वोट देना पसंदगी नहीं अपितु उम्मीद को जाहिर करना..
संवैधानिक रुप से अलग हटकर बात की जाए तो 'वोट' से बड़ा आदरणीय कोई नहीं। वोट को सरकार योजनाओं मे तोल रही है। नोटा का भी विकल्प दे डाला। आम आदमी सिर्फ इतना समझता है कि वोट डालना मेरा अधिकार है। क्योंकि उसे इससे ज्यादा समझाया ही नहीं गया। मेने भी पोलिंग बूथ पर पहुंच कई मर्तबा रस्म अदा की।
लेकिन जब एकांत मे सोचा तो वोट के महत्व ने मुझे हिलाकर रख दिया। वोट 'पसंद' नहीं एक 'उम्मीद' का नाम है। उम्मीद या आकांक्षा जाहिर करने का माध्यम। और जिससे उम्मीद हो और यदि वह उम्मीदों पर खरा न उतरे तो समझा जासकता है कि दिल तो टूटा ही होगा।
दिल टूटने और तोड़ने के कई दुष्परिणाम सामने हैं। कोई जनप्रतिनिधि जब घर भरने मे व्यस्त हो जाएं तो वह कितने अरमानों को तोड़ने का अपराधी है। सजा यहां का कानून नहीं देगा। अदृश्य अदालत मे पेशी होगी और सजा....
हमने लोगों की उम्मीदों का कत्ल किया है। वह उम्मीद जो हजार काम छोड़कर उसने पोलिंग बूथ पहुंच जाहिर की थी। दंड कहां मिलता है गद्दारी का यह भी समझ का एक विषय है। अगला चुनाव हारना दंड नहीं है। पीढ़ियाँ दिक्कत मे रहती हैं यही दंड है।
बनिया तोल-मोल मे मारे तो अपराध और तुम बोल मे मारो तो...!!
चुनाव 'महारानी' दिल्ली मे होने जा रहे हैं। मप्र मे भी निकाय चुनाव नजदीक हैं। लड़ाके तैयारी मे जुटे हैं। मगर 'उम्मीद' फिर पोलिंग बूथ पर पहुंच अपना धर्म निभाएगी। शत-प्रतिशत मतदान कराने का तमगा हांसिल किया जाएगा मगर शत-प्रतिशत उम्मीदों को तोड़ने वाला व्यक्ति हमेशा बख्शा जाएगा क्योंकि 'प्रजातंत्र' है।
राजेश शर्मा
संवैधानिक रुप से अलग हटकर बात की जाए तो 'वोट' से बड़ा आदरणीय कोई नहीं। वोट को सरकार योजनाओं मे तोल रही है। नोटा का भी विकल्प दे डाला। आम आदमी सिर्फ इतना समझता है कि वोट डालना मेरा अधिकार है। क्योंकि उसे इससे ज्यादा समझाया ही नहीं गया। मेने भी पोलिंग बूथ पर पहुंच कई मर्तबा रस्म अदा की।
लेकिन जब एकांत मे सोचा तो वोट के महत्व ने मुझे हिलाकर रख दिया। वोट 'पसंद' नहीं एक 'उम्मीद' का नाम है। उम्मीद या आकांक्षा जाहिर करने का माध्यम। और जिससे उम्मीद हो और यदि वह उम्मीदों पर खरा न उतरे तो समझा जासकता है कि दिल तो टूटा ही होगा।
दिल टूटने और तोड़ने के कई दुष्परिणाम सामने हैं। कोई जनप्रतिनिधि जब घर भरने मे व्यस्त हो जाएं तो वह कितने अरमानों को तोड़ने का अपराधी है। सजा यहां का कानून नहीं देगा। अदृश्य अदालत मे पेशी होगी और सजा....
हमने लोगों की उम्मीदों का कत्ल किया है। वह उम्मीद जो हजार काम छोड़कर उसने पोलिंग बूथ पहुंच जाहिर की थी। दंड कहां मिलता है गद्दारी का यह भी समझ का एक विषय है। अगला चुनाव हारना दंड नहीं है। पीढ़ियाँ दिक्कत मे रहती हैं यही दंड है।
बनिया तोल-मोल मे मारे तो अपराध और तुम बोल मे मारो तो...!!
चुनाव 'महारानी' दिल्ली मे होने जा रहे हैं। मप्र मे भी निकाय चुनाव नजदीक हैं। लड़ाके तैयारी मे जुटे हैं। मगर 'उम्मीद' फिर पोलिंग बूथ पर पहुंच अपना धर्म निभाएगी। शत-प्रतिशत मतदान कराने का तमगा हांसिल किया जाएगा मगर शत-प्रतिशत उम्मीदों को तोड़ने वाला व्यक्ति हमेशा बख्शा जाएगा क्योंकि 'प्रजातंत्र' है।


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