लेखिका
बेचारा_दिल
पूरे दो साल हो गए उससे जुदा हुए, पर ये जो साँसें हैं न, हर पल गवाही देती उसकी मौजूदगी की। जिस्म तो क्या रूह पर भी काबिज कर रखा था उसने। आज बहुत याद आ रहे थे स्वाति को वे दिन जब सागर से कालेज के दिनों में पहली मुलाकात हुई थी, वह भी तब जब पहले ही दिन उसे अपने सीनियर्स से रैगिंग का शिकार होना पड़ा था। रौद्र और उसके साथियों ने जब स्वाति को कालेज के पहले ही दिन घेर कर परेशान करना शुरू कर दिया, तो लगभग रोने का मन हो रहा था।
"क्यों परेशान कर रहे हो भाई लड़की को अकेले देखकर? जरा से भी अच्छे संस्कार नहीं दिए क्या माँ बाप ने, जो ऐसा व्यवहार कर रहे?" एक रौबदार आवाज सुनकर सब पीछे हट गए।
"अरे सागर भाई! बस ऐसे ही थोड़ा सा मजाक कर रहे थे और कोई बात नहीं।" और सब अपनी अपनी कक्षाओं में चले गए। स्वाति ने ध्यान से देखा सामने एक छह फीट दो इंच लम्बा, सांवली रंगत लिए, घुंघराले बालों वाला नौजवान खड़ा मुस्कुरा रहा था।
"हैलो! मैं सागर मल्होत्रा!!इसी कॉलेज में बी.टेक. कम्प्यूटर साइंस तृतीय वर्ष में हूँ।" कहते हुए उसने हाथ आगे बढ़ा दिया। स्वाति ने सकुचाते हुए हाथ मिलाया और धन्यवाद कहकर अपनी कक्षा में चली गई। अब तो लगभग प्रतिदिन कालेज आते जाते स्वाति को सागर के दर्शन हो ही जाते, पर एक स्मित मुस्कान से आगे बात नहीं बढ़ी कभी। एक हिचकिचाहट सी थी मन में, जो मित्रता स्वीकार करने में बाधा बन रही थी। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि ये दूरियां हमेशा के लिए समाप्त होकर एक सुखद एहसास में परिवर्तित हो गई।
हुआ यूँ कि कॉलेज में नए विद्यार्थियों के स्वागत के लिए और पुराने छात्रों से उनका मेलजोल बढ़ाने के लिए एक समारोह का आयोजन किया गया। इसी कार्यक्रम में खेली गई अलग अलग गेम्स के दौरान एक खेल में पुराने छात्रों को कालेज में दाखिल हुए नए छात्रों में से किसी एक का नाम गीत या कविता में प्रस्तुत करना था और अगर सामने वाले ने बूझ लिया , तो उन्हीं की जोड़ियां बनाकर अगली प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। बहुत मजेदार रही यह गेम क्योंकि अभी आपसी परिचय न होने के कारण यह कोई सरल काम नहीं था। फिर भी कुछ विद्यार्थियों ने कोशिश की अपने स्तर पर
"मैं कहीं कवि न बन जाऊँ तेरे प्यार में ए कविता"
"मारिया, ओ मारिया, ओ मारिया, हो..हो।"
"गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल.."
बस इसी तरह चलते चलते माइक सागर के हाथ आ गया, तो शब्द कविता के रूप में स्वयं ही एहसास बन निखर गए..
"स्वाति नक्षत्र की बूँद पाकर स्नेह रूपी जल
सागर की सीप में गिर मोती बन हो गया वो पावन।"
स्वाति के चेहरे पर एक मधुर मुस्कान फैल गई और वह सागर के साथ जोड़ीदार के रूप में चुनी गई। बस उसके बाद प्रतियोगिता की हर चुनौती को दोनों ने चुटकियों में पार कर लिया और अंत में सबसे परफेक्ट जोड़ी का खिताब उन दोनों को ही मिला।
यहीं से दोनों के मिलने जुलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, तो सागर के अंतिम वर्ष की परीक्षा तक निर्बाध रूप से चलता रहा। स्वाति की पढ़ाई में मदद के साथ साथ देश समाज के सभी मुद्दों पर खूब बातें होती दोनों में। कॉलेज के हर फंक्शन की तैयारी में खूब जोरशोर से भाग लेते थे दोनों। पर जैसे जैसे कॉलेज से सागर के जाने का समय पास आता जा रहा था, स्वाति का दिल डूबता जा रहा था। आज शाम को सागर ने लेकव्यू रेस्टोरेन्ट में बुलाया था शाम को कुछ बात करने के लिए। स्वाति को इस तरह अकेले मिलने जाने में एक झिझक सी हो रही थी, पर दिल के हाथों मजबूर थी। बेचारा दिल भी क्या करे, भावनाओं के समंदर में जब डूबता है, तो बाहर निकलने का कोई राह भी तो नहीं सूझता।
"हैलो स्वाति! कैसी हो?" सामने बैठते हुए सागर ने पूछा।
"ठीक हूँ सागर। मुझे क्या हुआ?"
"कुछ दिनों से बहुत बुझी बुझी सी लग रही हो? क्या बात है?"
"अरे सच में कोई बात नहीं है ऐसी।"
"क्या वाकई? सागर ने गौर से देखते हुए पूछा तो अचकचा गई स्वाति," जो मन में है कह दो स्वाति क्योंकि अगले महीने ही मैं एम. टेक के लिए न्यूजीलैंड चला जाऊंगा। यह न हो कि कुछ अनकहा रह जाए दिलों में।"
"दिल की बातें तो दिल बूझ ही लेता है न सागर बिना कहे ही? शब्दों की कहाँ जरूरत होती इन एहसासों को बयान करने के लिए?"स्वाति जैसे बुदबुदाते हुए बोली।
"हाँ! शायद तुम ठीक कह रही हो। तो क्या मैं समझ लूँ कि तुम्हारे दिल में भी प्यार के वहीं भावनाएं अंकुरित हो रही हैं, जो मेरे दिल में हैं ?"कुछ भी समझ नहीं आ रहा था स्वाति को क्योंकि प्यार के इज़हार का यह वाकई अनूठा तरीका था जिसमें न लम्बी लम्बी बातें हुई, न कसमें वादे; बस दिल से दिल की बात हुई और सब तय हो गया," देखो स्वाति! अभी दो साल मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है और तब तक तुम भी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। बस आते ही मैं इस विषय में अपने और तुम्हारे माता पिता से बात करूंगा क्योंकि मैं चाहता हूँ कि जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता अच्छे से, किसी को भी असमंजस में नहीं डालना चाहता। प्यार एक एहसास के साथ साथ जिम्मेदारी भी है और मैं उसमें पूरी तरह सक्षम होने के बाद ही तुम्हारा हाथ माँगना चाहता हूँ तुम्हारे माता पिता से। क्या तुम तब तक इंतजार कर सकोगी? " सागर ने इतने प्यार में डूबकर कहा कि इंकार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।
"कहाँ खोई हुई है? मोबाइल कब से बज रहा?" मम्मी ने आकर टोका, तो तंद्रा भंग हुई स्वाति की। फोन पर सागर था,"हैलो स्वाति! मैं वापिस आ गया हूँ।कल तुमसे मिलने आ रहा हूँ तुम्हारे घर।"
"वाह्ह! यह तो सरप्राइज़ हो गया मेरे लिए। पहले क्यों नहीं बताया? कब आए तुम?"स्वाति ने नाराजगी जताते हुए पूछा। वैसे भी पिछले दो महीने से परीक्षा की तैयारी की वजह से फोन पर बात नहीं हुई थी सागर से। सारी रात खुली आँखों से ही सुखद सपने संजोते बीत गई। मम्मी पापा को सिर्फ इतना बताया कि कॉलेज का एक मित्र आ रहा मिलने।
अगले दिन शाम को बिल्कुल अलग सी लग रही थी स्वाति। गुलाबी रंग के कढ़ाई वाले सूट, काजल और हल्की लिपस्टिक ने बिल्कुल अलग रूप दे दिया था उसे और ऊपर से प्यार की खुमारी ने और भी निखार दिया था रंग रूप उसका। दरवाजे पर घंटी बजते ही दिल की धड़कन तेज हो गई। फटाफट भागी दरवाजे की ओर। खोला , तो सामने सागर था, पर अकेले ही आया था। स्वाति को उम्मीद थी कि शायद अपने माता पिता को साथ ही लेकर आएगा रिश्ते की बात करने।
"क्या दरवाजे पर ही खड़ा रखने का इरादा है?"सागर ने मुस्कुराते हुए कहा, तो स्वाति ने अंदर आने के लिए रास्ता छोड़ दिया। स्वाति को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि सागर के चलने का ढंग थोड़ा अजीब लग रहा था। एक पाँव को दबा कर रख रहा था वह।
" बैठो सागर! मैं पानी लेकर आती हूँ।"स्वाति रसोई घर में जाने को मुड़ी तो सागर ने रोक दिया,"किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं स्वाति। मैं तो बस आखिरी बार तुमसे मिलने आया हूँ। मुझे बंग्लोर में मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई है। अगले सप्ताह ही ज्वाइन करना है।" स्वाति का दिल एकदम बैठ गया यह सुनकर।
"यह तो खुशी की बात है सागर! पर आखिरी बार का क्या मतलब। मैं कुछ समझी नहीं, ऐसा क्यों कह रहे तुम?"
" स्वाति! मैं तुम्हें किसी धोखे में नहीं रखना चाहता। मैं तुम से शादी नहीं कर सकता।" स्वाति के साथ साथ उसके माता पिता भी सकते में आ गए जो कि इस पूरे मामले से अंजान थे और अब तक बैठक में आ चुके थे।
"क्यो? कोई और मिल गई है क्या? हाँ! न्यूजीलैंड रहने के बाद अब मुझ जैसी मध्यमवर्गीय लड़की क्यों पसंद आने लगी तुम्हें?" इससे पहले कि स्वाति अपनी ही रौ में बोले जाती, उसके पिता ने उसे चुप करवा बिठा दिया और खुद सागर से मुखातिब होते हुए बोले," देखो बेटा!मैं नहीं जानता कि तुम लोगों के बीच क्या चल रहा? तुम यहां आए हो, तो जरूर कोई मंतव्य होगा, वरना धोखा देना होता, तो यहां आने की क्या आवश्यकता थी?" शायद उनकी अनुभवी आँखें बहुत कुछ अनकहा पढ़ चुकी थी सागर के बेचारगी भरे शब्दोंमें।
"जी अंकल! मैं और स्वाति कॉलेज के दिनों से ही.. पर मैं अपने पैरों पर खड़े होने से पहले रिश्ते की बात नहीं करना चाहता था।"
"पर अब तो तुम्हारी नौकरी लग चुकी है। अब क्या परेशानी है? क्या तुम्हारे माता पिता को इस रिश्ते में कोई परेशानी है? ऐसा है, तो मैं खुद जाऊंगा उनके पास अपनी बेटी की खुशी के लिए।" मिस्टर वर्मा ने कहा।
"नहीं अंकल, ऐसी कोई बात नहीं। मेरी खुशी में ही मम्मी पापा की खुशी है।वे बहुत खुले विचारों के हैं।"
"फिर दिक्कत क्या है बेटा?" मिसेज वर्मा ने भी आशंकित होते हुए पूछा।
"दरअसल आंटी, जिस दिन मैं अपने पैरों पर खड़ा हुआ यानि जिस दिन मुझे पढ़ाई समाप्त करते ही कॉलेज प्लेसमेंट के तहत बंग्लोर से नौकरी के लिए बुलावा आया, उसी दिन मैं अपने पैरों पर खड़ने के काबिल नहीं रहा।"
"क्या मतलब सागर? मेरा दिल बहुत घबरा रहा। यूँ पहेलियां मत बुझाओ, साफ साफ कहो।" स्वाति लगभग चिल्ला पड़ी।
"मैं आप लोगों को सब बताने ही आया हूँ। उस दिन बहुत खुशी खुशी अपने अपार्टमेंट में लौट रहा था, जब अचानक गाड़ी के बोनट में नुक्स पड़ जाने की वजह से अपना बैलेंस खो बैठी और जबरदस्त दुर्घटना का शिकार हो गई। उसी दुर्घटना में मैंने अपनी एक टांग खो दी।" कहते कहते सागर ने अपनी पेंट एक तरफ से ऊँची कर दी, जहाँ घुटने के नीचे नकली टाँग दिखाई दे रही थी। ओह! इसी वजह से वह सामान्य चाल नहीं चल पा रहा था।"मैं यह सब पहले ही बता देना चाहता था, पर स्वाति की परीक्षा के बारे में सोच चुप रहा क्योंकि मैं उसे दुख नहीं देना चाहता था। रही शादी की बात, तो अब ऐसी हालत में न ही किसी लड़की का सहारा बन पाऊँगा शायद कभी और न ही कोई माता पिता एक अपाहिज के हाथ...।"
"बस करो सागर, प्लीज़। क्या इतना कमजोर समझा तुमने मेरे प्यार को? दिल दिया है तुम्हें और इसका मतलब भी समझते हो? यह कोई खेल थोड़ी, जो सिर्फ छांव का साथी हो। धूप में साया बन साथ चलने का दूसरा नाम है प्यार, कोई दिल्लगी नहीं, समझे तुम।"
"पर स्वाति..।"
"पर वर कुछ नहीं बेटा। स्वाति ठीक कह रही है। हमें भी कोई एतराज नहीं है। अरे भाई इस बेचारे दिल को और कितना तरसाओगे? अगर तुम दोनों को मंजूर है , तो इस दो दिलों के मेल को तो अब भगवान भी नहीं रोक सकते।" मिस्टर वर्मा ने सहमति की मोहर लगा दी थी और मधुर स्वर लहरियां गूंज उठी चारों तरफ।..
सीमा भाटिया
---------------परिचय
सीमा भाटिया जी लुधियाना पंजाब से हैं। गृहस्थी के दायित्वों के साथ साहित्य की अनवरत सेवा करती आ रही हैं। काव्य और कथा दोनों के ही साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा भी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। मानवीय संवेदनाओं को शब्द देने वाली शब्द शिल्पी सीमा जी का एमपी मीडिया पॉइंट में स्वागत है।संपादक


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