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पीर लिए वो बैठा होगा.....
पुन: किसी नदिया के तीरे पीर लिए वो बैठा होगा |
पीकर बेटे के हिस्से के दुख सीने में कहीं छुपाता |
कभी कोसता किस्मत को वो बीड़ी पर बीड़ी सुलगाता |
कभी पोर बूढी उंगली के वो किस्मत की ओर तानता |
माथे की हर सिलवट में से कर्तव्यों को कभी छानता |
थर-थर काँप रहे तन में भी धीर लिए वो बैठा होगा |
पुन: किसी नदिया के तीरे पीर लिए वो बैठा होगा |
उसकी सहनशक्ति से बाहर उसके घर की कलह हुई है |
कई प्रहर तक उलझे मन की आज मृत्यु से जिरह हुई है |
चाहत तो है मर जाने की किंतु लकीरों में जीवन है |
इसी बात की उसे तसल्ली स्वस्थ अभी उसका यह तन है |
स्वस्थ देह, पर पीड़ित दृग में नीर लिए वो बैठा होगा |
पुन: किसी नदिया के तीरे पीर लिए वो बैठा होगा |
काल चक्र ने भी जीवन का ऐसा पहलू दिखलाया है |
मौन रहे या अश्रु बहाए अभी नहीं तय कर पाया है |
समय निशाना दुखती नस पर ही सटीक बैठाता अक्सर |
एक खुशी दे उसके बदले लाखों दुख दे जाता अक्सर |
आज पुन: फिर कहीं धनुष पर तीर लिए वो बैठा होगा |
पुन: किसी नदिया के तीरे पीर लिए वो बैठा होगा |
अमित हिंदुस्तानी लखीमपुर खीरी, उत्तरप्रदेश
------------------अमित हिंदुस्तानी... साहित्य में युवा हस्ताक्षर हैं। किसान परिवार में जन्म लेकर ठेठ देहाती जीवन की पीड़ा से इनका नाता है। लेब टेकनिशियन की नौकरी करते हुए इन्होंने अपनी आँखों में कुछ लीक से हटकर कर गुजरने का सपना पाला है तो सीने में जज्बे की वह आग भी धधक रही है जो मानवीय व्यथा को सुचारु व्यवस्था से परिचय कराने को बेताब है। मृदुभाषी अमित काव्य की बहुत सी विधाओं में प्रभु प्रदत्त गुण से संपन्न हैं। एम पी मीडिया पॉइंट के लिए रचनाएँ देते रहने की स्वीकृति से हम उनके आभारी हैं।


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