सखी सईया तो खूब ही कमात है
महंगाई डायन खाये जात है
हर महीना उछले पेट्रोल
डीज़ल का उछला है रोल
शक्कर बाई के का बोल...
फिल्मी गीतों में भी महंगाई को लेकर जो कुछ भी लिखा गया और उसको लयबद्ध किया गया, उसने आम आदमी के उस दर्द को बयाँ किया जो वह कह नहीं पाता... जिसे कोई सरकार सुनना भी नहीं चाहती..। इसी तरह का एक गाना इंद्रा गांधी के काल में आई फिल्म रोटी, कपड़ा और मकान में भी था.. जिसके ये बोल आज मौजू हैं.... पहले मुट्ठी में पैसे जाते थे... थैले में शक्कर आती थी... अब थैले में पैसे जाते हैं.... और मुट्ठी में शक्कर आती है.....। दशक के दशक बदल गए.... सरकारें बदल गई.... और तो और सदी भी बदल गई... लेकिन नहीं बदली तो वो है आम आदमी की किस्मत... पहले बाप खटता हुआ घर चलाता था... अब बेटा चला रहा है... यही पीढी का बदलाव आया है..। बस और ज्यादा कुछ बदला है तो ये कि... अब पैसों की जगह रुपये जाने लगे हैं थैले भर कर शक्कर लाने में... लेकिन शक्कर तो जनाब मुट्ठी में ही आ रही है...। उस समय जनसंघ (आज की भाजपा) नारे लगाती थी कांग्रेस के बूढ़े बैल... खा गए शक्कर... पी गए तैल....। आज की भाजपा भी जब प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में थी तब .... रसोई गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने पर, पेट्रोल डीजल में उछाल आने पर, रेल किराया बढ़ाए जाने को लेकर... सरकार की नाक में दम कर देती थी...। रुपया डालर के मुकाबले गिरने पर देश की प्रतिष्ठा गिरने की बात कही जाती थी...।
आप कह सकते हैं.. इन बातों का उल्लेख अब क्यों...? जनाब अब वही नेता सत्ता में हैं... जब से सत्ता संभाली है... तब से रसोई गैस सिलेंडर की कीमत दोगुनी हो गई है... क्रूड ऑयल की कीमतें दुनियाँ भर में गिरने के बाद भी... पेट्रोल डीजल की कीमत नीचे नहीं आई.. रुपया आई सी यू में ही भर्ती है...।
ताजा मामला पहले कामर्शियल गैस ढाई सौ रुपये तक प्रति सिलेंडर बढ़ाए जाने का है..... घरेलू रसोई गैस डेढ़ सौ रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ गई है....। गरीब की महंगी होती थाली के साथ साथ.... मध्यम वर्ग के उस सरकारी नौकरी पेशा पर भी गाज गिरी है... जिसके जी पी एफ के ब्याज दर में राज्य सरकार ने भी कटोती कर के... भविष्य के लिए हो रही बचत में कटोती कर डाली है। ऐसे एक नहीं अनेक मामले हैं जिनका यहाँ जिक्र करने में जगह ही कम पड़ जाए...। उदाहरण के मामलों से ही सही आर्थिक मंदी के दौर में... अपने ही नागरिकों की पुकार.... सुनो तो सरकार....।
महंगाई डायन खाये जात है
हर महीना उछले पेट्रोल
डीज़ल का उछला है रोल
शक्कर बाई के का बोल...
फिल्मी गीतों में भी महंगाई को लेकर जो कुछ भी लिखा गया और उसको लयबद्ध किया गया, उसने आम आदमी के उस दर्द को बयाँ किया जो वह कह नहीं पाता... जिसे कोई सरकार सुनना भी नहीं चाहती..। इसी तरह का एक गाना इंद्रा गांधी के काल में आई फिल्म रोटी, कपड़ा और मकान में भी था.. जिसके ये बोल आज मौजू हैं.... पहले मुट्ठी में पैसे जाते थे... थैले में शक्कर आती थी... अब थैले में पैसे जाते हैं.... और मुट्ठी में शक्कर आती है.....। दशक के दशक बदल गए.... सरकारें बदल गई.... और तो और सदी भी बदल गई... लेकिन नहीं बदली तो वो है आम आदमी की किस्मत... पहले बाप खटता हुआ घर चलाता था... अब बेटा चला रहा है... यही पीढी का बदलाव आया है..। बस और ज्यादा कुछ बदला है तो ये कि... अब पैसों की जगह रुपये जाने लगे हैं थैले भर कर शक्कर लाने में... लेकिन शक्कर तो जनाब मुट्ठी में ही आ रही है...। उस समय जनसंघ (आज की भाजपा) नारे लगाती थी कांग्रेस के बूढ़े बैल... खा गए शक्कर... पी गए तैल....। आज की भाजपा भी जब प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में थी तब .... रसोई गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने पर, पेट्रोल डीजल में उछाल आने पर, रेल किराया बढ़ाए जाने को लेकर... सरकार की नाक में दम कर देती थी...। रुपया डालर के मुकाबले गिरने पर देश की प्रतिष्ठा गिरने की बात कही जाती थी...।
आप कह सकते हैं.. इन बातों का उल्लेख अब क्यों...? जनाब अब वही नेता सत्ता में हैं... जब से सत्ता संभाली है... तब से रसोई गैस सिलेंडर की कीमत दोगुनी हो गई है... क्रूड ऑयल की कीमतें दुनियाँ भर में गिरने के बाद भी... पेट्रोल डीजल की कीमत नीचे नहीं आई.. रुपया आई सी यू में ही भर्ती है...।
ताजा मामला पहले कामर्शियल गैस ढाई सौ रुपये तक प्रति सिलेंडर बढ़ाए जाने का है..... घरेलू रसोई गैस डेढ़ सौ रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ गई है....। गरीब की महंगी होती थाली के साथ साथ.... मध्यम वर्ग के उस सरकारी नौकरी पेशा पर भी गाज गिरी है... जिसके जी पी एफ के ब्याज दर में राज्य सरकार ने भी कटोती कर के... भविष्य के लिए हो रही बचत में कटोती कर डाली है। ऐसे एक नहीं अनेक मामले हैं जिनका यहाँ जिक्र करने में जगह ही कम पड़ जाए...। उदाहरण के मामलों से ही सही आर्थिक मंदी के दौर में... अपने ही नागरिकों की पुकार.... सुनो तो सरकार....।


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