सिर्फ़ सूरज नहीं आया, साथ लाया है सहर


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पीयूष आफिस से आकर बैठा ही था तभी घंटी बजी। पूजा ने दरवाज़ा खोला तो देवर-देवरानी को देखकर बोली 'सुनिए जी। अनुज भैया और ऋचा आये हैं।
अरे फोन ही कर दिया होता, आज इस सरप्राइज की क्या जरूरत आन पड़ी।'
अरे भाभी सरप्राइज़ तो हम सभी को मिला है.... अनुज अन्दर आते हुए बोला।
अब इधर आकर बैठेगा या वहीं दरवाज़े पर सारी बातें कर लोगे तुम लोग।
भैया आप बैठो, मैं इनके लिए चाय बनाने ही जा रही थी। आओ ऋचा.... तुम क्या लोगी ? तुम्हारी वो ग्रीन टी तो नहीं है। नींबू-पानी बना दूँ...
भाभी कुछ नहीं। ये आफिस से जल्दी आ गये थे। तभी से कह रहे थे शाम को भैया के पास चलना है। चाय पीकर ही आये हैं।
अनुज ने मोबाइल में वाट्स एप खोलकर पीयूष के सामने रख दिया।
क्या कुछ खास है.... कोरोना पर कोई नई खोज कर ली वाट्स एप यूनिवर्सिटी ने....
आप ही देख लीजिए। कोरोना से कई गुना बड़ा वायरस है।
हूँऽऽ... कोई नया वायरस और... हे भगवान। क्या सचमुच मन बना लिया है निपटाने का पूरी दुनिया एक साथ। यह तो पापा का अकाउंट है न। इसमें क्या दिखा रहा है ?
देखिए तो सही। वायरस पुराना संक्रमण नया है। वायरस है आराध्या आंटी... संक्रमित हुए हैं पापा। अनुज ने ऊपर के संदेश स्क्रॉल कर नीचे दिखाया 'यह देखिए.... यह... और यह...' ।
पीयूष पूरी गंभीरता से देखने लगा पापा को मिले बधाई संदेश दोस्तों से.... 
"बधाई मित्र!! नई पारी की शुभकामनाएँ।" 
"वाह दोस्त। देर आयद दुरुस्त आयद। मुबारक हो।" 
"शादी... मतलब खाना आबादी की दिली मुबारकबाद भाई। आराध्या भाभी को भी नमस्कार कहना।" 
पाटिल अंकल, बैनर्जी दादा और इश्तियाक चाचा के संदेश के साथ और कई बधाई संदेश हैं। 
आराध्या आंटी व पापा की तस्वीर है किसी बीच पर ली हुई। कितना ख़ुश हैं दोनों कुछ देखते हुए। तस्वीर पोस्ट की है तीस्ता ने। आराध्या आंटी की बेटी जो शायद यूएस में रहती है पिछले कई सालों से..... 
पीयूष ने सिर सोफे के बैक पर टिका दिया और आँखें बंद कर लीं। 
अनुज ख़ामोशी से देख रहा था उसे तभी पूजा व ऋचा चाय व कुछ स्नेक्स लिये आईं। 
अरे.... यहाँ तो फ्लोर टेस्ट के पहले की सिचुएशन है। सीएम व विपक्ष दोनों हैरान-परेशान बैठे हैं। 
अरे क्या हुआ ? किस गंभीर मसले पर बात हो रही है दोनों भाई की। 
बैठो भाभी। आप भी सुनेंगी तो यही हालत होगी। 
ऐसा क्या बताने वाले हैं आप... जल्दी बताईये। क्या हुआ है... ये इतनी गंभीरता से क्या सोचने लगे हैं....... 
पीयूष देख रहा है, दो बच्चों को। बड़ा आठ साल का और छोटा पाँच का... एम्बुलेंस आकर रुक गई है। पापा बरामदे में फर्श पर बैठे हैं। बहुत सारे अंकल सफेद चादर में लिपटी मम्मी को लेकर आये हैं और पापा के पास ही चिक बिछाकर लिटा दिया है। 
दोनों बच्चे इतने दिनों बाद आई माँ से लिपटना चाह रहे हैं। 
पड़ोस की आंटियों ने दोनों को पकड़कर रोक रखा है। 
छोटा पूछ रहा है 'मम्मी सोई क्यों है? कुछ बोलती क्यों नहीं...... मुझे जाने दो माँ के पास...' 
पापा उसकी आवाज़ सुनकर जैसे चौंके हैं। उठकर दोनों भाइयों को सीने से लगा लिया है। 
मम्मी अब नहीं जागेगी बेटा। अब मैं ही हूँ पापा भी और मम्मी भी..... 
सच कहा था पापा ने। हर वो काम जो मम्मी करती थीं, पापा करने लगे थे। नाश्ता, यूनिफार्म और बस्ता-जूता... वैसा ही समय व जगह पर मिलता था। रात को छोटू को लोरी गाकर सुलाना, खाने में हर नखरा उठाना। 
दोनों के होस्टल जाने तक पापा ने मम्मी की कमी का अहसास भी नहीं होने दिया था। 
भैया... चाय। चाय लीजिए ठंडी हो जायेगी। अनुज, पूजा व ऋचा अपने-अपने तर्क रख रहे हैं। ऋचा को सोसायटी की चिंता है। पूजा भी उसकी हाँ में हाँ मिलाकर बात में धार करती जा रही है। 
अरे बुला लिया होता हमें भी। नेग-शगुन ही कर लेते। तुम पापा के साथ बारात लातीं ऋचा, अनुज भैया दोस्तों के साथ घोड़ी के आगे नाचते। 
हम दोनों द्वारचार के बाद पापा को स्टेज पर लाते। वरमाला होती। हथलेवा कर विदा करते आराध्या आंटी... सॉरी सासू माँ को.... 
बस करो पूजा.... शर्म आनी चाहिए तुम्हें ऐसा सोचते हुए। 
भैया! शर्म तो पापा को आनी चाहिए थी। इस उम्र में क्या सूझी। पूरी इज्जत का कचरा कर दिया.... 
चुप कर। बड़ा इज्जतदार हो गया है आज तू। अरे नालायक ये दोनों तो बहुत बाद में आईं। कुछ नहीं जानती। तूने तो बचपन से देखा है पापा को। 
अनुज के साथ पूजा व ऋचा भी सहम गये पीयूष के तेवर देख। 
आप दोनों... घराती और बाराती बनकर शादी करतीं। विदा करतीं सास को.... अरे अगर सिर्फ बहू ही बन जातीं तब भी..... 
कितने अकेले थे पापा.... हम चारों में से समय किसके पास रहा उनके लिए। जब भी आये, दो चार दिन अजनबियों की तरह गुजार कर लौट गये। 
उनका मजाक उड़ाने के पहले अपने गिरेबां में झांको। 
जब माँ हमको छोड़कर गई, पता पापा की उम्र कितनी थी? 
मुझ से सुनो। केवल 32 साल। मैं 8 का तू 5 का था। सारी दुनिया कहती थी तब पापा से शादी करने के लिए। 
नहीं की मगर। तब उम्र थी जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने की लेकिन नहीं किया ऐसा। जब मैं और तू होस्टल गये, एक एक दिन इंतजार में कटा पापा का। पढ़कर हम नौकरी के लिए निकले तब पापा हमारी शादी और हमारे बच्चों के साथ खेलने के सपने देख रहे थे। 
किस सपने को पूरा किया हमने... आज मैं जितना ख़ुश हूँ, पहले कभी नहीं रहा शायद। 
तुम इज्जतदार लोग तोड़ लो नाता उनसे। 
कह दो सोसाइटी से बुड्ढा सनक गया है। इस उम्र में रंगरेलियां चाहिए उसे..... 
जब पीयूष चुप हुआ, वो तीनों भी एक शब्द न कह सके। वैसे ही बैठे थे लज्जित खुद पर। अपनी सोच व उन कटाक्षों पर शर्मिंदा जो कर रहे थे कुछ देर पहले। 
मैं कुछ गलत कह रहा हूँ क्या ? बोलो, पीयूष ने पूछा। 
हम गलत थे, गलत हैं भैया। अब क्या करें ? 
हँस दिया पीयूष। यह मैं बताऊँ तुम लोगों को कि क्या करना है। समझदार हो। अपने निर्णय खुद लेते हो। अब भी खुद डिसाइड करो..... 
अच्छा यह तो बता दीजिए अब आप क्या करने वाले हैं... तीनों ने एक साथ पूछा। 
मैं.... मैं अभी निकल रहा हूँ पापा के पास जाने के लिए। उनको और नई माँ को बधाई देने के लिए। अपनी ज़िंदगी को फिर से शुरू करने के लिए.... अब हर पल एक दूसरे का हाथ थामकर साथ चलने के लिए....... 
हम साथ तो चल सकते हैं आपके....... 
सोचा पीयूष ने एक पल और बोला, बिल्कुल। चल सकते हो। मगर नाचना भी होगा और हथलेवा भी करना होगा उस पार्टी में जो मैं देने वाला हूँ वहाँ पहुँचकर। 
वो लोग हैं कहाँ... हम पहुँचेंगे कब उनके पास..... 
तुमने देखा नहीं ठीक से। ये दीव रिसॉर्ट है। अगर अभी निकले तो सुबह तक पहुँच जायेंगे.... और कल सिर्फ़ सूरज नहीं निकलेगा। सूरज के साथ सहर भी होगी.... अब तैयारी करो। हम एक घंटे बाद निकल जायेंगे। 
#तस्वीर : क्लब महिन्द्रा के विज्ञापन से साभार। 

©मुकेश दुबेसीहोर , मध्यप्रदेश 

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 समीक्षा


सिर्फ सूरज नहीं आया.. साथ लाया सहर.... मुकेश भाई की ये  कहानी... बुजुर्गों के अकेलेपन की दास्ताँ है...। जिन घरों में बुजुर्ग आगे के कमरे में बैठे रहते हैं... वहाँ एक उजाला पसरा रहता है...। ये दृश्य अब अंधियार में बदलने लगे हैं...। भारत के घरो में यह मंजर आम हो गया है...। जिनकी उंगली पकड़ कर चलना सीखा, जिन कंधों पर चढ़कर दुनियाँ देखी... वो अकेलेपन को भोगने पर मजबूर हैं...। सबके पास सब कामों के लिए समय है.. केवल बुजुर्ग से बात करने का वक्त नहीं है...। यही वह मर्म है.... यही वो बुजुर्गों का दर्द है... जिसे ये कथानक... बिना बुजुर्ग की उपस्थिति के बयाँ कर देता है...। लफ्जों से बने वाक्य दर वाक्य जब कहानी अपनी रफ्तार से बढ़ती जाती है... तब जाकर बुजुर्गों का त्याग चल चित्र की तरह आँखों के सामने से गुजरता जाता है...। उनके दिए गए प्यार की खुश्बु से कथानक महक उठता है... तपस्या भरे त्याग से कहानी मर्मांतक हो जाती है... लेकिन अपने में खोयी पीढी की उपेक्षा से उनके उस दर्द को भी उजागर करती है... जो किसी से कहा नही जाता..। अकेले में वो पिता कितना रोया और बिलखा होगा... जिसने दो बेटों की परवरिश में अपना जीवन होम कर दिया हो...। और फिर अकेलापन हिस्से में आ गया हो...। तब उनकी आराध्या... ने ही संबल दिया... जिसकी सूचना से पहले पहल... इज्जत पर खतरा मंडराने लगा... लेकिन पीयूष ने वो याद रखा... जब पापा की ऊँगली पकड़ कर बाजार जाने पर... सारे खिलौने उसके हुआ करते थे... आज वह जिसमें खुश हैं... उस खुशी में हम भी क्यों न शामिल हो जाएं... यही आकर कथानक.. विराम लेता है... और दे जाता है सीख... अपने बुजर्गों को समय देने की, उन्हें खुश रखने की, उनसे बात करने की, उन्हें समय देने की, उनकी खुशियों में खुश होने की और उनके अकेलेपन को भरने की...। वाह मुकेश भाई क्या... शानदार ताना बाना बुना है... वाह वाह क्या बात है...। खुशी में भी आँखें भिगोते हैं आँसू...। बधाई...।
संपादक 
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