लेखिका 

हे ईश्वर

हे ईश्वर, तू सुन पुकार
धरा पर हो रहा यह कैसा संहार,
नहीं बची मानवता, न बचेगा इंसान
क्यों बनने लगा यह जहां शमशान।

रोक ले तू अब भी इसको
थाम ले समय की यह पतवार,
माना कि हम इंसान है नादान
किया हमने ही है प्रकृति से खिलवाड़।

पर अब तो तू रहम भी कर दें
है तू क्षमावान, दयालु और दीनदयाल,
दुख हर दे सबके, खुशियां भर दें
शरण में आए आज तेरे लाल गोपाल।

आंख न फेर और न मोड़ मुंह इस कदर
सिसक रही है धरती, चारों ओर है हाहाकार,
सुना है मैंने, दिल बड़ा है तेरा
कर दें माफ, जगत का कर उद्धार
हे ईश्वर तू सुन पुकार।

नीलू गुप्ता, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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                  परिचय


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