छः फरवरी बीती और दिल्ली के साथ देश ने भी राहत की सांस ली। चुनाव प्रचार के नाम पर बोले जा रहे बोलों के थम जाने से..। कई बार बर्बाद होकर आबाद हुई दिल्ली ने इस बार के चुनाव में नये नजारे देखे..। नये प्रयोग से लड़े गए चुनाव में बोले गए बोल देश भर ने सुने...। लेकिन इन पर चिंतन करने का काम दिल्ली की जनता का रहेगा। जनता का फैसला आठ को हो जाएगा लेकिन दुनिया इस फैसले को ग्यारह फरवरी को आएगा।
चुनावी बोलों को उस दिल्ली ने वाकई दिल से सुना है, जो दिल्ली दिल वालों की कही जाती है। वही दिल्ली इस बात की भी गवाह रही है कि जब 2020 के दिल्ली विधानसभा का चुनाव घोषित हुए थे और आचार संहिता प्रभावी हुई थी। उस समय जिस किसी से भी दिली की सत्ता में आने का सवाल पूछा जाता था तो उसका जवाब बेहिचक रूप से केजरीवाल की सरकार की धांसू वापसी होता था। लेकिन राजनीति अपने प्रतीक चिन्ह सांप की तरह टेडी मेडी चलने की आदी होती है। केजरीवाल के शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जन हितैषी मुद्दों के साथ चुनावी मैदान में थे। उनकी काट किसी भी पार्टी खासकर भाजपा के पास नजर नहीं आ रही थी। सर्प की चाल वाली राजनीति इतनी सीधी तो होती नहीं... कि जैसा दिखे वही हो भी जाए...। दिल्ली की राजनीति में भी वही हुआ.... जैसे जैसे चुनाव आगे बढे और भाजपा की तरफ से गृह मंत्री अमित शाह ने प्रचार का मोर्चा संभाला। ... बस यहीं से जन हितैषी मुद्दों के गुब्बारों की हवा निकालना शुरू की गई।... इस बार भाजपा ने दिल्ली विधानसभा तक पहुंचने की लिए वाया शाहीन बाग का रास्ता चुना। अपने ही देश के हिस्से को मिनी पाकिस्तान और वहाँ प्रदर्शन कर रहे नागरिकों की छवि पाकिस्तानी की बन दी गई। एक भाजपा के नेताजी ने आठ फरवरी के मतदान वाले दिन को हिंदुस्तान - पाकिस्तान के मैच वाला दिन घोषित कर दिया। जनता को ही जनता के सामने तरकीब से खडा किया गया। राज्यसभा में सांसद विप्लव ठाकुर ने इन बातों को सदन के पटल पर रखा। जनता द्वारा निर्वाचित मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादियों से जुड़ा होने की बातें भी कही गई। जन हित के मुद्दों से इतर होकर भाजपा के चुनाव लड़ने के तरीके को आप सांसद संजय सिंह ने भी राज्य सभा में चुनोती दी।
इन बातों का जिक्र इसलिए किया जा रहा है कि पहले जो सीधी सरल सड़क केजरीवाल को वापस मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जा रही थी अब भाजपा ने अपने आक्रामक चुनावी प्रचार के दम पर उतनी ही कठिन बना दी है।
इसकी वजह भी है कि लगभग तीन दर्जन विधान सभा सीटों पर उन वोटर का बाहुल्य है जो शरणार्थी या उस तरह के मिलते जुलते तरीकों से दिल्ली में बसे हैं। उनका रुझान बदलने की कवायद में शाहीन बाग को खलनायक बनाया गया है। इसी तरह दो दर्जन विधानसभा सीटों को प्रभावित करने वाले पूर्वांचल के वोटरों को भाजपा की तरफ मोड़ने के लिए जद यू के नितीश कुमार की रैलियां कराई गई हैं तो पूरी केबिनेट और दो सौ सांसद, एकाध लाख भाजपा कार्यकर्ता के साथ संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक पूरे जोश के साथ जुटे रहे। इन्हीं वजह के चलते चुनावी समीकरण बहुत ही कांटे वाला हो गया।
बोल आप पार्टी और कांग्रेस के नेताओं सहित अन्य दलों ने भी बोलने में कोई कसर नहीं रखी। अब चूंकि प्रचार थम गया है। सभी के बोलों की पोल जनता खोल देगी। जिसका परिणाम देश के सामने ग्यारह फरवरी 20 को आ जाएंगे....।


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