही नहीं,,,,।
कल तक खुद को रानी मानने वाली अम्मा टूट सी गई गुमसुम रहने लगी।
,,,,, बाबूजी की जगह प्रशांत को नौकरी मिल गई ।
अम्मा को कुछ याद नहीं रहने लगा वह सब भूलने लगी ,,, धीरे-धीरे ,,,,।
एक दिन नीता के बाबू जी घर आए। वह नीता व प्रशांत की शादी के बारे में बात करने लगे शादी का दिन तय किया गया ,,,,।
प्रशांत ने बहनों संग मिलकर सारी तैयारी कर ली शादी का दिन आ गया ,,,।
बाबू जी की तस्वीर को निहारते हुए आंखों में आंसू लिए अतीत में अम्मा ,,,,।
'देख लेना प्रशांत की शादी में सब मुझे दूल्हे का बड़ा भाई समझेंगे उस दिन में खूब नाचूंगा मेरे बेटे की शादी है' आंखें भर आई अम्मा की,,।
'अम्मा सब ढूंढ रहे हैं और तुम यहां क्या कर रही हो'।
पहली बार प्रशांत का ऐसा उखड़ा स्वर सुन अम्मा सिहर उठी,,,।
और बाबू जी की तस्वीर की और देख बाहर आ गई ,,,।
शादी संपन्न हुई हफ्ते भर बाद बेटियां भी अपने अपने घरों को चली गई और संग रह गई अम्मा की भूलने की बीमारी,,,,।
प्रशांत का मां के प्रति रवैया बिगड़ता गया जो अम्मा को भीतर ही भीतर कमजोर करता गया
अम्मा अतीत में फिर से चली गई,,,,,।
'एक दिन अम्मा की तबीयत खराब थी नीता कहीं बाहर चली गई किसी को अम्मा के बारे में कुछ पता नहीं ,,,।
अम्मा दिन भर बुखार से तपती रही भूखी प्यासी,,,,
शाम को नीता जब घर आई वह अपने कमरे में चली गई अम्मा को बुखार के साथ-साथ खांसी भी होने लगी।
शाम को प्रशांत दफ्तर से घर आया तो नीता ने अम्मा के खांसने पर सर दर्द होने की बात बताई ,,,,,।
प्रशांत दवा लेने बाहर गया वह नीता के लिए सर दर्द की दवा ले आया ,,, पर अम्मा भीतर ही भीतर बुखार से तड़पती रही ,,,,।
रात को प्रशांत कमरे में आया और बोला 'नीता के सर में दर्द हो रहा है आप खाना बना लो '
अम्मा बुखार से ज्यादा हृदय के दर्द से तड़प उठी ,,,
जैसे तैसे अम्मा बिस्तर से उठी किचन तक गई सब्जी काट कर सब्जी छौक कर कमरे में वापस आ गई पर गैस बंद करना भूल गई
पूरे घर में सब्जी की दुर्गंध व धुआं फैल गया,,,।
नीता पैर पटकते हुए आई और बोली 'एक दिन तुम्हारी अम्मा को खाना बनाने में परेशानी हो रही है मेरी तबीयत खराब है और यह देखो'।
बाहर जोर से आवाज आने पर अम्मा किचन की तरफ भागी सब्जी जल चुकी थी उससे भी ज्यादा अम्मा के अरमान ,,,, बेटे बहू की बातें सुन कर....।
क्या यह वही प्रशांत था अम्मा चेतन में लौटी खो खो खो ,,,, अम्मा की खांसी बढ़ने लगी। पास में रखें पानी के जग की ओर लपकी। जग खाली था अम्मा हिम्मत करके बिस्तर से उठी जैसे ही किचन की ओर बढ़ी अम्मा के कानों में नीता के स्वर पड़े ,,, अम्मा ठिठक गई।
'देखो प्रशांत बहुत हुआ तुम्हारी अम्मा का यूं रोज रोज भूल जाना हमें किसी दिन बड़ी मुसीबत में ना डाल दे ऊपर से है खांसने की बीमारी जीना हराम कर दिया है। तुम अम्मा को छोड़ आओ किसी वृद्धा आश्रम,,,।
'ठीक है मैं कल पता करता हूं'।
प्रशांत की बिना तर्क वाली आबाज सुनाई दी।
धक से रह गई अम्मा भूल गई वह एक पल में कि वह कौन है,,...?
मात पिता और दादा दादी नाना नानी नाम हैं
इन दो पंक्तियों में उन बुजुर्गों का दर्द छिपा है जो भरे पूरे परिवार में होने के बाद भी अकेलापन महसूस कर रहे हैं या फिर वृद्धाश्रम में अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। जिनकी उंगली पकड़कर चलना सीखा और जिनके कंधों पर चढ़कर दुनिया देखी। उन्हीं को दोयम दर्जे की जिंदगी जीने पर मजबूर उनकी अपनी ही संतान कर देती है। यही मर्म है बसंती सामंत की लिखी कहानी... बदलते रिश्ते का.....। कहानी की घटना प्रधान लिखा जाकर सामान्य बोलचाल की भाषा में लिखा गया है। हाँ कहानी में फ्लेश बेक का प्रयोग भी किया गया है। जिससे पाठक जान पाता है कि कितनी मुश्किलों और मन्नतों के बाद प्रशांत का जन्म हुआ और उसको बड़ा करने में अम्मा बाबूजी ने अपनी कितनी इच्छाओं को दफन किया। लेकिन प्रशांत विवाह के बाद अपनी पत्नी की शांति के लिए अम्मा को अशांत कर देता है। हालांकि यह बहुत प्रचलित विषय है जिस पर कथानक बुना गया है लेकिन सहजता और सरलता से लिखा जाने की वजह से शायद पसंद किया जाए। फिर भी भारत के आधार परिवारों पर आये संकट से चेता जरूर रहा है। आज का युवा भारत आने वाले कल का वृद्ध भारत भी होगा तब बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम कम ही पड़ जाएं। इस बिंदु पर भी कथानक सतर्क करता है। कहानी को वर्तमान और अतीत से जोड़कर भविष्य के खतरों से आगाह करना लेखन की विशेषता है। बहुत बहुत बधाई... बसंती सामंत जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक
बदलते रिश्ते
'जब देखो खो खो, सोने नहीं देगी तुम्हारी अम्मा' नीता बड़बड़ाती हुई करवटें बदलने लगी,,,,,,प्रशांत कब से सुन रहा था अम्मा के खांसने व नीता के बडबडाने की आवाज ,,, जब रहा नहीं गया तो झट से उठकर मां के कमरे की तरफ लपका,,,,,
अम्मा सिरहाने में सर रखकर पूरे जोर से खो खो कर खांसती रही थी,,,,
बेटे को आया देख अम्मा की आंखों में उम्मीदों की चमक जाग उठी।
'क्या मां तुम्हें नींद नहीं आती तो हमें तो सोने दो, कितनी बार कहा है दरवाजा बंद करके खांसो ,दिन भर काम में खटने के बाद तुम रात को सोने भी नहीं देती '
अम्मा की आँखें डबडबा आईं,,,,,
सोचा बेटा हाल चाल पूछने आया है कमरे में ,,,,
पर वह पर वहां दो बातें सुना कर धड़ाम से दरवाजा बंद करते हुए उसके मुंह पर भी ताला लगा गया, ,,
अम्मा मुंह पर हाथ रखकर खांसने लगी,,,
कितने दिन हो गए यूं ही उसे बंद कमरे में खांसते हुए,,, प्रशांत आज कमरे में आया वह भी,,,,,। खाँसी के साथ ही यादों के ठसके आना शुरू हो गए।
कितनी मन्नतो के बाद तीन बेटियों के बाद प्रशांत आया था उनकी जिंदगी में
कितने खुश थे वह सब,,,
एक बार प्रशांत की तबीयत खराब थी तो उसके बाबूजी सारे मंदिर नंगे पांव हो आए
अम्मा का रो रो कर बुरा हाल हो गया था काफी इलाज के बाद वह ठीक हो पाया था ।
अम्मा बाबूजी और बहनों की आंख का तारा था प्रशांत ....। बाबूजी सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे । प्रशांत ने अच्छा खासा बचपन जिया और आधुनिक जीवन जीते हुएउच्च शिक्षा भी प्राप्त की। उस दौर में अम्मा के ठाठ भी कम न थे...।
बेटियों का अच्छे घर में रिश्ता हो गया
प्रशांत भी एक सुलझा बेटा साबित हो रहा था
अम्मा खुश थी अपने जीवन में,,,,
जब बाबूजी के साथ अम्मा घूमने जाती तो खुद को रानी सा महसूस करती ,ऊपर से प्रशांत जैसा बेटा पाकर पूरे मोहल्ले में शान से घूमती थी अम्मा,,,
पर वक्त को कुछ और ही मंजूर था बाबूजी को लकवा मार गया। वह बिस्तर पकड़ कर रह गए । अम्मा को प्रशांत की शादी की चिंता सताने लगी । प्रशांत की शिक्षा पूरी हो गई थी वह नौकरी के लिए तैयारी करने लगा।
बाबूजी को अचानक बिस्तर पकड़ते देख कुछ समझ ना आया।
एक दिन बाबू जी के दोस्त उन का हाल जानने घर आए तो अम्मा ने प्रशांत की शादी की चिंता बताई उस पर वह बोले अगर आपको ठीक लगे तो मेरी बेटी और प्रशांत का रिश्ता कर दिया जाए ।
अम्मा को जैसे मन मांगी मुराद मिल गई,,,,,
काफी खुश थी अम्मा ...जानती थी प्यारी सी बिटिया नीता को ।
उन्होंने प्रशांत से राय लेकर रिश्ते के लिए हां कर दी। जल्दी बाजी में दोनों का रिश्ता पक्का हो गया।
बाबूजी की हालत दिन ब दिन खराब होती गई । अम्मा प्रशांत की शादी कर देना चाहती थी पर प्रशांत बाबू जी के ठीक होने पर शादी करने को बोलता एक रात बाबू जी ऐसे सोए की उठे ही नहीं,,,,।
कल तक खुद को रानी मानने वाली अम्मा टूट सी गई गुमसुम रहने लगी।
,,,,, बाबूजी की जगह प्रशांत को नौकरी मिल गई ।
अम्मा को कुछ याद नहीं रहने लगा वह सब भूलने लगी ,,, धीरे-धीरे ,,,,।
एक दिन नीता के बाबू जी घर आए। वह नीता व प्रशांत की शादी के बारे में बात करने लगे शादी का दिन तय किया गया ,,,,।
प्रशांत ने बहनों संग मिलकर सारी तैयारी कर ली शादी का दिन आ गया ,,,।
बाबू जी की तस्वीर को निहारते हुए आंखों में आंसू लिए अतीत में अम्मा ,,,,।
'देख लेना प्रशांत की शादी में सब मुझे दूल्हे का बड़ा भाई समझेंगे उस दिन में खूब नाचूंगा मेरे बेटे की शादी है' आंखें भर आई अम्मा की,,।
'अम्मा सब ढूंढ रहे हैं और तुम यहां क्या कर रही हो'।
पहली बार प्रशांत का ऐसा उखड़ा स्वर सुन अम्मा सिहर उठी,,,।
और बाबू जी की तस्वीर की और देख बाहर आ गई ,,,।
शादी संपन्न हुई हफ्ते भर बाद बेटियां भी अपने अपने घरों को चली गई और संग रह गई अम्मा की भूलने की बीमारी,,,,।
प्रशांत का मां के प्रति रवैया बिगड़ता गया जो अम्मा को भीतर ही भीतर कमजोर करता गया
अम्मा अतीत में फिर से चली गई,,,,,।
'एक दिन अम्मा की तबीयत खराब थी नीता कहीं बाहर चली गई किसी को अम्मा के बारे में कुछ पता नहीं ,,,।
अम्मा दिन भर बुखार से तपती रही भूखी प्यासी,,,,
शाम को नीता जब घर आई वह अपने कमरे में चली गई अम्मा को बुखार के साथ-साथ खांसी भी होने लगी।
शाम को प्रशांत दफ्तर से घर आया तो नीता ने अम्मा के खांसने पर सर दर्द होने की बात बताई ,,,,,।
प्रशांत दवा लेने बाहर गया वह नीता के लिए सर दर्द की दवा ले आया ,,, पर अम्मा भीतर ही भीतर बुखार से तड़पती रही ,,,,।
रात को प्रशांत कमरे में आया और बोला 'नीता के सर में दर्द हो रहा है आप खाना बना लो '
अम्मा बुखार से ज्यादा हृदय के दर्द से तड़प उठी ,,,
जैसे तैसे अम्मा बिस्तर से उठी किचन तक गई सब्जी काट कर सब्जी छौक कर कमरे में वापस आ गई पर गैस बंद करना भूल गई
पूरे घर में सब्जी की दुर्गंध व धुआं फैल गया,,,।
नीता पैर पटकते हुए आई और बोली 'एक दिन तुम्हारी अम्मा को खाना बनाने में परेशानी हो रही है मेरी तबीयत खराब है और यह देखो'।
बाहर जोर से आवाज आने पर अम्मा किचन की तरफ भागी सब्जी जल चुकी थी उससे भी ज्यादा अम्मा के अरमान ,,,, बेटे बहू की बातें सुन कर....।
क्या यह वही प्रशांत था अम्मा चेतन में लौटी खो खो खो ,,,, अम्मा की खांसी बढ़ने लगी। पास में रखें पानी के जग की ओर लपकी। जग खाली था अम्मा हिम्मत करके बिस्तर से उठी जैसे ही किचन की ओर बढ़ी अम्मा के कानों में नीता के स्वर पड़े ,,, अम्मा ठिठक गई।
'देखो प्रशांत बहुत हुआ तुम्हारी अम्मा का यूं रोज रोज भूल जाना हमें किसी दिन बड़ी मुसीबत में ना डाल दे ऊपर से है खांसने की बीमारी जीना हराम कर दिया है। तुम अम्मा को छोड़ आओ किसी वृद्धा आश्रम,,,।
'ठीक है मैं कल पता करता हूं'।
प्रशांत की बिना तर्क वाली आबाज सुनाई दी।
धक से रह गई अम्मा भूल गई वह एक पल में कि वह कौन है,,...?
बसंती सामंत, खटीमा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड
-------------------समीक्षा
हैं अकेले आज क्यूँ, और क्यों हैरान हैंमात पिता और दादा दादी नाना नानी नाम हैं
इन दो पंक्तियों में उन बुजुर्गों का दर्द छिपा है जो भरे पूरे परिवार में होने के बाद भी अकेलापन महसूस कर रहे हैं या फिर वृद्धाश्रम में अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। जिनकी उंगली पकड़कर चलना सीखा और जिनके कंधों पर चढ़कर दुनिया देखी। उन्हीं को दोयम दर्जे की जिंदगी जीने पर मजबूर उनकी अपनी ही संतान कर देती है। यही मर्म है बसंती सामंत की लिखी कहानी... बदलते रिश्ते का.....। कहानी की घटना प्रधान लिखा जाकर सामान्य बोलचाल की भाषा में लिखा गया है। हाँ कहानी में फ्लेश बेक का प्रयोग भी किया गया है। जिससे पाठक जान पाता है कि कितनी मुश्किलों और मन्नतों के बाद प्रशांत का जन्म हुआ और उसको बड़ा करने में अम्मा बाबूजी ने अपनी कितनी इच्छाओं को दफन किया। लेकिन प्रशांत विवाह के बाद अपनी पत्नी की शांति के लिए अम्मा को अशांत कर देता है। हालांकि यह बहुत प्रचलित विषय है जिस पर कथानक बुना गया है लेकिन सहजता और सरलता से लिखा जाने की वजह से शायद पसंद किया जाए। फिर भी भारत के आधार परिवारों पर आये संकट से चेता जरूर रहा है। आज का युवा भारत आने वाले कल का वृद्ध भारत भी होगा तब बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम कम ही पड़ जाएं। इस बिंदु पर भी कथानक सतर्क करता है। कहानी को वर्तमान और अतीत से जोड़कर भविष्य के खतरों से आगाह करना लेखन की विशेषता है। बहुत बहुत बधाई... बसंती सामंत जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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