रोजगार होते जा रहे... रेजगारी


शैलेश तिवारी

रेजगारी.... जिसमें कभी इकड़ी.. दुकड़ी... के साथ पांच, दस, बीस, पच्चीस और पचास पैसे के सिक्के चलन में हुआ करते थे...। महंगाई ने कुछ ऐसा कोहराम मचाया कि... चवन्नी और अठन्नी... जेब में होने पर खुद को धन्ना सेठ... की तरह आंकने वाला दौर... यादों की पोटली में बंध गया...। वैश्विक स्तर पर रुपये की गिरती कीमत ने.... रेजगारी को चलन से बाहर कर दिया... अब एक और दो रुपये के सिक्के भी... वह अहमियत नहीं रखते... जो कभी इकड़ी और दुकड़ी... की हुआ करती थी...। 
वक्त का निर्दयी पहिया... अपनी क्रूर गति से चला.... महामारी कोरोना वायरस के रूप में प्रकट हुई......देश की अर्थ व्यवस्था में प्राण वायु की भूमिका निभाने वाली ट्रेन के पहिये जाम हो गए....जो ट्रक जहाँ थे वहीं थम गए.....कारखानों में उत्पादन बंद हुआ... उद्योग की चौबीसों घंटे कार्यरत रहने वाली इकाइयां ठप्प हो गई.... श्रमिक बेरोजगार हुए... तो अपने गाँव को पैदल ही चल दिए..। भूख प्यास... से बिलबिलाते... सूरज की प्रचंड किरणों से.... झुलसते मजदूर... सड़कों पर अपनी जान गँवा बैठे... देश के श्रम मंत्रालय के पास.... लोकतांत्रिक कल्याणकारी सरकार के पास... मृत मजदूरों का कोई आंकडा नहीं.... तो इनके परिवारों को किसी तरह की सरकारी सहायता मिलने की बात... तो दिवा स्वप्न है....। संगठित निजी क्षेत्र में कार्यरत... कर्मचारियों की नौकरियां चली गई... ये आंकडा लाखों में है... असंगठित क्षेत्र के मजदूरों... और छोटे फ़ुटपाथी दुकानदारों का... कोई अनुमान लगा पाना मुश्किल ही है....। 
ऐसे कठिन दौर में ही... सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की... सरकारी कवायद से... इनमें नौकरी कर रहे... कर्मचारियों के सर पर लगा लगाया रोजगार छिन जाने की तलवार लटक गई....। ... कार्पोरेट में छटनी का माहौल गर्माया तो.... उनमें काम करने वाले लोगों के चूल्हे ठंडे पड़ गए....। एक तरफ देश के नागरिक रोजी रोटी से हाथ धोते जा रहे हैं.. वहीं दूसरी तरफ... विश्व के सर्वाधिक युवा देश
के युवा... नौकरी पाने की आस में... फॉर्म भरकर अपने इंटरव्यू का इंतजार कर रहे हैं... तो जिनका इंटरव्यू हो चुका है... वो रिजल्ट की प्रतिक्षा में हैं.... जिनका रिजल्ट आ चुका है... वह अपने नियुक्ति पत्र की बाट जोह रहे हैं....। ऐसा गज़ब माहौल कि... रेलवे के सवा लाख रिक्त पदों... की पूर्ति के दो साल से अपनी परीक्षा की तैयारी जुटे.. सवा दो करोड़ से ज्यादा... बेरोजगार युवाओं के धैर्य का बांध टूट जाता है.... देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं.. तब रेल मंत्री दिसंबर में परीक्षा आयोजित किये जाने की जानकारी ट्विटर से देते हैं....। दो अंकों के रिकार्ड माईनस स्तर में गोते लगा रही... जीडीपी (अर्थ व्यवस्था की विकास दर) .. के दौर में... खेती ही बैसाखी बनी हुई है.... सरकार के नए कृषि कानून के विरोध में.. किसान भी आंदोलन पर उतर आए हैं... जिसका मुद्दा है... सरकार की किसानों को बेरोजगार कर देने की नियत का अंदेशा...। 
खैर... मुद्दे की बात है नौकरियां.... केंद्र से लगाकर... राज्य सरकारों के विभागों मे... लाखों पद खाली पड़े हैं... सरकारी कर्मचारी ही बताते हैं कि... एक कर्मचारी तीन तीन कर्मचारियों का काम कर रहा है....। उनकों भरे जाने के सवाल पर... या बीस पचास के फार्मूले से कर्मचारी निकाले जाने की स्कीम के प्रश्न पर... जवाब यही आता है कि.. सभी को सरकारी नौकरी ही क्यों चाहिए... दूसरा सरकारी कर्मचारी मक्कार हैं.. उनको निकाला ही जाना चाहिए...। 
पहले बिंदु पर यह कहा जाए कि... सरकारी नौकरी पाकर व्यक्ति अपने जीवन जीने के स्तर को बेहतर बना पाता है.. जो पकौड़े तल कर नहीं बनाया जा सकता...। तभी तो नार्वे में  प्रति एक हजार व्यक्ति पर86 लोग सरकारी नौकरी में है... अमेरिका में यह औसत 28 का है... ऐसे ही अन्य देशों में है... लेकिन हमारे देश में यह औसत प्रति एक हजार व्यक्ति पर मात्र सोलह लोगों के सरकारी नौकरी करने का है....। 
दूसरे बिंदु पर गौर करें कि... सरकारी कर्मचारी मक्कार हैं.... तो यह उत्तर वास्तव में पूरी व्यवस्था के नकारा होंने की घोषणा करता है.....। जिस प्रशासनिक तंत्र को.. इन कर्मचारियों से काम लेने के लिए नियुक्त किया गया है... अगर वह इनसे काम नहीं ले पा रहे हैं... तो नकारा कौन हुआ... अथवा प्रशासनिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए... शासन में जो लोग हैं... क्या उनका प्रशासनिक नियंत्रण फैल है....। उसका ही परिणाम है कि... आज साल दर साल सरकारी स्कूलों कि संख्या घटती जा रही है... और शिक्षा विभाग में रिटायर हो रहे शिक्षकों के पद भी रिक्त होते जा रहे हैं...। ये सभी बिंदु सरकारी और निजी दोनो क्षेत्रों से... रोजगार छीन रहे हैं.... । गौरतलब बात यह भी है कि सरकार अगर अपने स्तर पर रोजगार नहीं दे पा रही है... तो रोजगार के अन्य अवसर पैदा करने जैसी नीतियां भी तो नहीं बना रही है...। तो बेरोजगार युवाओं के पास आंदोलन जैसे कदम उठाने के अलावा... बाकी  रह भी क्या जाता है...? रेजगारी कि तरह रोजगार को चलन से बाहर करने की... पैदा होती स्थितियाँ देश को किस दिशा में ले जा रही हैं..... युवाओं को किस दशा में अपना जीवन यापन करना होगा...? यह सवाल इस दौर का सबसे मुश्किल सवाल है... जिसका उत्तर देने से जिम्मेदार हमेशा की तरह... कन्नी काट रहे हैं...। 

शैलेश तिवारी,

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