लेखिका
क्या से क्या हो गए
गुनाह किये बिना मुँह छुपने लगेलहराती जुल्फें सिमटने लगी
शरारत की जगह ली संजीदगी ने
मुस्कुराहटें वजूद तलाशने लगी
हवा हुए इश्क के दिन
विवाद पैर पसारने लगे
कभी मांगते थे हर शाम उनसे
थोड़ी सी जगह अब मांगने लगे
ना जाने कौनसा दिन आखिरी हो
इस डर में शाम गुजरने लगी
उनके आने की आहट होती थी जो
वो खाँसी अब खौफ फैलाने लगी।
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ये बारिशें*******
मैं खड़ी आंगन मेंबरसते रंग के आनन्द में
मुंदी पलकों से
बारिश को निहारने
हल्की आहट से
मेरी पलकें जो उठी
भीगते पी के बदन पर
नज़र मेरी ठहर गयी
वो मंद मंद मुस्कुराते
मेरी ओर चले आ रहे
बार बार जुल्फों से
मोती झटकते हुए
गीली सफेद शर्ट से
बलिष्ठ सीना उभरा हुआ
उन्हें देख मेरा दिल
खुद से बेगाना हुआ
मेरी धड़कनों की गति
यकायक बढ़ गयी
भीगे मेरे ललाट पर
पसीने की बूंदे झलकी
मेरी आंखों की पुतलियां भी
लाज से भारी सी हुई
वो चल रहे मदमाते से
बाहों की मछलियाँ उभरने लगी
मछलियों के उभार से
मेरी साँसे अटकने लगी
एक पल को लाज मेरी
मुझसे बिदा हो गयी
दौड़कर एक क्षण में ही
उनकी बाहों में समा गई
उनकी धड़कनों की ताल
मेरे गीत से मेल खाने लगी
रिमझिम के संगीत में
मिलन की तान उभरने लगी।
विनय पँवार, दिल्ली
----------------------परिचय
विनय पँवार, दिल्ली की निवासी हैं। साहित्य रचना में अपनी अनूठी विधा के लिए जानी जाती हैं। आपके दो उपन्यास ...अदृश्य हमसफ़र , गली दूसरी है प्रकाशित हो चुके हैं। इसी प्रकार दो एकल काव्य संग्रह - दिल से बस यूं ही और तुम...दिल से भी प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा चार साझा काव्य संग्रह का प्रकाशन भी हो चुका है। आपको अनेक साहित्यिक मंचों से पुरुस्कृत और सम्मानित किया जा चुका है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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