मुकेश दुबे 

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं व वर्तमान मे शिक्षा विभाग सीहोर मे व्याख्याता पद पर कार्यरत हैं)

प्रत्येक शल्यक्रिया के बाद कुछ घंटे या दिन गहन चिकित्सा इकाई (ICU) एवं उच्च निर्भरता इकाई (HDU) में बीतते हैं मरीज़ के।
वह समय जिसमें दवाओं के साथ दुआओं की भी दरकार रहती है। पल-पल बदलते स्वास्थ्य मापदंड (health parameters), जीवनरक्षक प्रणालियों पर आश्रित अंगों का स्वाभाविक कार्यशैली में लौटना व शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता सहित अनेक कारक इस स्थिति के लिए उत्तरदायी रहते हैं।
इस बार यह स्थिति पूर्व की शल्यक्रियाओं से बहुत अलग रही। आईसीयू से जब एचडीयू में लाया गया, 8 वें माले पर एक बड़ा हॉलनुमा कमरा जिसमें 15X15 के चार कर्टेन पार्टीशंड केबिन में चार पलंग लगे हुए थे।
जैसा पूर्व में कहा, इस जगह पर मरीज अर्द्ध यांत्रिक अवस्था में रहने की वजह से पूरी तरह से दूसरों पर आश्रित रहता है। निश्चेतक के कम होते असर से शरीर दर्द की पराकाष्ठा वाली स्थिति में में रहता है। फेफड़ों से रिसते बलगम की गड़गड़ाहट है या कराह भरी कसक यह अंदाजा लगाया जाना मुश्किल है।
इन चारों पलंग के नम्बर ही मरीज की पहचान बन चुके थे अब। कहने को 8550 पर बिहारी बाबू रामखिलावन, 8551 पर पंजाबी शेर वीरेन्दर सिंह, 8552 पर यूपी के अहमद अली और 8553 पर राजस्थान के हरी गुसांई थे मगर कराह एक थी, दर्द एक था, लाचारी एक थी और एक-दूसरे के लिए सलामती के लिए निकलती दुआ भी एक थी।
ज्यादा अगर कुछ था, वो था नर्सिंग व सपोर्टिंग स्टॉफ जिसकी समयबद्ध ड्यूटी रहती थी।
दक्षिण भारत के केरल से आई मलयाली भाषी इन नर्सों के नाम चाहे एलिजाबेथ, ग्रेसी, पर्ली या कुछ और रहे हों किन्तु सेवाभाव बिल्कुल एक सा... पीतल के लोटे में कुछ सिक्के डालकर अगर हिलाया जाये तो जो ध्वनि होगी वही इनके बोलचाल में महसूस होता था।
पहले कुछ घंटे चारों मरीजों के परिचारकों के लिए अजनबीपन के साथ आंचलिक विविधता से भरे थे।
52 भौजी ने जब जानमाज बिछाकर नमाज़ शुरू की, 53 भौजी के चेहरे पर अजीब से भाव तैरने लगे। उनका साथ 50 भाभी भी देती लगीं लेकिन 51 और 53 सामान्य लगे। 
52 भौजी ने जब हाथ उठाकर हर मरीज के लिए
दुआ माँगी तब 51 परजाई ने आमीन कहा। 
52 भौजी ने बारी-बारी तस्बीह चारों के ललाट पर छुलाकर कुछ होठों ही होठों में पढ़ा। 
यहाँ से शुरू हुआ जाति व धर्म से परे इस मुश्किल घड़ी में एक परिवार के होने का सिलसिला। अब न कोई हिन्दू था न मुसलमान न बिहारी न पंजाबी या उत्तर भारतीय या अन्य प्रांत का वासी। 
पानी की पुकार पर किसने किसे अपनी बोतल से पानी दिया या मुश्किल लम्हों में अवसाद से टूटकर कौन किसके कंधे पर सिर रखकर रोया कुछ नहीं पता। 
60X60 के उस टुकड़े पर जैसे सम्पूर्ण भारत बस गया था। वही मंजर जो 47 के पहले कभी दिखता था। सारे सिर्फ़ भारतीय। मन, कर्म व वचन से एक। एक उद्देश्य फिरंगियों से आजादी। 
यहाँ भी हर एक की चाहत थी मर्ज से शिफ़ा। याद था तो बस इतना कि बहुत कठिन वक्त है। किसी का हौसला न टूटने पाये। अगर कोई कमजोर पड़ता तो बाकी उसे हिम्मत देकर ताज़ा दम करके ही दम लेते। 
दवाओं का असर दुआओं के साथ बढ़ता जा रहा था और 50 से 53 अब बेहतर स्थिति में आने लगे थे। 
यह 25 जनवरी की रात थी। अगले दिन गणतंत्र दिवस है। दिल्ली में राजपथ पर राष्ट्रीय पर्व मनेगा। इसबार सीधा प्रसारण नहीं देख पायेंगे यह मलाल जरूर चारों भौजियों की बातों में झलक रहा था। 
26 जनवरी को शाम के वक्त 51 नम्बर के मोबाइल पर जबलपुर से उनके किसी रिश्तेदार का संदेश आया जो आने वाले थे, कि वो नहीं आ सकेंगे। 
तिरंगा जुलूस पर कुछ लोगों ने पथराव कर दिया, जुलूस में शामिल युवाओं ने भी जबाव में पत्थर फेंके और देखते-देखते स्थिति बिगड़ने लगी। प्रशासन सक्रिय हो उठा और पहले धारा 144 फिर दंगाग्रस्त इलाके में कर्फ्यू लगा दिया। 
इस खबर ने जैसे 52 नम्बर पलंग को बाकी से अलग कर दिया। 
एक अनकहा भारीपन तारी हो गया था उस हॉल की फिजा में। अब न जांनमाज बिछ रहा था न पानी की बोतलें बदल रही थीं। इस समय के माहौल पर यदाकदा टिप्पणी भी सुनाई देने लगी थीं। 
अजीब सी ख़ामोशी छाई लगती थी। 
तभी 53 के गुसांई ने बेड के बैक को ऊपर किया और आवाज़ लगाई  "रजिया बेटा एक घूँट पानी पिला दे। गला सूख रहा है और तेरी आंटी अभी तक पानी की बोतल लेकर नहीं लौटी।" 
रजिया ने फौरन बोतल से गिलास में पानी निकाल कर गुसांई अंकल को पिला दिया। 
अंकल ने उसके सिर पर हाथ घुमाकर कहा तू बिल्कुल परेशान न हो बेटा। अहमद बिल्कुल अच्छा होकर जायेगा। 
'अंकल! आप सभी यहाँ से खुशहाल लौटेंगे। मैंने हर दुआ में अल्लाह से सबकी खैरियत माँगी है और मुझे विश्वास है अपने अल्लाह पर वो दुआ जरूर कुबूल होगी।' 
"आमीन".... एक साथ रामखिलावन व वीरेन्दर सिंह की आवाज़ आई। 
50 भौजी और 53 भाभी ने रजिया को गले लगा लिया। तभी 52 परजाई ने थर्मस से चाय कप में उंडेली और तीनों को बुलाया। 
चारों बेड फिर से करीब आ गए थे। 
सुबह के 3:00 बजने वाले हैं। कुछ देर बाद वार्ड जागने लगेगा। सेम्पल कलेक्शन व स्पंजिंग की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। 
इससे पहले कि नर्स आकर टिश्यू व पेन छीने, अपनी बात बंद कर रहा हूँ। तकिये के नीचे छुपा दिये हैं लिखे टिश्यू। बाकी बाद में। 
आज बस इतना ही।
©मुकेश दुबे
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