लेखक
माँ
माँ....माँ....माँ
शब्दों की मोहताज़ नहीं
एक एहसास है..
एक एहसास है..
माँ ठंडी छाँव मे सुलाती
आँचल दे...धूप मे बैठी
मुझे धूप ना लगने देती...माँ
क्या मैं
तेरा ऋण उतार पाऊंगा ..माँ
जन्म से पहले कोख मे रख
ठंडक देती...माँ
क्या मैं..
तुम्हे संग भी रख पाऊंगा
माँ...माँ...माँ
माँ..तू जननी मेरी
पहचान मेरी
क्या मैं..
तेरी पहचान बन पाऊंगा
माँ तुमने सींचते-सींचते
पाला मुझे माली की तरह
क्या मैं
तुम्हे ठंडी छाँव पंहुचाऊंगा
कदम-कदम बढ़ता देख
बचपन से जवानी तक
पाले कई सपने तुमने
क्या मैं..
उन्हें पूरा कर पाऊंगा
माँ.. माँ.. माँ
तेरा प्रेम निस्वार्थ
क्या मैं
स्वार्थ मे भी प्रेम कर पाउँगा
माँ नहीं..नही
मैं तेरा ऋण उतार पाउँगा
इस जन्म मे क्या मैं भी
'पवन' श्रवन बन पाउँगा
श्रवण बन पाउँगा
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