शैलेश तिवारी 

प्रदेश सरकार ने खाद्य पदार्थों में हो रही मिलावट को रोकने के  "शुद्ध को लेकर युद्ध"  नाम से एक अभियान छेड़ा हुआ है। अभियान में मिलावट खोरों के खिलाफ क्या और कैसी कार्यवाही को अंजाम दिया जा रहा है। इससे सभी सुधि पाठक बखूबी वाक़िफ़ हैं। 
यहाँ भी उसी शुद्ध को लेकर युद्ध में मिलावटियों के मजे की चर्चा करना मजबूरी बन गया है। 

दरअसल कलेक्टर सीहोर ने एक आदेश मंत्री के निर्देश पर जारी किया कि जिले में विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर क्रमश निबंध और भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की जाना है। इनमे से चुने गए प्रतिभागी जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेंगे। बात केवल भाषण प्रतियोगिता की देखें और समझें कि किस तरह से इस कार्यक्रम को आयोजित करने वालों के व्यवहार में मिलावट है कि शुद्ध को लेकर युद्ध को लेकर लाई जाने वाली जागरुकता ही कटघरे में खड़ी नजर आती है। 
कलेक्टर द्वारा जारी पत्र जिले के नोडल कालेज को मिला होगा। वहाँ से जिले के सभी तेरह सरकारी महाविद्यालयों को निर्देश यथा स्थिति में जारी कर दिए गए। आश्चर्य की बात यह है कि अधिकांश कालेजों ने मेल पर आए आदेश/ निर्देश को खोलकर पढ़ने की शायद जहमत भी नहीं उठाई। जिसका प्रमाण यह है कि अधिकांश कालेजों में यह उनके लेबल पर आयोजित की जाने वाली प्रतियोगिताएं आयोजित ही नहीं की गई। तभी यह परिणाम आया कि जब 28 जनवरी को नोडल कालेज में इस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया तो मात्र तीन प्रतिभागी ही भाग ले पाए। अगर सभी कालेज इस प्रतियोगिता को आयोजित करते तो तेरह प्रतियोगी मौके पर नजर आते। लेकिन आए तीन ही, मामला 3-13 हो गया। खैर इस प्रतियोगिता में प्रथम , द्वितीय और तृतीय स्थान पाने वाले को 2100,1100 और 501 रुपए के पुरुस्कार भी दिए जाने थे। प्रतियोगिता का उद्देश्य संभवतः छात्र छात्राओं में शुद्ध खाद्य पदार्थों को लेकर जागरुकता लाना ही रहा होगा। लेकिन आयोजन की जिम्मेदारी सोये हुए और व्यवहार में मिलावटियों के हाथों में है। जो आचरण में ही मिलावटी हों। अब छात्र जागरुक हों भी तो कैसे जब उनके मार्गदर्शक प्राध्यापक ही सो रहे हों। वो भी इतनी गहरी नींद में कि विषय से संबधित बात करने पर देखकर बताने की बात करते हैं। 

अब शायद शासन-प्रशासन इन सुप्त जिम्मेदारों पर कोई कठोर कार्यवाही कर सके। जिससे जागरुकता आए... संबंधित महाविद्यालयों के दूसरे कामों में भी...।
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