समर शेष है... देश और भविष्य निर्माण की
मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के तहत ही... हम आज भी नौकरी की आकांक्षा रखने वाला... स्नातक ही तो तैयार कर पा रहे हैं....। हम कहाँ बेहतर शोधार्थी निकाल पा रहे हैं...। इसका कारण है कि हमारे हुक्मरानों ने कभी सोचा ही नहीं कि.... रिसर्च एंड डेवलप्मेंट के लिए देश के बजट में कुछ ज्यादा प्रावधान किये जाएं.... जो दुनियाँ के अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम हैं....। आप सोच सकते हैं कि शिक्षक दिवस के मौके पर... शिक्षा व्यवस्था का क्या लेना देना...? तो जान लें कि जिस तरह....साहित्य समाज का दर्पण होता है....वैसे ही शिक्षक भी देश के भविष्य का आईना होता है......। सड़ी, गली, लाचार, पंगु शिक्षा व्यवस्था में वह शिक्षक कैसा होगा... जिसके कंधों पर देश का भविष्य निर्माण करने की अहम जिम्मेदारी है.....। अब आप अंदाज लगाईयेगा कि....देश का भविष्य कैसा होगा.....?
पहले भी गुरुकुल राज्य आश्रित रहा करते थे... लेकिन अब तो शिक्षा को भी पूंजीपतियों के हाथो में गिरवी रखा जा रहा है.... देश भर में साल दर साल बंद होते सरकारी स्कूल... और बढ़ती निजी विद्यालयों की तादात... इस बात की गवाही खुद दे रही है....। जिस सिस्टम ने सरकार को यह अनुशंसा की... कि शिक्षको के खाली पदों को भरा जाए..... लेकिन सरकार के कानों में इस अनुशंसा की भनक तक नहीं पड़ती है.... क्योंकि उस को अच्छी तरह मालूम है कि... इन पदों की पूर्ति करते ही सरकार को अपनी सुख सुविधाओं में कटोती करनी होगी.....। रोजगार के लिए तरसते युवाओं के लिए......यह खबर आश्चर्यजनक होगी !...सरकारी आंकड़े बताते हैं कि....देश के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में... शिक्षक के दस लाख पद रिक्त हैं....! उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बात करें तो.... केंद्रीय विश्व विद्यालयों लगभग छः हजार और राज्य के विश्व विद्यालयों में लगभग 63 हजार पदों की पूर्ति की जाना है.... इंजीनियरिंग कॉलेजों में सवा लाख पद शिक्षकों की राह देख रहे हैं.... और तो और आई आई टी और आई आई एम में भी चालीस प्रतिशत से ज्यादा पोस्ट खाली पड़ी हैं....। ऐसी स्थिति में अंदाज लगाएं कि देश का भविष्य क्या होगा...? जिस शिक्षक के सम्मान में आज सत्ताधीश कसीदे गढ़ रहे होंगे...ऐसे समय में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लगभग साढ़े छः लाख अस्थाई शिक्षक हैं..... जिन्हें बीते पांच महीनों से वेतन नही मिला होगा......। कैसे वह अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे होंगे... जरा कल्पना करके देखिये....। यहाँ इस बात का जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है कि... बिना दूर दृष्टि के घोषित किए गए लॉक डाउन ने... गैर सरकारी स्कूलों के शिक्षक की रोजी रोटी पर संकट के बादल गहरा दिए हैं....। सरकारी स्कूल के शिक्षक भी केवल... भविष्य निर्माण के कार्य में व्यस्त नहीं हैं.... हमारा सिस्टम उनसे भी नाना प्रकार के सर्वे और ड्यूटीयां करा लकर.. छात्रों के भविष्य से तो खिलवाड कर ही रहा है... शिक्षकों को भी मनोरोगी बना रहा है....। यह सारे दर्द मिलकर हमें चेता रहे हैं.... जाग जाओ... समर शेष है..... भविष्य निर्माण की और देश निर्माण की भी....?
शैलेश तिवारी
शैलेश तिवारी
शिक्षा.... स्वास्थ्य.... और सुरक्षा.... ये तीन बिंदु बहुत महत्वपूर्ण होते हैं.... किसी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी... शासन व्यवस्था के लिए.....। आज शिक्षक दिवस के मौके पर कुछ बात शिक्षा को लेकर ही की जाए....। शिक्षक के बारे में हमारे यहाँ न केवल बहुत कुछ कहा गया है... वरन शिक्षक को सामाजिक रूप से मान और सम्मान भी बहुत दिया जाता रहा है....। देश का भविष्य गढ़ने वाले..... शिक्षा शिल्पी को शिक्षक का दर्जा मिला हुआ है... और मिले भी क्यों नहीं..... शिक्षक ही तो वह झरोखा है... जिससे.... ज्ञान.... विज्ञान... और प्रज्ञान को झाँका जाता रहा है....। इन्हीं ज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान की दम पर.... विकास की गगनचुंबी इबारतों को लिख पाना संभव हो पाता है.....। लेकिन यही शिक्षक उस सड़क की तरह भी है.... जो औरों को तो मंजिल पर पहुंचा देता है... लेकिन खुद वहीं का वहीं रह जाता है....।.... मौजूदा दौर में तो शिक्षा और शिक्षक दोनों की हालत जीर्ण शीर्ण है.... गाँव की सड़क की तरह ये आज... ज्यादा उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं.....। इसके कारण भी कई हैं..... लेकिन जिस लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली को कोसते कोसते.... हमने सत्तर साल से ज्यादा का वक्त गुजार दिया.... परंतु सात दशको के लंबे सफर में.... हम और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था.... तक्षशिला और नालंदा जैसी .... गौरवमयी शिक्षा व्यवस्था का अंकुरण नहीं कर पाए.... जो भारत को विश्व गुरु का दर्जा दिलाती....।मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के तहत ही... हम आज भी नौकरी की आकांक्षा रखने वाला... स्नातक ही तो तैयार कर पा रहे हैं....। हम कहाँ बेहतर शोधार्थी निकाल पा रहे हैं...। इसका कारण है कि हमारे हुक्मरानों ने कभी सोचा ही नहीं कि.... रिसर्च एंड डेवलप्मेंट के लिए देश के बजट में कुछ ज्यादा प्रावधान किये जाएं.... जो दुनियाँ के अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम हैं....। आप सोच सकते हैं कि शिक्षक दिवस के मौके पर... शिक्षा व्यवस्था का क्या लेना देना...? तो जान लें कि जिस तरह....साहित्य समाज का दर्पण होता है....वैसे ही शिक्षक भी देश के भविष्य का आईना होता है......। सड़ी, गली, लाचार, पंगु शिक्षा व्यवस्था में वह शिक्षक कैसा होगा... जिसके कंधों पर देश का भविष्य निर्माण करने की अहम जिम्मेदारी है.....। अब आप अंदाज लगाईयेगा कि....देश का भविष्य कैसा होगा.....?
पहले भी गुरुकुल राज्य आश्रित रहा करते थे... लेकिन अब तो शिक्षा को भी पूंजीपतियों के हाथो में गिरवी रखा जा रहा है.... देश भर में साल दर साल बंद होते सरकारी स्कूल... और बढ़ती निजी विद्यालयों की तादात... इस बात की गवाही खुद दे रही है....। जिस सिस्टम ने सरकार को यह अनुशंसा की... कि शिक्षको के खाली पदों को भरा जाए..... लेकिन सरकार के कानों में इस अनुशंसा की भनक तक नहीं पड़ती है.... क्योंकि उस को अच्छी तरह मालूम है कि... इन पदों की पूर्ति करते ही सरकार को अपनी सुख सुविधाओं में कटोती करनी होगी.....। रोजगार के लिए तरसते युवाओं के लिए......यह खबर आश्चर्यजनक होगी !...सरकारी आंकड़े बताते हैं कि....देश के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में... शिक्षक के दस लाख पद रिक्त हैं....! उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बात करें तो.... केंद्रीय विश्व विद्यालयों लगभग छः हजार और राज्य के विश्व विद्यालयों में लगभग 63 हजार पदों की पूर्ति की जाना है.... इंजीनियरिंग कॉलेजों में सवा लाख पद शिक्षकों की राह देख रहे हैं.... और तो और आई आई टी और आई आई एम में भी चालीस प्रतिशत से ज्यादा पोस्ट खाली पड़ी हैं....। ऐसी स्थिति में अंदाज लगाएं कि देश का भविष्य क्या होगा...? जिस शिक्षक के सम्मान में आज सत्ताधीश कसीदे गढ़ रहे होंगे...ऐसे समय में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लगभग साढ़े छः लाख अस्थाई शिक्षक हैं..... जिन्हें बीते पांच महीनों से वेतन नही मिला होगा......। कैसे वह अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे होंगे... जरा कल्पना करके देखिये....। यहाँ इस बात का जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है कि... बिना दूर दृष्टि के घोषित किए गए लॉक डाउन ने... गैर सरकारी स्कूलों के शिक्षक की रोजी रोटी पर संकट के बादल गहरा दिए हैं....। सरकारी स्कूल के शिक्षक भी केवल... भविष्य निर्माण के कार्य में व्यस्त नहीं हैं.... हमारा सिस्टम उनसे भी नाना प्रकार के सर्वे और ड्यूटीयां करा लकर.. छात्रों के भविष्य से तो खिलवाड कर ही रहा है... शिक्षकों को भी मनोरोगी बना रहा है....। यह सारे दर्द मिलकर हमें चेता रहे हैं.... जाग जाओ... समर शेष है..... भविष्य निर्माण की और देश निर्माण की भी....?
शैलेश तिवारी


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