भेष बदलो और निकलो सड़क पर, समझ मे सब आजाएगा।
कई लेखक समझाते-समझाते वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन तंत्र को समझ नहीं आया। आता भी क्यों, क्योंकि वह विभिन्न परीक्षा फेस कर "उक्त" मुकाम पर आए। खबरनवीसों को मुकाम बख्शना मजबूरी है। क्योंकि कबूतर जा-जा...
कबूतर भी खुश, क्योंकि साहब की चिट्ठी लेकर जा रहा हूँ किसी ऐरे गेरे नत्थूखेरे की नहीं।
साहब बंगले मे,चाकर बगल मे, मिटिंगों का फोबिया जो राजनेताओं ने गिफ्ट मे दिया। "कांफ्रेंस" एेसा शब्द जो आजादी के पहले किसी ने जेब मे रख दिया हो। और कहा हो "यह बरकत का ताबीज़" हमेशा साथ रखना।
कुछ पीएससी से तो कुछ....!!
मगर सेलेक्ट हुए। समय सीमा की बैठक! बैठक मे हूँ। कोठे मे भी भाषा बैठक की ही बोली जाती है। गांधी जी ने कहा था कि... व्यवस्था वैश्या न हो जाए।
मप्र मे डीपी मिश्र को कौन नहीं जानता_उनकी प्रशासनिक क्षमताएं अदभुत थीं। वह आज भी प्रदेश के लोह पुरुष कहलाते हैं। उनके निर्णय अपरिवर्तित रहा करते थे। "छिनाल" व्यवस्था थर-थर कांपती थी। वह कहते थे
आज हम केवल सरकारी नौकर होकर रह गए। हमे सिर्फ "उनकी" नजरों मे आना है।
क्षमताएं और संभावनाएं असीमित हैं बस पहचनने की अयोज्ञता है। क्यों..!! भेष बदलना होगा--सड़कों पर निकलना होगा। तभी हकीकत आपके कदम चूमेगी। आप बत्तियाँ त्याग दो, यह तो शासन का गिफ्ट हैं।
उस गिफ्ट को जानिए जो प्रभू ने आपको दिया। आप वैसे ही हैं जो 100 वाट का कभी बल्व फ्यूज हुआ। फ्यूज वल्व सब बराबर होते हैं चाहे कितने ही वाट के हों।
काम्पटीशन फेस करने के बाद काम्पटीशन मे आना सहज नहीं होता। इस तत्व को भी जानना जरुरी है। तो महाशयों भेष बदलो, आ जाओ सड़क पर, सब समझ मे आ जाएगा। और आम नागरिकों के साथ वह न्याय हो जाएगा जिसे दिलाने प्रभू ने आपको अपना पार्षद चुना।
राजेश शर्मा
कई लेखक समझाते-समझाते वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन तंत्र को समझ नहीं आया। आता भी क्यों, क्योंकि वह विभिन्न परीक्षा फेस कर "उक्त" मुकाम पर आए। खबरनवीसों को मुकाम बख्शना मजबूरी है। क्योंकि कबूतर जा-जा...
कबूतर भी खुश, क्योंकि साहब की चिट्ठी लेकर जा रहा हूँ किसी ऐरे गेरे नत्थूखेरे की नहीं।
साहब बंगले मे,चाकर बगल मे, मिटिंगों का फोबिया जो राजनेताओं ने गिफ्ट मे दिया। "कांफ्रेंस" एेसा शब्द जो आजादी के पहले किसी ने जेब मे रख दिया हो। और कहा हो "यह बरकत का ताबीज़" हमेशा साथ रखना।
कुछ पीएससी से तो कुछ....!!
मगर सेलेक्ट हुए। समय सीमा की बैठक! बैठक मे हूँ। कोठे मे भी भाषा बैठक की ही बोली जाती है। गांधी जी ने कहा था कि... व्यवस्था वैश्या न हो जाए।
मप्र मे डीपी मिश्र को कौन नहीं जानता_उनकी प्रशासनिक क्षमताएं अदभुत थीं। वह आज भी प्रदेश के लोह पुरुष कहलाते हैं। उनके निर्णय अपरिवर्तित रहा करते थे। "छिनाल" व्यवस्था थर-थर कांपती थी। वह कहते थे
आज हम केवल सरकारी नौकर होकर रह गए। हमे सिर्फ "उनकी" नजरों मे आना है।
क्षमताएं और संभावनाएं असीमित हैं बस पहचनने की अयोज्ञता है। क्यों..!! भेष बदलना होगा--सड़कों पर निकलना होगा। तभी हकीकत आपके कदम चूमेगी। आप बत्तियाँ त्याग दो, यह तो शासन का गिफ्ट हैं।
उस गिफ्ट को जानिए जो प्रभू ने आपको दिया। आप वैसे ही हैं जो 100 वाट का कभी बल्व फ्यूज हुआ। फ्यूज वल्व सब बराबर होते हैं चाहे कितने ही वाट के हों।
काम्पटीशन फेस करने के बाद काम्पटीशन मे आना सहज नहीं होता। इस तत्व को भी जानना जरुरी है। तो महाशयों भेष बदलो, आ जाओ सड़क पर, सब समझ मे आ जाएगा। और आम नागरिकों के साथ वह न्याय हो जाएगा जिसे दिलाने प्रभू ने आपको अपना पार्षद चुना।


Post A Comment: