लेखिका
नजरिया ...
छोटी दीदी ने अपने बच्चे ना होने के गम को जीत के बच्चों के साथ बांट लिया था जेठानी सावित्री भी अपना छोटा बेटा उसकी हवाले करके निश्चित हो गई थी ।
रजनी दीदी ने पंकज को इतना लाड प्यार दिया कि वह बिगड़ गया, जो भी जिद करता दीदी प्यार में रस सार हो पूरा करती नतीजा ये रहा कि वह निकम्मे पन से पूरे गांव में आवारागर्दी करता रहता हमेशा शरारत करना किसी ना किसी को ऐसे जरूर बोल देना जिससे बस शिकायतें का घर तक आ जाए रजनी दीदी क्या कहे । हां सावित्री दीदी अवश्य उन्हें कहती है जरूर तुम्हारे साथ यह सब किया होगा बिगाड़ा किसने है यह तो देखो ।
अरे लल्ला तुम भी कम नहीं हो जरूर तुम्हीं ने छेड़ा होगा उसे रजनी दीदी बीच में ही बोल पड़ती ।
हां हां इनकी उम्र है ना तेरा लड़का तो सीधा साधा है.. सावित्री दीदी ताना मारती ।
दोनों को यूं उलझता देखकर शिकायतकर्ता खिसक लेता फिर क्या है छोटू के घर आते ही सावित्री दीदी उसे आड़े हाथों लेते।
रजनी दीदी चुपचाप उसे अंदर ले जाती। रजनी दीदी की शह पर ही न तो भाइयों का खेती बाड़ी में हाथ बटाता न ही उनकी किसी बात पर ध्यान देता।
रोज सुबह बाल संवारता, गले में मफलर बांध का हाथ में मोटा सा कड़ा पहन और बड़ा डंडा लेकर पूरा गुंडा बना घूमने निकल जाता उसी के 24 चमचे उसके साथ रहते गांव की चौपाल पर बैठकर हंसी ठठ्ठा करना उनका रोज का काम हो गया। इन्हीं कारगुजारियों में उलझकर पांचवी तक ही पढ़ पाए।
ऐसे ही एक दिन दोपहर में दूर से एक बैलगाड़ी धूल उड़ाती चली आ रही थी । बैलों के गले की घंटी मधुर स्वर लहरी वातावरण में बिखेर रही थी । गांव के बाहर बैठे इन अलमस्त आवाराओ का ध्यान वही लगा था कि भर दोपहरी में कौन आ रहा है । गाड़ी पास आते आते धीमी हो गई गाड़ी वाले ने रघुवीर ठाकुर का पता पूछा ।
क्या काम है... एक आवाज में जुगाली सी की ।
हमें उनके घर तक जाना है ।
काम बताओ तभी पता बताएंगे,.. मस्ती के मूड में थे वह ।
चलिए काका, गाड़ी में से आवाज आई, गाड़ी तंबूदार थी जिसमें पर्दे पड़े थे , गाड़ीवान गाड़ी आगे बढ़ाने को उद्धत हुआ कि उनमें से एक आवारा कूदकर बैलों के सामने खड़ा हो गया ।
पहले काम बताओ तभी गाँव में घुसने देंगे,उसने कहा ।
कुछ देर खामोशी रही फिर पायल की रुनझुन के साथ गाड़ी में से दो खूबसूरत पैर बाहर निकले और एक झटके में ही उछल कर वह गाड़ी से उतरते हुए जमीन पर खड़ी हो गई।
पलट कर देखा तो छोटू के होश उड़ गए, इतनी खूबसूरत जैसे कोई अप्सरा अभी अभी दूध से नहा कर आई हो, उस पर चटक रंग की काले फूलों वाली लाल साड़ी पहने वह अप्सरा सधे कदमो से आगे बढ़ी।
कौन हमें गांव में जाने से रोक रहा है ? उसने पूछा ।
जो बैलों के सामने खड़ा था उसने छोटू की तरफ इशारा करते हुए कहा यह रोकना चाहते हैं ।
वह छोटू के बिल्कुल करीब पहुँच गई ।
फिर से कहिए जो आपने अभी कहा ।
हम... आपको ...गांव ...में नहीं जाने ...देंगे ...टुकड़े टुकड़े में कह पाया छोटू ।
क्यों ?
हमारी मर्जी,अब थोड़ा साहस आ गया छोटू में ।
चटाक, की आवाज के साथ एक झन्नाटेदार चांटा छोटू के गाल पर रसीद हो गया....ठहरे हुए लहजे मैं वह बोली...यह हमारी मर्जी, मां के बिगड़ैल बेटे , बाप का बोझ हो तुम समझे, मैं मां का गौरव हूँ और बाप का सम्मान, मेरे सामने तुम जैसे ओछे, छोटी और सस्ती हरकत करने वालों की कोई अहमियत नहीं है, मेरी बात याद रखना, कहकर वह गाड़ी में बैठ गई और बैलगाड़ी धूल उड़ाती हुए आगे निकल गई ।
छोटू आज इतना छोटा हो गया कि उसे ढूंढने पर भी अपने में कोई ऐसा गुण नहीं मिला जिसे वह गर्व से किसी के सामने बता सके । उसे लगा कि वह क्या है। पूरे जीवन पर सरसरी नजर डाल गया, कहीं कोई ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आया जो उससे खुश हो। थोड़ी देर बाद देखा तो वह अकेला खड़ा है सभी साथी भाग गए हैं। उसके मस्तिष्क में एक ही बात गूंज रही हैं.... मैं मां का गौरव और पिता का सम्मान हूँ, और वह क्या है ? सोचता हुआ वह धीरे- धीरे किन्तु मजबूत इरादों के साथ घर की ओर बढ़ता चला जा रहा है।
अंजना छलोत्रे, टिमरनी, मध्यप्रदेश
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परिचय
अंजना छलोत्रे , एम.ए. अर्थशास्त्र, एम.ए.हिंदी,एम जे पत्रकारिता में शिक्षित हैं। आप भोपाल मध्यप्रदेश में निवास करती हैं। आप कहानी,कविता,लेख, लघु कथा, फीचर,रेडियो, बाल साहित्य, हास्य व्यंग्य, उपन्यास. आदि विधाओं मरण साहित्य सृजन करती हैं। आपके.मैंअकेली नहीं (कहानी संग्रह 2001), फ़रिश्ता (कहानी संग्रह 2006), शब्द श्रृंगार (कविता संग्रह 2007), अटल संयोग( कविता संग्रह 2008), अभिशप्त देव(कहानी संग्रह 2008),लक्ष्मी बाई के ग्वालियर मेंअन्तिम अठारह दिन (शोधपरक बुक 2010), पनाह (कहानी संग्रह 2016) ऊँची उड़ान ( लघुकथा संग्रह 2017),मन का भगड़ा(कविता संग्रह 2018), लोकतन्त्र की सार्थकता, पंचायती राज और कामकाजी महिलाएँ ( लघुशोध लेख 2019) आदि का प्रकाशन हो चुका है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
अंजना छलोत्रे की कलम ने जब नजरिया नामक कथानक का लेखन किया होगा। उस समय निश्चित ही संतान के पालन पोषण में बरती जाने वाली सावधानियां उनके मस्तिष्क में आई होंगी। संतान को बेहतर नागरिक तैयार करने में माँ की भूमिका बहुत अहम स्थान रखती है। इस बात को कहानी रेखांकित करती है। माँ ही थी कुंती भी... जिसने जंगलों में विचरण करते हुए अभावों के बीच पांडव जैसी संताने तैयार की तो उसी काल खंड में गांधारी ने महलों में रहते हुए तमाम सुख सुविधाओं के बीच कौरवों जैसी संतान हस्तिनापुर को सौंपी।
संतान के लालन पालन में माँ का लाड एक सीमा तक ही उचित होता है... उस लाड़ के मर्यादा लाँघ जाने पर संतान छोटू बन जाती है। जो पनवाडी की उधारी चढ़ाकर निठल्ले घूमा करते हैं.... और पल्ले में टका भी नहीं होता है। किसी के मान का ख्याल न रख, उसको अपमान के घूँट पिला देना इनकी आदत हो जाती है।
कथानक का अंत सुखद करते हुए लेखिका ने छोटू को युवती के चांटे से जीवन बदल देने जैसी घटना से किया है। जबकि यही चांटा उसकी पहली गलती पर उसकी माँ ने मारा होता तो गाँव एक आवारा युवक की शैतानियों से परेशान नहीं होता। मेरी समझ से कहानी उन तमाम माओं के लिए संदेश है जो बच्चो को रुचि से पालती हैं, जबकि संतान नीति से पाली जानी चाहिए। आज के युग में इस प्रकार के कथानक से समाज को एक संदेश मिलता है। जो कि जरूरी भी है। सीधी सरल और सहज भाषा के साथ कथानक तरलता से बहता हुआ अपने गंतव्य तक पहुँचते हुए.... अपना मंतव्य कह जाता है... यह कहानी की प्रमुख विशेषता है। बधाई अंजना जी....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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